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प्रोड्यूसर नहीं, AI का यूजर और सर्विस प्रोवाइडर बनकर रह जाएगा भारत?

1990 के दशक में आईटी सेक्टर में भारत तेजी से आगे बढ़ा लेकिन सिर्फ वह सर्विस सेक्टर तक सीमित रह गया। अब AI के मामले में भी भारत के सामने चुनौती है कि कहीं वह सिर्फ सर्विस प्रोवाइडर बनकर ही ना रह जाए।

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AI और भारत, Photo Credit: Khabargaon

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अगर आप भी भारत में रहते हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करते हैं तो ChatGPT,गूगल जेमिनी, इलेवन लैब्स और को-पायलट जैसे टूल्स का इस्तेमाल जरूर करते होंगे। हाल ही में AI इंपैक्ट समिट का आयोजन करने वाले भारत के लिए यह तथ्य बेहद परेशान करने वाला है कि सभी चर्चित और बड़े AI टूल्स दूसरे देशों के हैं। गलगोटिया यूनिवर्सिटी वाले विवाद ने भी इसी के चलते भारत की फजीहत कराई क्योंकि दूसरे देश में बनी चीज को लेकर गलत तरीके से दावे किए जा रहे थे। ऐसे प्रोडक्ट्स का भारत में इस्तेमाल जरूर हो रहा है लेकिन इनके इस्तेमाल का असली फायदा उन देशों को मिल रहा है जहां के लोगों ने इन्हें बनाया है। भारत के लोगों और कई स्टार्टअप ने भी कई AI टूल्स तैयार किए हैं लेकिन बड़े मार्केट में वे ग्लोबल प्लेयर्स को फिलहाल चुनौती नहीं दे पा रहे हैं। शायद यही वजह है कि भारत सरकार भी अब AI के सर्विस सेक्टर पर ज्यादा ध्यान दे रही है।

 

मौजूदा वक्त में देखें तो सबसे ज्यादा इस्तेमाल ChatGPT, गूगल जेमिनी, ग्रोक, Perplexity और कोपायलट जैसे टूल्स का होता है और ये सारे के सारे विदेशी हैं। इन सभी की नजर में भारत एक बड़ा कंज्यूमर यानी ग्राहक है। इसकी वजह है कि भारत की 140 करोड़ लोगों की आबादी और 100 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स। भारत के पास AI इंजीनियर्स और डेवलपर लाखों की संख्या में हैं। यही वजह है कि भारत इन ग्लोबल कंपनियों को आकर्षित करता है। 

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भारत की सरकार भी इस बात को समझ रही है कि एक बार फिर से भारत ग्राहक बनता दिख रहा है। AI समिट जैसे आयोजन, AI मिशन पर मोटा खर्च और स्टार्टअप को की जाने वाली मदद यह दिखाती है कि भारत सरकार चाहती है कि सिर्फ कंज्यूमर न बनकर रहा जाए और क्रिएटर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया जाए। 

भारत के पास सुनहरा मौका

 

भारत के लिए AI ठीक वैसी ही मौका बनकर आया है एक समय पर 1990 के दशक में भारत को मौका मिला और उसने IT सर्विसेज में धाक जमा ली। हालांकि, तब भी भारत कोई बड़ा प्रोडक्ट तैयार करके नहीं बना सका। इस बार मौका है कि भारत AI सर्विसेज के साथ-साथ AI प्रोडक्ट भी बनाए। भारत सरकार के मंत्री जितिन प्रसाद ने AI समिट में कहा है कि भारत AI लीडर बनने के साथ-साथ AI सर्विस प्रोवाइडर भी बनना चाहता है। ऐसे में इसी बात का डर है कि कहीं भारत सिर्फ सर्विस प्रोवाइडर बनने पर अपना ध्यान न लगा दे।

 

भारत में मौजूदा वक्त में जिन AI टूल्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, उनमें गूगल जेमिनी, ग्रोक, डीपसीक, Perplexity और चैटजीपीटी हैं। इनमें से एक भी कंपनी भारत की नहीं है। यानी भारत के लोग इन विदेशी कंपनियों के लिए ग्राहक की तरह हैं। ठीक वैसे ही जैसे भारत के इंटरनेट यूजर्स सोशल मीडिया के लिए विदेशी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं।  

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क्यों सर्विस प्रोवाइडर बना रह सकता है भारत?

 

पिछले दो-तीन साल में AI सेक्टर में और उससे पहले कई दशकों से IT सेक्टर में भारत बेहद मजबूत स्थिति में रहा है। भारत की स्थिति सर्विस के मुफीद बनी हुई है और इसका नुकसान यह हुआ है कि वह अपने प्रोडक्ट नहीं बना पाया है। उदाहरण के लिए, कंप्यूटर बनाने का काम ऐपल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों करती हैं और उनसे जुड़ी सर्विस और कंसल्टेंसी का काम भारतीय आईटी कंपनियों को मिलता है। नतीजा यह होता है कि 60 से 80 पर्सेंट कमाई विदेशी कंपनियों की होती है और भारतीय कंपनियां 10 से 15 प्रतिशत ही पैसे कमा पाती हैं।

 

AI के मामले में भी अभी तक यही देखने को मिला है। भले ही भारत अब बड़ा निवेश कर रहा है और AI ईकोसिस्टम तैयार कर रहा है लेकिन इस मामले में भी शायद भारत ने देर कर दी है। ज्यादातर लोग ऐसे टूल्स का इस्तेमाल करने के आदी हो चुके हैं जो काफी पहले से तैयार किए गए हैं और ट्रेनिंग के मामले में भी भारत के टूल्स से आगे हैं।

 

भारत सर्विस प्रोवाइडर क्यों बन सकता है, इसका एक उदाहरण यह भी है कि बहुत सारे देशों ने जब अपने लैंग्वेज मॉडल बनाए तो उनको ट्रेन करने का काम आउटसोर्स करके भारतीय कंपनियों को दे दिया। यानी प्रोडक्ट विदेश का और सर्विस प्रोवाइडर बना भारत। आने वाले वक्त में भी ऐसे कई सारे प्रोजेक्ट देखने को मिल सकते हैं। भारत की ज्यादातर बड़ी टेक कंपनियां भी NVIDIA जैसी दिग्गज कंपनियों के प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर रही हैं और उनके जरिए ही अपने सर्विस सेक्टर को मजबूत कर रही हैं।

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कहां फंस रहा है भारत?

 

पिछले 7-8 देश को देखें तो भारत लंबे समय से बहुत सारी चीजों के लिए आयात पर निर्भर रहा है। बीते एक-डेढ़ दशक में मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दिया जा रहा है लेकिन अभी भी GDP के आंकड़ों में यह सेक्टर बहुत ज्यादा योगदान नहीं दे पाया है। भारत AI से जुड़ी खोज के मामले में तो पीछे छूट चुका है लेकिन अब नजर इस सेक्टर में पकड़ बनाने पर है।

 

भारत के पीछे होने की सबसे बड़ी वजह है कि देश में रिसर्च पर खर्च बेहद कम है। इसी के बारे में ZOHO के फाउंडर श्रीधर वेंबु फोर्ब्स को दिए एक इंटरव्यू में कहते हैं, 'याहू ने सिस्को के लोगों को लिया, गूगल ने याहू के लोगों को लिया, फेसबुक ने गूगल से और ओपन एआई ने गूगल के लोगों को हायर किया लेकिन भारत के स्टार्टअप अगर कहीं से लोगों को हायर करना चाहें तो उनके पास यह 'कहीं' है ही नहीं। हमें इसे तैयार करना है।'

 

AI सेक्टर की बात करें सेमीकंडक्टर, GPU, लार्ज लैंग्वेज मॉडल, ऐप्लिकेशन और क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना पहली चीज है। दूसरी चीज यह है कि इन सभी चीजों के लिए बिजली, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। मौजूदा स्थिति में देखें तो भारत बड़े स्तर पर डेटा सेंटर बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में बिजली-पानी और अन्य मूलभूत सुविधाएं देने की स्थिति में नहीं है। यही वजह है कि उसका ध्यान सेक्टर आधारित लैंग्वेज मॉडल बनाने और सर्विस सेक्टर की ओर जा रहा है।

 

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क्या बोले PM मोदी?

 

AI इंपैक्ट समिट में जब पीएम मोदी ने अपनी बात रखी तब उन्होंने भी इन्हीं मुद्दों पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारत के टैलेंट पूल की तारीफ करते हुए कहा, 'हमारे पास टैलेंट भी है। एनर्जी कैपेसिटी भी है और पॉलिसी क्लैरिटी भी है। मुझे आपको यह बताते हुए खुशी भी है कि इस समिट में 3 भारतीय कंपनियों ने अपने AI मॉडल्स और ऐप्स लॉन्च किए हैं। ये मॉडल्स हमारे यूथ के टैलेंट को दिखाते हैं और भारत जो सॉल्यूशन्स दे रहा है, उसकी डेप्थ और डायवर्सिटी का भी प्रतिबिंब हैं।'

रिसर्च में कमजोर है भारत?

 

साल 2024 में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि भारत अपनी जीडीपी का सिर्फ 0.6 से 0.7 प्रतिशत हिस्सा ही रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च करता है। वहीं, अमेरिका, इसी काम पर GDP का 3.5 प्रतिशत, चीन अगस्त 2025 का डेटा बताता है कि साल 2010-11 में भारत में रिसर्च पर 60,196.75 करोड़ रुपये खर्च हो रहे थे जो 2020-21 में 1,27,380.96 करोड़ तक पहुंच गया।

 

2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक, चीन एक साल में 71 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च कर रहा था। लगभग इतनी ही रकम अमेरिका भी रिसर्च पर खर्च कर रहा था। अगर भारत से तुलना करें तो यह लगभग 50 गुना से भी ज्यादा है। 


भारत और AI मिशन

 

साल 2024 में भारत ने अपना AI मिशन शुरू किया। 10,372 करोड़ रुपये की लागत वाले इस मिशन का लक्ष्य देश में AI ईकोसिस्टम का विकास करना है। अब भारत सरकार का कहना है कि 38 हजार से ज्यादा GPU काम करने लगे हैं और इनके जरिए कॉमन कम्प्यूट फैसिलिटी तैयार की गई है। ये GPU भारत के स्टार्टअप्स को सस्ते रेट पर दिए जा रहे हैं। अभी तक 12 टीमों का चयन किया गया है ताकि वे स्वदेशी फाउंडेशनल मॉडल या लार्ज लैंग्वेज मॉडल बना सकें। अभी तक कुल 27 डेटा और AI लैब भी स्थापित की गई हैं।

 

इसके जरिए भारत सरकार की कोशिश है कि भारत अपना खुद का ओपन सोर्स AI ईकोसिस्टम बना सके जिसका इस्तेमाल सरकार संस्थाएं कर सकें और स्टार्टअप्स और रिसर्चर्स भी इसका इस्तेमाल कर सकें। इसके लिए भारत सरकार आर्थिक सहायता भी दे रही है। इसके तहत अभी तक कुल 12 संस्थाओं को लगभग 2190 करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं। इसमें सबसे ज्यादा 1058 करोड़ रुपये  Bharatgen को दिए गए हैं। 

क्या-क्या कर रहा है भारत?

 

भारत ने 38 हजार से ज्यादा GPU का एक पूल तैयार किया है जिन्हें सिर्फ 65 रुपये प्रति घंटे के किराए पर स्टार्टअप्स को दिया जा रहा है। AIKosh नाम  डेटासेट प्लेटफॉर्म तैयार किया गया है जिसमें 5500 से ज्यादा डेटासेट और 20 अलग-अलग सेक्टर के 251 AI मॉडल हैं। इसके अलावा, शैक्षणिक संस्थआनों में ट्रेनिंग, फेलोशिप और AI लैब्स के जरिए भी ईकोसिस्टम को मजबूत किया जा रहा है ताकि टैलेंट पूल तैयार होने के साथ-साथ AI से जुड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत हो और खुद के संसाधन विकसित किए जा सकें।

 

हालांकि, दुनिया के तमाम देश इस सेक्टर में लीड ले चुके हैं और अब भारत के पास सिर्फ कोर्स करेक्शन करना बचा है। अगर आने वाले समय में भारत AI से जुड़े अनोखे प्रोडक्ट नहीं बना पाता है तो भले ही भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ने का दावा करे लेकिन उसके पास ग्लोबल प्रोडक्ट नहीं होंगे। मौजूदा वक्त में भारत को ऐसे इनोवेशन की जरूरत है जिसकी जरूरत पूरी दुनिया को हो और उसके लिए दुनिया के देश भारत को मुंह मांगी रकम देने को तैयार हों।

 

 


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