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सरकारी कंपनियों के पास हजारों करोड़ की संपत्ति, फिर आर्थिक तंगी क्यों रहती है?

घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों की खाली जमीन और बिल्डिंग को बेचकर पैसा जुटाने की रणनीति तेज हो गई है। बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ संपत्तियां बेचने से कंपनियों की माली हालत सुधरेगी?

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo credit- Social Media

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MTNL और BSNL जैसी संकट में फंसी सरकारी टेलीकॉम कंपनियों की खाली जमीनों और इमारतों को नीलाम करने की प्रक्रिया अब बड़े पैमाने पर आगे बढ़ रही है। हाल ही में MTNL की 1,100 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियों को बेचने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया गया है। सरकार का तर्क साफ है कि जिन जमीनों या इमारतों का इस्तेमाल कंपनियां अपने मौजूदा कारोबार के लिए नहीं कर रही हैं उनसे पैसा जुटाकर भारी-भरकम कर्ज और देनदारियां कम की जाएं।

 

इस पूरी कवायद ने एक बेहद अहम और बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है। क्या सरकारी कंपनियों की कीमती संपत्तियां बेचकर मिलने वाली एकमुश्त रकम से उनकी आर्थिक स्थिति में कोई स्थायी सुधार आएगा? या फिर सिर्फ पुराने बकाए और ब्याज चुकाने की एक अस्थाई व्यवस्था बनकर रह जाएगा?

 

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संपत्ति बेचने का मतलब क्या है?

इसे तकनीकी भाषा में 'एसेट मॉनेटाइजेशन' यानी संपत्ति का मौद्रीकरण कहा जाता है। इसका सीधा मतलब संपत्ति को हमेशा के लिए बेचना भर नहीं होता बल्कि खाली पड़ी जमीनों और इमारतों से आर्थिक लाभ उठाना होता है। इसके दो मुख्य रास्ते हैं। पहला, सीधी बिक्री से संपत्ति का मालिकाना हक दूसरे को ट्रांसफर कर दिया जाता है। एक बार में पूरी रकम मिल जाती है। 

 

दूसरा, लीज में जमीन या इमारत का मालिकाना हक सरकारी कंपनी के पास ही रहता है लेकिन एक तय समय के लिए इसे किराए पर दे दिया जाता है। इससे कंपनी को लगातार किराया या प्रीमियम मिलता रहता है। संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, सरकार सभी जमीनों को नहीं बेच रही है। केवल उन्हीं जमीनों और इमारतों का मौद्रीकरण किया जा रहा है जिनकी कंपनियों को निकट भविष्य में कोई जरूरत नहीं है। 

नीलामी के लिए क्यों बनी स्पेशल कंपनी?

सरकारी उपक्रमों (CPSEs) की खाली जमीनें बेचना कोई आसान काम नहीं रहा है। दस्तावेजों में कमी, अतिक्रमण, मालिकाना हक के पचड़े और कानूनी अड़चनों की वजह से कंपनियां खुद इन्हें नहीं बेच पाती थीं। इसी समस्या को सुलझाने के लिए सरकार ने 2022 में 'नेशनल लैंड मॉनेटाइजेशन कॉरपोरेशन' (NLMC) की स्थापना की।

 

NLMC वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक विशेष एजेंसी है। इसका काम खाली संपत्तियों की पहचान करना, सही मूल्यांकन करना, कानूनी अड़चनों को दूर करना और ई-नीलामी के जरिए पारदर्शी तरीके से सही कीमत दिलवाना है।

वित्तीय वर्ष 2026-27 में NLMC ने सरकारी कंपनियों की ऐसी गैर-जरूरी संपत्तियों से 15,000 करोड़ रुपये तक जुटाने का लक्ष्य रखा है। फिलहाल 5,000 से 6,000 करोड़ रुपये की संपत्तियों की पाइपलाइन तैयार है। इसमें MTNL, BSNL, राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (विशाखापत्तनम स्टील प्लांट/RINL) और HIL जैसी कंपनियां शामिल हैं।

 

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जमीन की सही कीमत कैसे तय होती है?

अक्सर यह भ्रम रहता है कि सरकारी जमीनों के दाम सरकार खुद मनमर्जी से तय कर देती है। वास्तव में ऐसा नहीं है। विशेषज्ञ पहले बाजार के हिसाब से संपत्ति की अनुमानित न्यूनतम कीमत यानी 'रिजर्व प्राइस' तय करते हैं। अंतिम कीमत ई-नीलामी में हिस्सा लेने वाले खरीदारों की बोलियों पर निर्भर करती है।

 

उदाहरण के लिए, नवंबर 2026 में विशाखापत्तनम में RINL के 264 प्लॉटों की नीलामी की गई। इनका रिजर्व प्राइस 497.29 करोड़ रुपये रखा गया था लेकिन प्रतिस्पर्धी बोली के कारण सफल बोलियों का कुल मूल्य 584.33 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यानी सरकार को रिजर्व प्राइस से करीब 17.5% अधिक बोली मिली।

अब तक कितना पैसा मिला?

संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 2019 से जनवरी 2025 के बीच BSNL और MTNL ने अपनी जमीनों, इमारतों, टावरों और फाइबर इंफ्रास्ट्रक्चर से कुल 12,984.86 करोड़ रुपये जुटाए। इसे अगर जमीन और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर के हिसाब से अलग करके देखें तो दोनों कंपनियों के फायदे को मिला लें तो जमीन के मौद्रीकरण का मूल्य 4,522.43 करोड़ रुपये जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर का कुल मूल्य 8,462.43 करोड़ रुपये मानित है। 

 

कैग (CAG) की रिपोर्ट से यह भी सामने आया है कि BSNL ने सिर्फ जमीन बेचने के बजाय लीज पर देकर भी अच्छी कमाई की। अक्टूबर 2019 से फरवरी 2023 के बीच BSNL को जमीनों की सीधी बिक्री से लगभग 188.50 करोड़ रुपये मिले जबकि लीज पर देने से 689.79 करोड़ रुपये की नियमित कमाई हुई।

क्या इससे कंपनियों का संकट खत्म होगा?

संपत्ति बेचने से मिलने वाली रकम से तात्कालिक आर्थिक राहत तो मिलती है लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। तत्कालिक फायदा देखे तो इससे कंपनियों का बैंक कर्ज कम हो सकता है, ब्याज का बोझ घटता है और रोजाना के कामकाज के लिए तुरंत कैश मिल जाता है। वहीं अगर कंपनी का मूल कारोबार (जैसे टेलीकॉम सेवाएं) लगातार घाटे में चल रहा है और उसकी कमाई खर्च से कम है तो संपत्ति बेचकर मिला पैसा केवल पुराने बकाए चुकाने में ही खत्म हो जाएगा।

 

उदाहरण के तौर पर, MTNL ने वित्त वर्ष 2025-26 में दिल्ली और मुंबई की संपत्तियां बेचकर 419 करोड़ रुपये जुटाए और अब 1,100 करोड़ रुपये की और संपत्तियां बेचने की तैयारी है। लेकिन कंपनी पर कुल देनदारियां और कर्ज 35,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संपत्तियों से मिलने वाला पैसा कंपनी के कारोबार को दोबारा खड़ा करने में लग रहा है या यह सिर्फ पुराने गड्ढों को भरने में चला जा रहा है?

 

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सरकार की संपत्ति मौद्रीकरण नीति का मकसद अनुपयोगी संपत्तियों को देश की मुख्य आर्थिक गतिविधियों में लाना है। सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 से 2029-30 के लिए 16.72 लाख करोड़ रुपये की 'नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन 2.0' का ढांचा भी तैयार किया है। इसमें सड़क, रेलवे और पावर सेक्टर शामिल हैं। हालांकि, MTNL और BSNL जैसी कंपनियों के लिए असली चुनौती यह है कि वे संपत्तियों की बिक्री से मिले पैसे का इस्तेमाल सिर्फ कर्ज चुकाने में न करें बल्कि अपने 5G और 4G नेटवर्क, बुनियादी ढांचे और सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने में करें, ताकि भविष्य में ऐसी नौबत न आए।

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