जुलाई महीने में यूपीआई के जरिए देश में 2,366 करोड़ से ज्यादा ट्रांजेक्शन हुए हैं और कुल रकम 29.9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुकी है। इतने बड़े पैमाने पर डिजिटल पेमेंट होने के बीच लोकसभा में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट और टैक्सेशन एंड अदर लॉज अमेंडमेंट बिल को लेकर जो चर्चा और अफवाहें उड़ी थीं, उस पर सरकार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पूरी तरह से स्थिति को साफ कर दिया है। सरकार की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि देश के आम यूजर्स को यूपीआई का इस्तेमाल करने के लिए एक भी रुपया नहीं देना पड़ेगा और सभी तरह के सामान्य लेनदेन हमेशा की तरह बिल्कुल मुफ्त रहेंगे। 

 

सरकार ने यह बात पूरी तरह से साफ कर दी है कि देश के आम नागरिकों या व्यक्तिगत यूजर्स के लिए यूपीआई ट्रांजेक्शन पर कभी भी कोई ट्रांजेक्शन फीस या किसी भी प्रकार का चार्ज नहीं लगेगा। जब साल 2016 में यूपीआई की शुरुआत की गई थी तब से लेकर आज तक यह सेवा पूरी तरह से मुफ्त रही है। आगे भी पर्सन-टू-पर्सन यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजने के इस सिस्टम पर कोई भी चार्ज नहीं लिया जाएगा।

 

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क्या छोटे दुकानदारों पर चार्ज लगेगा?

छोटे दुकानदारों और स्थानीय किराना स्टोर चलाने वाले व्यापारियों को यूपीआई के जरिए पेमेंट स्वीकार करने पर कोई भी चार्ज नहीं देना पड़ेगा। डिजिटल पेमेंट को देश के गांव-गांव और कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए तथा छोटे व्यापारियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार का मुख्य उद्देश्य यह रहा है कि छोटे मर्चेंट्स को पूरी तरह से सुरक्षा और मुफ्त सुविधा दी जाए। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि हमारे देश के छोटे दुकानदारों को किसी भी तरह के अतिरिक्त पैसों के बोझ या तनाव का सामना न करना पड़े।

MDR को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है?

आज भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम सिस्टम बन चुका है। इस बड़े सिस्टम को चलाने के लिए, इसकी सुरक्षा मजबूत रखने के लिए, ऑनलाइन धोखाधड़ी रोकने के लिए और चौबीसों घंटे सेवा चालू रखने के लिए लंबे समय की प्लानिंग की जा रही है जिसमें मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) का प्रस्ताव भी शामिल है।

MDR क्या होता है?

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर एक ऐसा शुल्क होता है जो डिजिटल या कार्ड के जरिए पेमेंट स्वीकार करने पर व्यापारियों यानी मर्चेंट्स पर लग सकता है। सरकार ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि यदि भविष्य में कभी एमडीआर लगाया भी जाता है तो वह सिर्फ बहुत बड़े मर्चेंट्स या एक निश्चित टर्नओवर सीमा से ऊपर बिजनेस करने वाले बड़े व्यापारियों पर ही लागू होगा। वह भी बहुत ही कम और नाममात्र की दर पर होगा। इस संभावित नियम का असर देश के आम लोगों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा और आम जनता को इससे पूरी तरह बाहर और सुरक्षित रखा गया है।

अंतिम फैसला कौन करेगा?

संसद के माध्यम से बिल पास होने के बाद, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के अंतर्गत आने वाली यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी ही इस पूरे मामले पर अपना आखिरी फैसला लेगी। जब तक इस कमेटी और देश की अन्य बड़ी नियामक संस्थाओं की तरफ से कोई आधिकारिक अधिसूचना या नोटिस जारी नहीं किया जाता है तब तक किसी भी तरह के नए चार्ज को लागू नहीं माना जाएगा।

 

सरकार ने उन सभी मीडिया रिपोर्ट्स और दावों को पूरी तरह से खारिज और झूठा बता दिया है जिनमें यह कहा गया था कि किसी बाहरी दबाव के कारण यह नया नियम लाया जा रहा है। सरकार ने यह साफ शब्दों में कहा है कि यदि किसी भी तरह का बाहरी दबाव होता तो न तो साल 2016 में यूपीआई को देश में लॉन्च किया जाता और न ही इसे इतने लंबे सालों तक पूरी तरह से मुफ्त बनाए रखा जाता।

 

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क्या छिपे हुए चार्ज या जीएसटी लगेगा?

फिलहाल देश के आम यूजर्स के लिए किसी भी सामान्य यूपीआई लेनदेन पर न तो कोई जीएसटी लगता है और न ही कोई छुपा हुआ चार्ज लिया जाता है। केवल कुछ चुनिंदा और खास मामलों में जैसे कि क्रेडिट कार्ड को यूपीआई से जोड़कर पेमेंट करने या कुछ खास प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स वॉलेट के इस्तेमाल पर मर्चेंट स्तर पर कुछ छोटी-मोटी इंटरचेंज फीस लग सकती है। 

 

इसके बावजूद आम लोगों और छोटे दुकानदारों के सामान्य बैंक-टू-बैंक यूपीआई ट्रांसफर के लिए किसी को भी डरने या चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि सरकार का मुख्य और पक्का फोकस हमेशा से डिजिटल पेमेंट को पूरी तरह से आसान और सस्ता बनाए रखने का रहा है।