अटकलें हैं कि महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिदें, उद्धव गुट के सारे सांसदों को अपले पाले में लेने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए शिंदे ने बकायदा एक ऑपरेशन चला रखा है। जिसका नाम दिया 'ऑपरेशन टाइगर' है। एक ऐसा ऑपरेशन जिससे शिंदे, उद्धव गुट के विधायकों के बाद, अब सांसदों को भी तोड़ने वाले हैं। मुंबई के लोकल अखबर 'मुंबई मिरर' ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि बुधवार, यानी 8 अप्रैल की देर शाम शिंदे ने ठाणे इलाके में उद्धव गुट के 8 सासदों के साथ एक गोपनिय मीटिंग की है। जो पूरी रात चली थी।
अब जैसे ही ये मीटिंग वाली खबर बाहर आई न सिर्फ एकनाथ शिंदे ने, बल्कि उस गोपनिय बैठक में कथित तौर पर शामिल हुए उद्धव गुट के सारे सांसदों ने बयान जारी कर सफाई दी है और बैठक की बात का खंडन किया है।
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यह खबर यहीं खत्म नहीं होती, यहां एक पेंच है। पेंच यह है कि कि राजनीतिक गलियारों में एक और खबर तैर रही है वह खबर यह है कि BJP नहीं चाहती कि शिंदे, उद्धव गुट के सांसदों को अपने साथ जोड़े और अपनी ताकत बढ़ाए। यह बात उसी BJP की तरफ से आ रही है जिसके साथ मिलकर शिंदे ने शिवसेना को तोड़ा था और सरकार बनाई थी, वही BJP जिसके साथ शिंदे अभी सत्ता में साझीदार हैं और उपमुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि शिंदे के ऑपरेशन टाइगर के पीछे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे असली शिवसेना वाली लड़ाई भी एक बड़ा फैक्टर है। वहीं कुछ इसे BJP के साथ मोलभाव करने की तैयारी बता रहे हैं।
ऐसे में जानने की कोशिश करते हैं कि आखिरकार महाराष्ट्र की राजनीति में क्या उठा पटक हो रही है? ऑपरेशन टाइगर क्या है? ऑपरेशन टाइगर के जरिए शिंदे अपना कौन सा हित साधने की कोशिश कर रहे हैं? NDA के नंबर गेम और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस को इस ऑपरेशन टाइगर से कैसे प्रभावित किया जा सकता है? और इससे शिंदे को क्या फायदा होने वाला है? साथ ही ये भी जानने की कोशिश करेंगे कि, BJP क्यों नहीं चाहती कि शिंदे का ऑपरेशन टाइगर सक्सेसफुल हो।
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समझें महाराष्ट्र की मौजूदा पॉलिटिक्स
2019 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव, यहीं से राज्य की पूरी पॉलिटिक्स बदल गई थी। हमेशा की तरह BJP और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा। महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें हैं, 145 बहुमत का आंकड़ा है। BJP को 105 सीटें मिले और शिवसेना को 56 सीटें, दोनों को जड़कर कुल 161 सीटें हुए। यानी बहुमत मिल चुका था लेकिन सरकार नहीं बनी। मामला CM फेस पर अटक गया। शिवसेना चाहती थी कि उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनी लेकिन BJP पहले ही तरह देवेन्द्र फडणवीस के साथ ही आगे बढ़ना चाहती थी। गठबंधन टूट गया और शिवसेना ने कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी NCP के साथ गठबंधन कर लिया। नए मोर्चे को नाम मिला 'महाविकास अघाड़ी' लेकिन चुनाव के बाद बना ये गठबंधन ज्यादा दिनों तक टिका नहीं। जून 2022 में शिवसेना के 56 में से करीब 40 विधायकों ने विद्रोह कर दिया और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में असम आ गए। उद्धव सरकार अल्प मत में आ गई। फ्लोर टेस्ट की मांग उठी लेकिन उससे पहले ही उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
फिर, 30 जून 2022 की सुबह, अचानक महाराष्ट्र के राज भवन में एक शपथ हुआ। एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने और देवेन्द्र फडणवीस उप मुख्यमंत्री। फ्लोर टेस्ट में शिंदे गुट के 40 से ज्यादा विधायकों ने BJP को समर्थन दिया और BJP के 106 विधायकों के साथ मिलकर बहुमत हासिल कर लिया गया।
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यहां पर एक बड़ा उठापटक हुआ। दरअसल, उद्धव गुट ने विधानसभा स्पीकर से सारे बागी विधायकों को 10वीं अनुसूचि के तहत अयोग्य ठहराने की मांग की और खूब हंगामा हुआ। उद्धव गुट ने विधानसभा स्पीकर पर भी पक्षपात करने का आरोप लगाया। बाद में मामला चुनाव आयोग के पास पहुंचा। उद्धव गुट खुद को असली शिवसेना बता रहा था, जबकि शिंदे गुट का कहना था कि ज्यादातर विधायक उनके साथ हैं, इसलिए इसली शिवसेना वो हैं। 17 फरवरी 2023 को चुनाव आयोग का फैसला आया, शिदें गुट को ही असली शिवसेना का चुनाव आयोग ने दर्जा दिया। पार्टी का नाम 'शिवसेना' और पार्टी का चिन्ह 'धनुष बाण' का सिंबल शिंदे गुट को मिला। उद्धव ठाकरे ने अपने गुट को 'शिवसेना (UBT)' नाम दिया यानी शिवसेना उद्धव बाला साहेब ठाकरे और पार्टी का सिंबल 'मसाल' रखा गया।
अब आया 2024 विधानसभा चुनाव का वक्त। इस वक्त तक शरद पवार की पार्टी NCP भी दो फाड़ हो चुकी थी। अजीत पवार अपने विधायकों के साथ अलग हो चुके थे।
2024 के चुनाव में दो गठबंधन आमने सामने थे। एक था महाविकास अघाड़ी। जिसमें शिवसेना उद्धव गुट, कांग्रेस और NCP शरद पवार गुट शामिल था। वहीं दूसरा था महायुति गठबंधन। जिसमें BJP, शिवसेना शिंदे गुट और NCP अजीत पवार गुट शामिल था। चुनाव में इसी महायुति गठबंधन की जीत हुई। BJP 132, शिवसेना शिंदे 57 और NCP अजीत पवार 41 सीटें जीतकर आईं। कुल 230 सीटें जो बहुमत से बहुत ज्यादा था लेकिन अब हालात अलग थे। BJP बड़ी पार्टी थी। इस बार वह सरकार बनाने के लिए सिर्फ शिंदे गुट के ऊपर डिपेंडेंट भी नहीं थे। एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। BJP से देवेन्द्र फडणवीस एक बार फिर मुख्यमंत्री बने और एकनाथ शिंदे को उप मुख्यमंत्री पद पर संतोष करना पड़ा।
साल 2024 में लोकसभा के भी चुनाव हुए। महाराष्ट्र की कुल 48 सीटों में 9 BJP को मिली, 7 शिंदे गुट को मिले और 1 NCP अजीत पवार गुट को।
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अभी तक यही स्थिती बनी हुई है, नंबर्स यहीं हैं लेकिन खबरें हैं कि एकनाथ शिंदे इन नंबर्स को बदलना चाहतैं हैं।
शिंदे इन नंबर्स को कैसे बदलना चाहते हैं?
दरअसल, शिंदे गुट के पास हैं अभी 7 सांसद हैं और खबरें है कि एकनाथ शिंदे, उद्धव गुट के जो 9 सांसद हैं उन्हें तोड़ कर अपने पाले में लाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने एक ऑपरेशन टाइगर शुरू कर रखा है। 10 अप्रैल को मुंबई के लोकल अखबार मुंबई मिरर ने इस ऑपरेशन टाइगर को लेकर बड़ा अपडेट छापा। मुंबई मिरर ने दावा किया कि बुधवार यानी 8 अप्रैल की देर शाम एकनाथ शिंदे की गाड़ी अचानक उनके काफिले से अलग हो गई और एक दूसरे रास्ते निकल गई। गाड़ी ठाणे के वोल्टास कंपनी वाले इलाके में पहुंची। यहां शिंदे ने उद्धव गुट के 8 सांसदों के साथ बैठक की। जो अगले दिन सुबह तक चली।
कौन-कौन शामिल था इस बैठक में?
मुंबई मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, ठाकरे गुट से सांसद अरविंद सावंत, संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर, भाऊसाहेब वकचौरे और राजभाऊ वाजे इस बैठक में फिजिकली शामिल हुए। जबकि सांसद ओमराजे निंबालकर और एक दूसरे सांसद वीडियो कॉल के जरिए इस बैठक से जुड़े। इस बैठक में इन सांसदों को कथित तौर पर शिंदे गुट में शामिल होने का ऑफर दिया गया।
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अब जैसे ही ये खबर आउट हुई ना सिर्फ एकनाथ शिंदे ने बल्कि वो सारे सांसद जिनका इस रिपोर्ट में नाम लिया गया है सभी ने एक-एक कर बकायदा मीडिया में आकर बयान दिया और मीटिंग की बात का सरासर खंडन किया है।
शिंदे इन सांसदों को अपने पाले में मिलना क्यों चाहते हैं?
इसके पीछे के दो संभावित कारण हो सकते हैं। पहला, सुप्रीम कोर्ट में चल रहा केस। 17 फरवरी 2023 को भले ही चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना माना, उन्हें पार्टी का नाम और सिंबल दे दिया लेकिन उद्धव ठाकरे गुट ने अपनी लड़ाई बंद नहीं की। उद्धव ठाकरे गुट ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए और संभवत: 2 महीने में इस मामले में फैसला आ सकता है। जानकार ये अंदाजा लगा रहे हैं कि पिछली बार चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना का दर्जा विधायकों की वोटिंग के आधार पर किया था। शिंदे गुट के पास ज्यादा विधायक थे लेकिन अभी हालात बदल गए हैं। हालांकि विधायक अब भी शिंदे गुट के पास ज्यादा है। जीसकी संख्या 57 विधायकों की है। जबकि उद्धव गुट के पास करीब 20 विधायक हैं लेकिन सांसदों के नंबर में शिंदे गुट पीछे है। शिंदे गुट के पास 7 सांसद हैं, जबकि उद्धव गुट के पास 9 सांसद हैं। इसलिए जानकार ये अंदाजा लगा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में असली और नकली की लड़ाई में अपना पलड़ा भारी करने। इसलिए एकनाथ शिंदे और उद्धव गुट के सांसदों को तोड़कर अपने गुट में लाने की कोशिश में हैं।
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जानकार दूसरा संभावित कारण भी बताते हैं। वह या कि 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA को बहुमत मिला लेकिन BJP अकेले सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। लोकसभा में बहुमत 272 पर था लेकिन बीजेपी को 240 सीट मिले थे। हालांकि NDA के सभी सहयोगी दल कुल मिलाकर 293 सीट ले आए थे लेकिन दो पार्टी को लेकर कुछ अनिश्चितता बनी हुई थी, चंद्रबाबू नायडू की TDP और नीतिश कुमार की JDU। BJP के बाद इन्हीं के पास सबसे ज्यादा सांसद थे। TDP के पास 16 और JDU के पास 12 सांसद थे। हालांकि दोनों पार्टियां बिना किसी दिक्कत के BJP के साथ खड़ी रहीं और NDA घटक में इन दोनों पार्टियों का ओहदा ऊपर हुआ।
अब अगर एकनाथ शिंदे, उद्धव गुट के 9 सांसदों को अपने पाले में ले लेते हैं तो NDA का नंबर गेम बदल जाएगा। शिंदे गुट के सांसदों की संख्या 16 हो जाएगी और शिंदे गुट NDA की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। दिल्ली में ताकत बढ़ जाएगी। इससे एकनाथ शिंदे को दो फायदा होगा। पहला यह कि वो केन्द्रीय कैबिनेट में ज्यादा पद मांग सकेंगे और दूसरा यह कि एकनाथ शिंदे, दिल्ली के नंबर गेम के जरिए महाराष्ट्र में खुद दोबारा CM बनने की दावेदारी पेश करेंगे और BJP से वापस मोलतोल करेंगे।
यानी शिंदे, एक तीर से कई निशाना साधना चाहते हैं। अगर, उद्धव गुट के सांसदों को मिलाने के बाद उनके सांसदों की संख्या दोगुनी हो गई तो पहले तो वह सुप्रीम कोर्ट में असली शिवसेना केस में अपना पलड़ा भारी कर लेंगे। फिर दूसरा यह कि NDA की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के चलते केन्द्रीय कैबिनेट में ज्यादा पोर्टफोलियो मांगेगे और तीसरा यह कि वापस से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा करेंगे। एक तीर से तीन निशाने।
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हालांकि एकनाथ शिंदे के लिए ये आसान नहीं है। जब उन्होंने शिवसेना तोड़ा था तब उनके पास BJP का समर्थन था लेकिन इस बार खुद BJP के खिलाफ खड़ी दिखाई दे रही है।
कब से है ऑपरेशन टाईगर की चर्चा?
ऑपरेशन टाईगर की चर्चा अभी से नहीं हो रही है। पिछले करीब 1 महीने से इस ऑपरेशन की चर्चा है। 18 मार्च 2026 को एकनाथ शिंदे तीन दिन की दिल्ली दौरे पर गए थे। जहां उन्होंने अमित शाह से मिलने के लिए वक्त मांगा था। जानकारों ने दावा किया कि शिंदे, ऑपरेशन टाईगर शुरू करने का परमिशन लेने दिल्ली गए थे लेकिन अमित शाह से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। जिसके बाद एकनाथ शिंदे प्रधानमंत्री नरेन्द्र से मिले लेकिन उन्हें ऐसे ऑपरेशन में BJP का साथ नहीं मिला।
इसके बाद एकनाथ शिंदे शांत हो गए लेकिन रुक रुक कर ऑपरेशन टाइगर पर खबरें आती रहीं। अब नई सनसनी मची है, मुंबई मिरर की रिपोर्ट के बाद। जिसमें सीधा-सीधा ये दावा किया गया है कि एकनाथ शिंदे ने 8 अप्रैल की रात से 9 अप्रैल की सुबह तक ठाणे इलाके में उद्धव गुट के सांसदों के साथ गोपनीय बैठक की है। हालांकि हर किसी ने इसका खंडन किया है।
