लाला सुखीराम से रहमान डकैत, कैसे बदलते गए फिल्मों के विलेन? समझिए पूरा इतिहास
भारतीय फिल्मों में विलेन बने किरदारों पर नजर डालें तो समय के साथ इनमें गजब का बदलाव हुआ है। एक समय पर विलेन से डरने और नफरत करने वाला समाज और विलेन की एंट्री पर हीरो से ज्यादा ताली बजाता नजर आने लगा है।

बॉलीवुड के विलेन की कहानी, Photo Credit: Khabargaon
सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं होता। अक्सर कहा जाता है कि यह समाज का आईना होता है। यह लाइन घिसी-पिटी लग सकती है। एकदम क्लीशे भी लग सकती है लेकिन कहते हैं न, क्लीशे आर क्लीशेज़ फॉर ए रीज़न क्योंकि उनमें एक बुनियादी सच्चाई होती है। जब देश में जमींदारी का दर्द था तो विलेन लाला सुखीराम था। जब शहरों में कानून टूटा तो विलेन लायन और तेजा बन गया और आज? आज जब समाज कन्फ्यूज्ड है तो विलेन और हीरो का फर्क मिट गया है। एनिमल के रणविजय से लेकर धुरंधर के रहमान डकैत तक। आज हम इन किरदारों का एक्स-रे करेंगे। समझेंगे कि आखिर 2010 के बाद ऐसा क्या हुआ कि हमें बुराई में ही अपना अक्स दिखने लगा।
यह कहानी शुरू होती है उस भारत से जो अभी-अभी आज़ाद हुआ था। आंखों में सपना और पेट ख़ाली। देश गांवों में बसता था और गांव की सबसे बड़ी मुसीबत क्या थी? गरीबी। इस गरीबी का चेहरा कौन था? वह आदमी जिसके पास पैसा था- साहूकार। जिसे हम और आप लाला सुखीराम के नाम से जानते हैं। फिल्म थी मदर इंडिया (1957)। महबूब खान की इस फिल्म ने हमें हिंदी सिनेमा का पहला सबसे खौफनाक सामाजिक विलेन दिया। कन्हैयालाल ने इस किरदार को निभाया था। लाला सुखीराम कोई बंदूक लेकर नहीं घूमता था। न उसके पास कोई सेना थी। उसका हथियार था- बहीखाता और ब्याज। वह राधा (नरगिस के क़िरदार) को पैसे देता था लेकिन बदले में उसकी अस्मिता मांगता था।
लाला मुरलीधर ने 1899 में कांग्रेस के मंच से कहा था- "साहूकार एक अजीब जानवर है। उसके पास शेर के पंजे हैं, लोमड़ी का दिमाग है और बकरी का दिल है।" मदर इंडिया का सुखीराम बिल्कुल वैसा ही था। वह सिस्टम का हिस्सा था। उसे खत्म करना नामुमकिन था।
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यह वह दौर था जब समाज को लगता था कि हमारी मुसीबतों की जड़ सामंतवाद है। दो बीघा ज़मीन (1953) में ज़मींदार ठाकुर हरनाम सिंह को देखिए। वह सिर्फ ज़मीन नहीं हड़पता, वह किसान शंभू (बलराज साहनी के क़िरदार) की इज़्ज़त और अस्तित्व हड़प लेता है। शंभू को गांव छोड़कर शहर जाना पड़ता है। रिक्शा खींचना पड़ता है। विलेन ने हीरो को विस्थापित कर दिया। 50 के दशक का विलेन समाज के अंदर बैठा था। वह कोई बाहरी दुश्मन नहीं था। वह हमारा पड़ोसी था, जो अमीर था और क्रूर था।
बदलते गए विलेन
फिर 60 का दशक आया। देश बदल रहा था। शहर अपनी बाहें फैला रहा था। फैक्ट्रियां लग रही थीं तो विलेन गांव की चौपाल से उठकर शहर के क्लब में आ गया। उसने धोती-कुर्ता उतारा और सूट-बूट पहन लिया। साहूकारी छोड़कर इंडस्ट्रियलिस्ट या शहर का अमीरज़ादा बन गया और इस बदलाव का चेहरा बने- प्राण। फिल्म मधुमती (1958) और फिर 60 के दशक की फिल्मों में प्राण ने विलेन को स्टाइल दिया। वह सिगार पीता था, इंग्लिश बोलता था। एक क्लास शो-ऑफ करता था। वह हीरो की तरह ही स्मार्ट था, बस उसकी नीयत खराब थी। वह हीरोइन से शादी करना चाहता था, प्यार के लिए नहीं, बल्कि उसकी जायदाद हड़पने के लिए।
60 के दशक में एक बड़ा शिफ्ट आया। फिल्में कलरफुल हो गईं। कश्मीर की वादियों में शूटिंग होने लगी तो विलेन भी रंगीन हो गया। शम्मी कपूर की फिल्मों में विलेन अक्सर सूट पहनकर आता था और हीरो की बराबरी करता था। जैसे एन इवनिंग इन पेरिस (1967) में। वहां विलेन भारत में नहीं, पेरिस में बैठकर साज़िश रच रहा था। ये ग्लोबलाइजेशन की पहली आहट थी लेकिन 60 के दशक की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960) का राका (प्राण) आखिर में पुलिस के सामने सरेंडर कर देता है। यानी विलेन आखिर में सुधर जाता था। क्यों? क्योंकि उस वक्त हमें कानून और सिस्टम पर भरोसा था। हमें लगता था कि अगर कोई बुरा काम करेगा, तो कानून उसे सज़ा देगा या वह खुद सुधर जाएगा लेकिन फिर आया 70 का दशक और सब कुछ बदल गया।
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मोहभंग। यह 70 के दशक का सबसे बड़ा शब्द था। नेहरूवियन सोशलिज्म का सपना देख रहे समाज को कोई हिला-डुला कर नींद से उठाने लगा। ख़्वाब दरकने लगे। नौकरियां नहीं थीं। मंहगाई बढ़ रही थी। जनता को समझ आ गया था कि कानून और सिस्टम उनकी मदद नहीं करने वाला। पुलिस या तो भ्रष्ट थी या लाचार। एक गुस्सा पनपा। इस गुस्से से निकला नया विलेन। वह जो सिस्टम के बाहर था। वह जो अपना कानून खुद बनाता था।
तेजा और गब्बर सिंह
साल 1973। फिल्म ज़ंजीर। विलेन का नाम- तेजा (अजीत)। वह शहर के बीचों-बीच सोने के बिस्कुट की तस्करी करता था लेकिन दिन में वह एक इज्ज़तदार बिजनेसमैन था। तेजा ने हमें सिखाया कि विलेन अब अंडरवर्ल्ड चलाता है। वह कूल है। वह मोना डार्लिंग के साथ स्विमिंग पूल के किनारे व्हिस्की पीता है। उसका अड्डा ज़मीन के नीचे होता है और वह हीरो (अमिताभ बच्चन) को खरीदने की कोशिश करता है लेकिन इस दशक का और शायद हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा धमाका अभी बाकी था। 15 अगस्त 1975। फिल्म शोले रिलीज़ हुई और हमें मिला- गब्बर सिंह।
गब्बर सिंह सिर्फ एक डाकू नहीं था। वह एक फिनोमिना था। अमजद खान ने जिस तरह उसे निभाया, उसने विलेन की परिभाषा बदल दी। गब्बर को पैसे का लालच नहीं था। उसे ज़मीन नहीं चाहिए थी। उसे चाहिए था- खौफ। ऐसी दहशत कि "पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रोता है।।।" तो मां कहे कि बेटा सो जा वरना गब्बर आ जाएगा। यह लाइन सिर्फ डायलॉग नहीं थी, ये उस दौर की अराजकता की कहानी थी। एक ही लाइन में।
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गब्बर सिंह, 50 के दशक के साहूकार से एकदम अलग था। साहूकार कानून का इस्तेमाल करके शोषण करता था। गब्बर कानून को मानता ही नहीं था। उसने ठाकुर के हाथ काट दिए। ठाकुर जो कभी पुलिस वाला था। जिसे ग़ुमान था कि कानून के हाथ लंबे होते हैं। गब्बर ने वह हाथ काट दिए। शोले का विलेन इतना बड़ा हो गया कि उसके सामने हीरो (जय और वीरू) छोटे लगने लगे। ध्यान दीजिए, जय और वीरू खुद अपराधी थे। समाज के रिजेक्टेड लोग। 70 के दशक का संदेश साफ़ था- एक बड़े राक्षस (गब्बर) को मारने के लिए आपको साधु-संत नहीं, बल्कि छोटे राक्षसों (जय-वीरू) की ज़रूरत है। लोहा ही लोहे को काटता है।
70 के दशक ने हमें स्मगलर और डकैत दिए। दीवार (1975) में डावर और सामंत जैसे विलेन आए जो स्मगलिंग के बादशाह थे। हाजी मस्तान जैसे असल ज़िंदगी के डॉन की कहानियां परदे पर उतरने लगीं। विलेन अब पहाड़ों या बीहड़ों में नहीं, बल्कि बम्बई की ऊंची इमारतों में, एयर-कंडीशंड कमरों में बैठने लगा। वह अब सोना स्मगल करता था।
समय के साथ बदलते विलेन
इस दौर में विलेन का एक और साथी उभरा- उसका हेन्चमैन। वह आदमी जो विलेन का गंदा काम करता था। शेट्टी, गंजा सर, खूंखार आंखें। वह ज्यादा बोलता नहीं था, सिर्फ मारता था। विलेन दिमाग था, तो हेन्चमैन उसकी ताकत। डॉन (1978) में शाकाल को याद कीजिए। या मिस्टर इंडिया का बॉप क्रिस्टो। ये वे लोग थे जिन्होंने एम्पायर ऑफ ईविल को खड़ा किया।
70 के दशक के अंत तक आते-आते, विलेन इतना ताकतवर हो गया था कि उसे हराने के लिए हीरो को अपनी जान देनी पड़ती थी। शोले में जय मरता है। दीवार में विजय मरता है। अच्छाई की जीत तो होती थी लेकिन बहुत बड़ी कीमत चुकाकर। यह उस दौर की निराशा थी। हमें पता था कि बुराई इतनी मज़बूत है कि उससे लड़ते हुए हम शायद ज़िंदा न बचें लेकिन 80 का दशक दस्तक दे रहा था और देश का माहौल और ज्यादा खराब होने वाला था। राजनीति और अपराध का नेक्सस बनने वाला था और विलेन अब खादी पहनने वाला था। वह अब ख़ुद ही कानून बनाता था और ख़ुद ही तोड़ता था।
70 के दशक का गुस्सा 80 के दशक की हताशा में बदल रहा था। राजनीति और अपराध की सीमा रेखा धुंधली हो रही थी। अखबारों की हेडलाइन चीख रही थी। पंजाब में आतंकवाद सिर उठा रहा था। मुंबई में अंडरवर्ल्ड अपनी जड़ें जमा रहा था और दिल्ली के गलियारों में सत्ता के समीकरण बिगड़ रहे थे। जाहिर है, सिनेमा का विलेन भी बदलने वाला था। अब उसे बीहड़ में छिपने की ज़रूरत नहीं थी। अब वह संसद में बैठने की तैयारी कर रहा था।
समाज की तस्वीर बने फिल्मी विलेन
यह वह दौर था जब खादी और खाकी का एक Nexus बन रहा था। और इस नेक्सस का सबसे खौफनाक चेहरा बनकर उभरा- रामा शेट्टी। साल 1983। फिल्म अर्ध सत्य। डायरेक्टर गोविंद निहलानी। रामा शेट्टी का किरदार निभाया सदाशिव अमरापुरकर ने। रामा शेट्टी कोई आम गुंडा नहीं था। वह एक लोकल लीडर था। वह चिल्लाता नहीं था। वह धमकी भी बहुत प्यार से देता था। जब पुलिस इंस्पेक्टर अनंत वेलणकर (ओम पुरी) उसके आदमियों को पकड़ता है, तो शेट्टी उसे डांटता नहीं है। वह उसे शाबाशी देता है। कहता है- "ठीक किया, आपने अपनी ड्यूटी की।" लेकिन अगले ही पल वह सिस्टम का ऐसा पेंच घुमाता है कि उसी पुलिस वाले को मुजरिमों को छोड़ना पड़ता है।
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80 के दशक का विलेन अब कानून से डरता नहीं था। वह कानून को अपनी जेब में रखता था। रामा शेट्टी चुनाव लड़ता है। जीतता है और पुलिस इंस्पेक्टर को अपनी सुरक्षा में तैनात करवा लेता है। जो हाथ उसकी गिरेबान पकड़ने की हुज्जत कर रहे थे, उनसे ही वह सलामी ठोकवाता है। यह उस दौर का सबसे कड़वा सच था। शाह कमीशन की रिपोर्ट (1978) ने पहले ही कह दिया था कि पुलिस अब कानून के हिसाब से नहीं, बल्कि नेताओं के इशारों पर काम कर रही है। अर्ध सत्य ने इसी डर को परदे पर उतारा। विलेन अब बाहर नहीं था, वह सिस्टम के अंदर था। वह सफेद कपड़े पहनता था। समाज सेवा की बातें करता था और अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था।
80 का दशक सिर्फ राजनीति के अपराधीकरण का नहीं था। यह आतंकवाद के उदय का भी दौर था। दुनिया भर में जहाज़ हाइजैक हो रहे थे। बम धमाके हो रहे थे। टेक्नोलॉजी बढ़ रही थी तो हमारा विलेन भी हाई-टेक हो गया। अब उसे लाठी-डंडों से काम नहीं चलाना था। उसे चाहिए थे- मिसाइल और परमाणु बम।
सुभाष घई की फिल्म कर्मा (1986) को याद कीजिए। विलेन का नाम- डॉ. डैंग। अनुपम खेर ने इस किरदार में जान फूंक दी थी। डॉ. डैंग किसी गांव का ज़मींदार नहीं था। वह एक पढ़ा-लिखा डॉक्टर था लेकिन उसका दिमाग विनाश की योजना बना रहा था। जब वह जेल जाता है, तो वहां भी वीआईपी ट्रीटमेंट मांगता है। जेलर (दिलीप कुमार) को थप्पड़ मारने पर वह कहता है- "डॉ. डैंग को आज पहली बार किसी ने थप्पड़ मारा।" डॉ. डैंग ने विलेन को लोकल से इंटरनेशनल बना दिया। वह कहता था- "मैं इस देश के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।" उसका अड्डा भारत की सीमा के पार था। उसके पास हेलीकॉप्टर थे। साइंस लैब थी। वह रिमोट कंट्रोल से तबाही मचाना चाहता था। 80 के दशक में समाज को जिस अदृश्य दुश्मन का डर था, डॉ. डैंग उसी का चेहरा था।
मोगैंबो ने बदल दिया खेल
फिर आया वह विलेन, जिसे हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे रंगीन और खतरनाक विलेन कहा जा सकता है। साल 1987। फिल्म मिस्टर इंडिया। विलेन- मोगैंबो। अमरीश पुरी ने मोगैंबो को एक कल्ट बना दिया। उसका हुलिया देखिए। सुनहरे बाल। अजीबो-गरीब मिलिट्री ड्रेस। एक सिंहासन और उसके सामने एक बड़ा सा ग्लोब। मोगैंबो भारत को नहीं, पूरी दुनिया को जीतना चाहता था। उसका डायलॉग- "मोगैंबो खुश हुआ"- आज भी बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। मोगैंबो के पास अपनी एक अलग दुनिया थी। एक ऐसा द्वीप जहां मिसाइलें तैयार हो रही थीं। उसके पास ऐसिड टैंक थे। उसके चेले उसे हैल मोगैंबो कहकर सलाम करते थे।
मोगैंबो ने विलेन को लार्जर देन लाइफ बना दिया। वह क्रूर था। वह बच्चों को भूखा मार सकता था। बम धमाके करवा सकता था लेकिन साथ ही उसमें एक अजीब सा पागलपन था। वह खुद को भगवान समझता था। 80 के दशक के विलेन की खासियत यही थी- उनके पास टेक्नोलॉजी, पैसा और पागलपन था। शान (1980) का शाकाल (कुलभूषण खरबंदा) याद है? वह अपने दुश्मनों को मगरमच्छों के सामने फेंक देता था। वह एक रिवॉल्विंग चेयर पर बैठकर, कैमरों और गैजेट्स के जरिए अपनी दुनिया चलाता था। विलेन अब स्मार्ट हो चुका था।
जैसे-जैसे 80 का दशक खत्म होने को आया, कहानी में एक और ट्विस्ट आया। राजनीति और आतंकवाद के साथ-साथ, अब विलेन ने वर्दी पहन ली थी। अंधा कानून (1983) और फूल बने अंगारे (1991) जैसी फिल्मों में हमने देखा कि पुलिस वाला ही सबसे बड़ा गुंडा बन गया है। प्रेम चोपड़ा और अमरीश पुरी जैसे एक्टर्स ने इन किरदारों को बखूबी निभाया। समाज का भरोसा हर संस्थान से उठ रहा था। जज बिक रहे थे। पुलिस वाले अपराधी थे। और नेता स्मगलर थे।
हीरो ही बन गया विलेन
आया 90 का दशक। ग्लोबलाइजेशन ने दस्तक दी। बाज़ार खुले। नई उम्मीदें जागीं लेकिन साथ ही आया एक कन्फ्यूजन। वह लकीर जो हीरो और विलेन को बांटती थी, वह मिटने लगी। अभी तक हीरो वह था जो मर्यादा पुरुषोत्तम था और विलेन वह था जो रावण था लेकिन 1993 में दो फिल्में आईं जिन्होंने इस गणित को बिगाड़ दिया। बाज़ीगर और डर। शाहरुख खान। वह चेहरा जिसे आज हम किंग ऑफ रोमांस कहते हैं लेकिन 90 की शुरुआत में उन्होंने हमें सिखाया कि हीरो भी विलेन हो सकता है। बाज़ीगर (1993) में अजय शर्मा (शाहरुख) अपनी ही गर्लफ्रेंड को छत से नीचे फेंक देता है। वह हत्या करता है। धोखा देता है। लेकिन फिर भी ऑडियंस को उससे हमदर्दी होती है। क्यों? क्योंकि उसके पास एक वजह थी। उसके पिता के साथ गलत हुआ था।
डर (1993) में राहुल मेहरा (शाहरुख) कोई क्रिमिनल नहीं था। वह एक प्रेमी था लेकिन उसका प्यार पगलैती से भरा जुनून बन गया था। वह "क-क-क-किरण" कहते हुए अपनी प्रेमिका को डराता था। वह हीरो (सनी देओल) को मारने की कोशिश करता था। यश चोपड़ा की इस फिल्म ने विलेन को एक साइकोलॉजिकल रूप दे दिया। अब विलेन कोई बाहरी दुश्मन नहीं था। वह हमारे अंदर का डर था। हमारा अपना पागलपन था।
जावेद अख्तर ने एक बार कहा था- "2001 तक आते-आते हीरो और विलेन की इमेज बहुत कन्फ्यूज्ड हो गई। क्योंकि समाज के Do’s and Don'ts नियम धुंधले पड़ गए।” 90 के दशक में संजय दत्त खलनायक (1993) बनकर आए। फिल्म के टाइटल में ही हीरो को खलनायक कहा गया। वह आतंकवादी था, पुलिस से भाग रहा था, लेकिन दिल का बुरा नहीं था। यही वह दौर था जब एंटी-हीरो का जन्म हुआ। वह हीरो जो शराब पीता था, जुआ खेलता था, कानून तोड़ता था लेकिन फिर भी हम उसे प्यार करते थे क्योंकि वह हमें असली लगता था। परफेक्ट राम अब बोरिंग हो रहे थे। हमें अब अपने जैसा डिफेक्टिव इंसान परदे पर चाहिए था।
2000 के बाद के विलेन
पिक्चर अभी बाकी थी। 2000 का दशक आने वाला था। मल्टीप्लेक्स खुलने वाले थे। दिल चाहता है और लगान जैसी फिल्में आने वाली थीं और एक समय ऐसा आने वाला था जब लगने लगा कि बॉलीवुड से विलेन गायब ही हो गया है। फिल्मों में विलेन की जगह हालात ने ले ली थी लेकिन क्या बुराई कभी खत्म होती है? नहीं। वह बस रूप बदलती है और उसने रूप बदला। 2010 के बाद। जब विलेन वापस आया, तो वह पहले से ज्यादा ताकतवर, ज्यादा क्रूर और ज्यादा कूल बनकर आया। वह दौर जब हीरो ने ही विलेन का नकाब पूरी तरह पहन लिया। एनिमल के रणविजय से लेकर धुरंधर के रहमान डकैत तक। यह नया विलेन कौन है और हम इसे इतना पसंद क्यों कर रहे हैं?
नब्बे के दशक में शाहरुख खान ने विलेन को ग्लैमर दिया था लेकिन जैसे ही नई सदी शुरू हुई, यानी साल 2000 आया, हिंदी सिनेमा में एक अजीब घटना घटी। विलेन अचानक गायब हो गया। यह वह दौर था जब मल्टीप्लेक्स कल्चर आ रहा था। फिल्में अब ऐक्शन से ज्यादा इमोशन पर चल रही थीं। करण जौहर और आदित्य चोपड़ा का राज था। कभी खुशी कभी गम या दिल चाहता है जैसी फिल्मों को याद कीजिए। इनमें कोई मोगैंबो नहीं था। कोई गब्बर सिंह नहीं था। इनमें विलेन कौन था? हालात। या फिर कोई सख्त पिता जो शादी के खिलाफ था।
पुराने जमाने के खूंखार विलेन अब कॉमिक कैरेक्टर बन गए थे। उन्हें फिल्मों में सिर्फ हंसी-मजाक के लिए रखा जाता था या फिर वे कहानी के साइडलाइन में खड़े रहते थे। लगा कि हिंदी सिनेमा अब अच्छाई की दुनिया में बस गया है। जहां सब कुछ फील गुड है लेकिन शांति ज्यादा दिन नहीं टिकती। तूफान आने वाला था और यह तूफान आया साल 2010 में। फिल्म थी- दबंग। इस फिल्म ने बाजी पलट दी। इसने 70 और 80 के दशक के विलेनियस फेस की वापसी कराई। सोनू सूद ने छेदी सिंह का किरदार निभाया। वह पूरी तरह डार्क था। ताकतवर था लेकिन यहां एक पेच था। फिल्म का हीरो, चुलबुल पांडे (सलमान खान), कोई मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं था। वह एक भ्रष्ट पुलिसवाला था। वह गुंडों से पैसा लेता था। कानून को अपने हिसाब से तोड़ता था।
क्रिटिक्स ने इसे "One Grey, One Black" फॉर्मूला कहा। यानी विलेन तो बुरा है ही लेकिन हीरो भी दूध का धुला नहीं है। वह ग्रे है। चुलबुल पांडे की हरकतें- मार-पीट, ब्लैकमेल- सब कुछ विलेन जैसी थीं। बस फर्क ये था कि वह आखिर में एक बड़े विलेन को मारता था। पब्लिक को यह नया ज़ायका पसंद आया। उन्हें समझ आ गया कि बुराई को मारने के लिए अच्छाई नहीं, बल्कि बड़ी बुराई की ज़रूरत है।
इसके ठीक बाद 2011 में आई सिंघम। अजय देवगन बाजीराव सिंघम बने और उनके सामने था- जयकांत शिकरे (प्रकाश राज)। जयकांत शिकरे ने विलेन को वापस सेंटर स्टेज पर ला खड़ा किया। वह सिर्फ हीरो से पिटने के लिए नहीं था। उसका अपना स्वैग था। अपनी फिलॉसफी थी। 2012 में अग्निपथ का रीमेक आया। संजय दत्त ने कांचा चीना का रोल किया लेकिन यह पुराने कांचा जैसा नहीं था। यह गंजा था, कानों में बालियां थीं। वह किसी वाइकिंग जैसा दिखता था। उसने साबित कर दिया कि विलेन का डरावना दिखना और होना, अब फिर से कूल है लेकिन असली बदलाव अभी बाकी था। 2010 के बाद सिनेमा ने एक नई करवट ली। अब सवाल यह नहीं था कि विलेन कौन है। सवाल यह था कि हीरो कौन है?
विलेन का चरित्र बदल गया
2015 आते-आते हीरो की परिभाषा बदलने लगी। वरुण धवन ने बदलापुर (2015) की। वहां वह एक चॉकलेटी बॉय नहीं, बल्कि एक इंतकाम लेने वाला खूनी बन गया। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने रमन राघव 2.0 (2016) में एक सीरियल किलर का रोल किया लेकिन उसे एक राक्षस की तरह नहीं, बल्कि एक मानसिक रूप से बीमार इंसान की तरह दिखाया गया। यह शिफ्ट बहुत गहरा था। अब विलेन मूंछें ऐंठने वाला ज़मींदार नहीं था। अब विलेन इंसान था। उसके पास अपनी कहानी थी। अपनी मजबूरी थी और दूसरी तरफ, हीरो अब देवता नहीं था। वह भी गलतियां करता था। ये दोनों उसी भीड़ का चेहरा थे जिसे हम रोज़ देखते हैं।
इस दौर का सबसे बड़ा धमाका हुआ 2019 में। फिल्म- कबीर सिंह। कबीर सिंह (शाहिद कपूर) हीरो था लेकिन उसकी हरकतें देखिए। वह एरोगेंट था। शराब के नशे में रहता था। वायलेंट था। अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ज़बरदस्ती करता था। चाकू की ज़ोर पर लड़की के साथ सेक्स करना चाहता था। 90 के दशक में ऐसे किरदार विलेन होते थे लेकिन 2019 में यह हीरो था और सबसे बड़ी बात- ये फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई। क्रिटिक्स ने कहा कि कबीर सिंह दरअसल एक "विलेन है जिसे हीरो बनाकर पेश किया गया है"। उस पर टॉक्सिक मस्कुलैनिटी को बढ़ावा देने के आरोप लगे लेकिन करोड़ों दर्शकों, खासकर युवाओं ने उसे पसंद किया। क्यों? क्योंकि समाज बदल चुका था। ग्लोबलाइजेशन और इंटरनेट के दौर में ऑडियंस अब नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम देख रही थी। उन्होंने ब्रेकिंग बैड का वॉल्टर व्हाइट देखा था। जोकर (Joker) देखा था। उन्हें समझ आ गया था कि दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट नहीं है। दुनिया ग्रे है। उन्हें अब ऐसे किरदार चाहिए थे जो असली लगें। जिनके अंदर खामियां हों। जो परफेक्ट न हों।
एक फिल्ममेकर ने कहा था- "आज का हीरो हर चीज़ में सही नहीं हो सकता। वह दौर चला गया। लोग अब डिफेक्टिव पीस से रिलेट करते हैं।" यहीं से नींव पड़ी उस दौर की, जिसे हम आज देख रहे हैं। कबीर सिंह ने दरवाजा खोला और सिनेमा हॉल में दाख़िल हुआ एक जानवर। 2023 में एनिमल रिलीज़ हुई। जहां हीरो अपने बाप के लिए दुनिया जला देने की बात कह रहा है। जहां वह मशीनगन लेकर सैकड़ों लोगों को मार देता है और उसे कोई पछतावा नहीं होता। उल्टे कहता है कि अभी तो ये शुरुआत है।
संदीप रेड्डी वांगा की एनिमल ने रणबीर कपूर को एक ऐसे अवतार में पेश किया जो खून से लथपथ था। वह नैतिक रूप से गलत था लेकिन फिर भी वह फिल्म का प्रोटागोनिस्ट था। कुछ लोगों ने इसे मिसोजिनिस्ट कहा, कुछ ने इसे टॉक्सिक कहा। रणबीर कपूर ने खुद माना कि इंडस्ट्री के कई लोग उनसे निराश थे लेकिन बॉक्स ऑफिस के आंकड़े कुछ और कह रहे थे। वह कह रहे थे कि हिंदुस्तान अब मर्यादा देखने नहीं आता। वह अब अपने अंदर के जानवर को परदे पर देखने आता है। वह अब उस विलेन को पसंद करता है जो हीरो से ज्यादा ताकतवर, ज्यादा समझदार और ज्यादा रिलेटेबल है। वह जानवरों से भरे पार्क को देखना चाहते हैं। वांगा बना भी रहे हैं एनिमल पार्क।
आखिर किस ओर जा रही फिल्मी दुनिया?
इसी कड़ी का सबसे ताज़ा और सबसे दिलचस्प उदाहरण है- 2025 की फिल्म धुरंधर। और अक्षय खन्ना का किरदार रहमान डकैत। जिसने हीरो और विलेन की बहस को ही खत्म कर दिया। ये नया विलेन कौन है? ये पुराने विलेन से कैसे अलग है? और क्यों आज इंटरनेट पर लोग हीरो को छोड़, इस विलेन के दीवाने हो रहे हैं? कबीर सिंह और एनिमल ने एक बात साफ़ कर दी थी। अब परदे पर शराफत के नंबर नहीं मिलते। अब नंबर मिलते हैं पागलपन के, खौफ के। और साल 2025 आते-आते ये ट्रेंड अपने चरम पर पहुंच गया।
दिसंबर 2025। धुरंधर रिलीज हुई। डायरेक्टर आदित्य धर। हीरो- रणवीर सिंह लेकिन जब लोग थियेटर से बाहर निकले तो वे हीरो की बातें नहीं कर रहे थे। वे बात कर रहे थे फिल्म के विलेन की। अक्षय खन्ना। किरदार का नाम- रहमान डकैत। वह कोई आम गुंडा नहीं था। वह एक पाकिस्तानी क्राइम लॉर्ड था लेकिन 80 के दशक के विलेन की तरह वह चिल्ला नहीं रहा था। वह अजीबोगरीब कपड़े नहीं पहने हुए था। वह शांत था। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। क्रिटिक्स ने कहा- "अक्षय खन्ना ने हीरो को ही साइडलाइन कर दिया।"
सोशल मीडिया पर एक शब्द ट्रेंड करने लगा- ऑरा (Aura)। रहमान डकैत जब स्क्रीन पर आता था, तो हीरो फीका लगने लगता था। इंटरनेट ने दिसंबर 2025 को "अक्षय खन्ना का साल" घोषित कर दिया क्योंकि इसी साल उन्होंने फिल्म छावा में भी एक खूंखार विलेन का रोल किया था। यह बदलाव बहुत बड़ा था। एक ज़माना था जब विलेन को देखकर डर लगता था। हमें नफरत होती थी। हम चाहते थे कि हीरो उसे मारे लेकिन 2025 का विलेन? उसे देखकर हमें नफरत नहीं, बल्कि मज़ा आ रहा है। एक आर्टिकल में लिखा गया- "अचानक, बुरा बनना फिर से कूल हो गया है।"
आखिर हम यहां कैसे पहुंचे? 1950 के लाला सुखीराम से लेकर 2025 के रहमान डकैत तक। ये सफर सिर्फ सिनेमा का नहीं है। यह हमारे समाज के मनोविज्ञान का सफर है। पहली वजह है- एक्सपोज़र। आज की जनरेशन नेटफ्लिक्स और ग्लोबल सिनेमा देखकर बड़ी हुई है। उन्होंने जोकर देखा है। मनी हाइस्ट देखी है। उन्हें पता है कि दुनिया में कोई भी इंसान पूरी तरह सफेद या काला नहीं होता। सब ग्रे है। इसलिए जब परदे पर कोई परफेक्ट हीरो आता है, तो वह हमें झूठ लगता है। नकली लगता है।
दूसरी वजह है- गुस्सा और हताशा। आज का समाज सिस्टम से नाराज है। भ्रष्टाचार है। नाइंसाफी है। ऐसे में जब हम परदे पर किसी विलेन या एंटी-हीरो को नियम तोड़ते हुए देखते हैं, तो हमें अजीब सा सुकून मिलता है। हमें लगता है कि जो काम हम असल ज़िंदगी में नहीं कर पा रहे, वह ये किरदार परदे पर कर रहा है। वह सिस्टम को ठेंगा दिखा रहा है।
फिल्ममेकर मधुर भंडारकर कहते हैं- "दिन के अंत में, लोग अच्छी कहानियों और गहरे किरदारों से जुड़ते हैं। चाहे वह पछतावा करने वाला एंटी-हीरो हो या आज का टॉक्सिक लीड। लोग उसमें अपनी परछाई देखते हैं।" आज का विलेन हमें ये बताता है कि इंसान जटिल है।। वह हमें बताता है कि अच्छाई का नकाब ओढ़ने वाले हीरो से ज्यादा ईमानदार वह विलेन है जो अपनी बुराई को खुलकर स्वीकार करता है। रहमान डकैत हो या मोगैंबो- ये किरदार इसलिए अमर हो गए क्योंकि इन्होंने हमें वह दिखाया जो हम देखना चाहते थे लेकिन मानने से डरते थे।
सिनेमा का ये चक्र पूरा हो चुका है। जो कल गलत था, वह आज स्टाइल है। जो कल विलेन था, वह आज शो-स्टॉपर है और जब तक समाज में उथल-पुथल रहेगी, तब तक परदे पर विलेन का कद हीरो से बड़ा ही रहेगा।
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