कभी बॉयकॉट तो कभी डिस्काउंट, चीन के बिना क्यों नहीं चल पाता है भारत?
कारोबार के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर भारत ने अब विदेशी निवेश के मामले में भी चीन समेत तमाम पड़ोसी देशों को छूट दे दी है। इसकी बड़ी वजह दोनों देशों के आपसी कारोबार को माना जा रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI
अपने पड़ोसी देश चीन से आयात कम करने, उसके उत्पादों का बॉयकॉट करने और यहां तक कि फ्लाइट्स रोक देने वाले भारत ने अब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में चीन को भी राहत दे दी है। साल 2020 के प्रेस नोट नंबर 3 में बदलाव करते हुए सरकार ऐसे नियम लाई है जिसमें चीन जैसे देशों से भी भारत में निवेश किया जा सकेगा। यह राहत कुछ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से जुड़े कारोबार के लिए दी गई है। इन कंपनियों से आने वाले निवेश के अनुरोध को 60 दिन के भीतर ही अनुमति मिल जाएगी। यह फैसला चर्चा में इसलिए है क्योंकि बीते कुछ साल में भारत और चीन के बीच हुए तनावों के चलते स्थिति ऐसी बन गई थी कि चीनी प्रोडक्ट का बॉयकॉट करने की अपील की गई।
बीते कुछ महीनों से भारत सरकार के कई फैसलों ने चीन को राहत दी है। अब नया फैसला FDI में राहत देने का था। इससे पहले यह नियम था कि अगर किसी विदेशी कंपनी में भारत से सीमा साझा करने वाले देशों के लोग शेयर होल्डर हैं तो उन्हें निवेश करने से पहले सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य था। इसमें चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान आते हैं। रोचक बात है कि यह राहत अब रेयर अर्थ मटीरियल जैसे मामलों में भी दी गई है। अब नए नियमों के मुताबिक, सरकार ने तय कर दिया है कि इन देशों के निवेशक भी कंपनियों में 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी हासिल करने के लिए निवेश कर सकते हैं। बस इसमें यह देखना होगा कि किस सेक्टर में कितने प्रतिशत तक का विदेशी निवेश किया जा सकता है।
चीन पर कितना निर्भर है भारत?
इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक आइटम की मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दे रहे भारत में अभी भी इसी इंडस्ट्री से जुड़ी चीजों का भरपूर आयात हो रहा है। भारत हर साल लगभग 3 लाख करोड़ रुपये के इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, बैटरी, डायोड आदि का आयात चीन से ही करता है। इसके अलावा, कंप्यूटर, पानी के पंप और एसी के कंपोनेंट के लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का आयात होता है। दवाओं के मामले में भारत की कई फार्मा कंपनियां आज भी चीन के API पर निर्भर हैं। हर साल लगभग 1 लाख करोड़ रुपये के फार्मा प्रोडेक्ट का आयात होता है। इसी तरह से प्लास्टिक आइटम, खाद, लोहा और स्टील, गाड़ियों के पार्ट्स, फर्नीचर और अन्य चीजों का आयात जमकर होता है।
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इसी तरह भारत के कारोबारी लौह अयस्कर, क्रोमियम अयस्क, पेट्रोलियम प्रोडक्ट और कई फार्मा प्रोडक्ट चीन को बेचते हैं। मशीनें, मछलियां और अन्य समुद्री उत्पाद के बाजार के रूप में भारतीय कारोबारियों के लिए चीन काम आता है। कपड़े, मसाले और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बेचने के लिए चीन भारत के कारोबारियों का बड़ा बाजार है।
इंडस्ट्री भारत की कच्चा माल चीन का
भारत के बहुत सारे उद्योग ऐसे हैं जिनके लिए कच्चा माल चीन से ही आता है। दुनिया में सबसे बड़ा दवा उत्पादकों में गिने जाने वाले भारत को 70 प्रतिशत API (ऐक्टिव फार्मास्यूटिकल इन्गेडिएंट्स) चीन से ही मिलते हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने के लिए 30 प्रतिशत से ज्यादा कंपोनेट चीन से मिलते हैं। इसी तरह ऑटोमोबाइल सेक्टर का एक तिहाई से ज्यादा कच्चा माल चीन से आता है। साथ ही, टेक्सटाइल और लेदर सेक्टर की कंपनियों को अपना 40 प्रतिशत कच्चा माल चीन से ही मिलता है।
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से आगे बढ़े भारत को कच्चा माल चीन से ही मिलता है। इसी तरह प्लास्टिक की चीजें बनाने के लिए भी कच्चा माल चीन से आता है। मोबाइल के टैंपर्ड ग्लास से लेकर शराब की बोतलें और गिलास बनाने तक के लिए चीन से ही कांच का मैटेरियल आता है।
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यही वजह है कि चाहकर भी भारत और चीन एक-दूसरे से दूरी नहीं बना सकते हैं। भारत के तमाम उद्योग चीन के कच्चे माल पर निर्भर हैं। वहीं चीन के कारोबारियों के लिए भारत एक बहुत बड़ा बाजार है। वहां के छोटे-छोटे कारोबारियों से लेकर बड़े उद्योगपतियों तक के लिए भारत एक बहुत बड़ा बाजार है।
भारत की चिंता क्या है?
दोनों देशों का कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। साल 2025 में दोनों देशों का कारोबार लगभग 155 डॉलर तक पहुंच गया। भारत ने चीन से कुल 135.87 अरब डॉलर का सामान खरीदा लेकिन चीन ने भारत से सिर्फ 19.75 अरब डॉलर का सामान खरीदा। यानी भारत ने 116.12 अरब डॉलर ज्यादा खर्च किए। इसी को ट्रेड डेफिसिट कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों के इस कारोबार में भारत का नुकसान है।
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भारत चीन के रिश्ते कैसे बने और बिगड़े?
2017- भारत और चीन के बीच डोकलाम में जोरदार संर्ष हुआ।
2018- पीएम मोदी वुहान (चीन) गए और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की।
2019- शी जिनपिंग भारत और चेन्नई कनेक्ट सम्मेलन में शामिल हुए।
2020- गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों में खूनी संघर्ष हुआ जिसमें दोनों देशों के सैनिक मारे गए।
मई-जून 2020- लद्दाख को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव हुआ और संबंध खराब हुए। इसी बीच चीनी सामान के बहिष्कार की मांग उठी। खुद पीएम मोदी ने कई बार विदेशी सामान के बहिष्कार की मांग की।
2021- पैंगोंग को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रही लेकिन नतीजा नहीं निकला।
2022- तवांग घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच टकराव हुआ।
2023- कुछ दौर की बातचीत हुई लेकिन नतीजा नहीं निकला।
2024- भारत ने चीनी इंजीनियर्स के लिए वीजा नियमों में राहत दे दी।
2024- साल के आखिर में दोनों देश वास्तविक पोजीशन पर लौटने को तैयार हुए।
2025- SCO सम्मेलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री मोदी चीन गए। अगस्त 2025 में चीन भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साथी बना।
फरवरी 2026- दोनों देशों का कारोबार 155 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया।
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