पश्चिम बंगाल में 'M' फैक्टर से कैसे चुनाव SIR पर शिफ्ट हुआ? पूरी कहानी
पश्चिम बंगाल का पूरा चुनाव इस बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के इर्दगिर्द घूम रहा है। आखिर ऐसा क्यों, आइए समझते हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। Photo Credit: PTI
लोकसभा हो या विधानसभा, देश में जब-जब चुनाव होते हैं, कुछ सामाजिक प्रयोगों की सबसे ज्यादा चर्चा होती है। उनमें से ही एक फैक्टर 'एम' फैक्टर, भी है। इसे अलग-अलग संदर्भों में लोग समझते हैं। राजनीतिक तौर पर ध्रुवीकरण से बचने वाली पार्टियां, इसे महिला फैक्टर का नाम देती हैं, धार्मिक राजनीति करने वाली पार्टियां, इसे 'मुस्लिम' फैक्टर कहती है। पश्चिम बंगाल की स्थिति अलग है, यहां कई 'M' फैक्टर हैं जिनका चुनावी असर तय है लेकिन सबसे ज्यादा, M फैक्टर की नहीं, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की हो रही है।
राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मानना है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया में जानबूझकर अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलितों के वोट काटे गए, टीएमसी समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई की गई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, खुद आरोप लगा रहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग की मिलीभगत के वोट डालने योग्य मतदाताओं के नाम, वोटर लिस्ट से बाहर किए गए हैं।
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पश्चिम बंगाल में कितने M फैक्टर हैं, चर्चा क्या है?
पश्चिम बंगाल में 4 फैक्टर ऐसे हैं, जिन पर खूब चर्चा होती है। आलोचना भी होती है, सियासत भी इन्हीं के इर्दगिर्द होती है। मुस्लिम, मतुआ, मोदी और ममता। इस बार ये चार फैक्टर, SIR के आगे कहीं गुम हैं-
- मुस्लिम: पश्चिम बंगाल में मु्स्लिम आबादी 27 फीसदी के आसपास है। चुनाव में अहम फैक्टर है। मुस्लिम वोटरों का झुकाव, टीएमसी की तरफ रहा है। हर चुनाव में मुस्लिम फैक्टर पर राजनीति होती है, इस बार सारी राजनीति की धुरी SIR है।
- मतुआ: मतुआ वोटर करीब 55 सीटों पर मजबूत स्थिति में हैं। उत्तर 24 और नदिया जिले में मतुआ समुदाय का असर है। बीजेपी की तरफ झुकाव रहा है लेकिन TMC को भी ज्यादा उम्मीद इसी वर्ग से है। मतुआ अहम वोटर हैं फिर भी चर्चा, SIR की हो रही है।
- मोदी: भारतीय जनता पार्टी, पश्चिम बंगाल में भी पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। स्थानीय स्तर पर, ममता बनर्जी के कद का कोई नेता, अभी तक, पार्टी तैयार नहीं कर पाई है। TMC के लिए असली चुनौती पीएम मोदी की लोकप्रियता है। चुनाव में TMC मोदी फैक्टर पर कम, SIR पर ज्यादा जोर दे रही है।
- ममता: बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ममता बनर्जी है। पीएम मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ और स्मृति ईरानी जैसे दिग्गज नेताओं की पूरी टोली उतरती है, पश्चिम बंगाल में पार्टी कमाल नहीं कर पाती है। BJP के लिए ममता फैक्टर से पार पाना, हर बार मुश्किल रहता है। इस बार, इस फैक्टर से ज्यादा चर्चा SIR की है।
SIR पर क्यों शिफ्ट हो गया चुनाव?
विधानसभा चुनाव 2026 से पहले चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया विवादों में रही। बिहार में गलत तरीके से वोट काटने को लेकर राजनीतिक रैलियों की शुरुआत हुई, पश्चिम बंगाल में भी यह चुनावी मुद्दा बन गया। चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रकिया शुरू की। SIR का मकसद, डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित और अवैध वोटरों को हटाना था। नवंबर 2025 में जब यह प्रक्रिया, पश्चिम बंगाल में शुरू हुई, ममता बनर्जी विरोध में सड़कों पर उतर गईं। पश्चिम बंगाल में पहले 7.66 करोड़ वोटर थे। SIR के बाद कुल 90.66 लाख नाम हट गए हैं। अब योग्य वोटरों की संख्या 6.77 करोड़ रह गई है। यह प्रक्रिया नवंबर 2025 में शुरू हुई और अप्रैल 2026 तक चली। SIR में पहले चरण में 58 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए।
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क्यों हटाए गए हैं नाम?
चुनाव आयोग ने कहा जिन लोगों के नाम हटाए गए, उनमें घर के पते पर लगातार गायब रहने वाले लोग, चुनावी क्षेत्र से पलायन कर चुके लोग, मृत लोग और नकली वोटर शामिल थे। ड्राफ्ट लिस्ट में करीब 30 लाख वोटर ऐसे थे, जिनका लिंक 2002 की वोटर लिस्ट से नहीं मिला। 1.20 करोड़ से ज्यादा नामों में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी पाई गई। ऐसे नाम, जिनमें धांधलियां नजर आईं। कई नाम में अंतर रहा, कहीं लगातार अनुपस्थिति मुद्दा रहा। चुनाव आयोग की सुनवाई के बाद करीब 60 लाख और छंट गए।
चुनाव M फैक्टर से हटकर, यहां कैसे शिफ्ट हुआ?
तृणमूल कांग्रेस सरकार और ECI के बीच जब, जब लिस्ट आई, हंगामा बरपा। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 में एक फैसला किया। कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के 700 से ज्यादा जजों और पूर्व जजों को, विवादों के निपटारे की जिम्मेदारी सौंपी गई। 28 फरवरी की लिस्ट को अंतिम लिस्ट नहीं माना गया। कहा गया कि जिन नामों को यहां से क्लीन चिट मिलेगी, उनके नाम बाद में जारी होने वाली सप्लिमेंट्री लिस्ट में जोड दिए जाएंगे।
जजों ने करीब 60 लाख मामलों की सुनवाई की। 27 लाख नाम हटाए गए। जिनके नाम आज भी नहीं हैं, उनके लिए 19 विशेष ट्रिब्यूनल गठित किए गए। वे यहां अपील कर सकते थे। चुनाव के लिए अब वोटर लिस्ट फ्रीज हो गई है, कई लोग वोट नहीं डाल पाएंगे। अब सारी उम्मीद, 13 अप्रैल को होने वाली सुनवाई पर टिकी है। कुल मिलाकर SIR से 90.66 लाख हटाए गए हैं।
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ममता बनर्जी भड़की क्यों हैं?
ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के नेता सड़कों पर इसलिए उतरे हैं क्योंकि जिन जिलों में सबसे ज्यादा वोट कटे हैं, वे टीएमसी के कोर वोट बैंक कहे जाते हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे शहर, मुस्लिम बाहुल हैं। TMC का आरोप है कि नंदीग्राम जैसे इलाकों में ज्यादातर उन लोगों के नाम बाहर हुए जो मुस्लिम समुदाय से थे। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी साल 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 27 फीसदी है। कई नागरिक संगठनों और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि मुस्लिम और महिलाओं को टारगेट किया गया। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को एक सिरे से खारिज किया है। चुनाव आयोग का कहना है कि वैध आधार पर ही लोगों के नाम, मतदाता सूची से हटाए गए हैं।
TMC और BJP, 'M' फैक्टर नहीं, SIR पर भिड़े क्यों?
भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट से अवैध और फर्जी वोटरों को हटा दिया है। अब चुनाव साफ और निष्पक्ष तरीके से होगा। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग, बीजेपी के इशारे पर काम करता है। तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि जहां-जहां टीएमसी मजबूत स्थिति में है, वहीं लोगों के नाम बिना किसी कारण के बाहर किए गए हैं। TMC का दावा है कि कई जगहों पर उतने वोट बाहर किए गए हैं, जितना, 2021 के विधानसभा चुनाव में जीत-हार का अंतर रहा है। कुछ जगहों पर जितने वोटों से किसी प्रत्याशी को जीत मिली, उतने वोट काट दिए गए। अब 44 सीटें ऐसी हैं, जिन पर SIR का असर देखने को मिल सकता है।
TMC का यह भी तर्क है कि हटाए गए वोटों में से 63 फीसदी मतदाता हिंदू हैं, 34 फीसदी मतदाता मुसलमान हैं। TMC का कहना है कि मुस्लिमों का अनुपात उनकी आबादी से ज्यादा बताया जा रहा है। मतुआ इलाकों में महिलाओं के वोट काटे गए हैं। मतुआ, राजनीतिक तौर पर अब तक बीजेपी के साथ रहे हैं। अब बीजेपी का आरोप है कि ममता बनर्जी ने अवैध घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल में बसाया, उन्हें से अपना चुनावी लाभ ले रहीं थी, इसलिए उन्हें SIR जरूरी था। ममता का कहना है कि बीजेपी ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर, टीएमसी के वोट को ही बाहर कर दिया है। 13 अप्रैल को कई लोगों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल हो सकते हैं। 13 के बाद, यह विवाद और बढ़ सकता है।
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