पंजाब के 1995 के जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड पर बनी फिल्म सतलुज पर रिलीज के दो दिन बाद ही रोक लग गई है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ मेन लीड में हैं। लोग फिल्म को हटाने को लेकर अब सवाल उठा रहे हैं। एनडीटीवी के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर आदित्य राज कौल से बात करते हुए सीनियर जर्नलिस्ट सतिंदर बैंस ने कहा कि फिल्म को रोकना सरकार की बहुत बड़ी भूल थी। बैंस वही पत्रकार हैं जिन्होंने सबसे पहले इस हत्याकांड की खबर दी थी। उनका कहना है कि इस रोक की वजह से अब यह फिल्म व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा शेयर की जा रही है और पंजाब के उस समय की बातें फिर से चर्चा में हैं।
सतिंदर बैंस ने फिल्म देखी है। उन्होंने बताया कि इसकी कहानी असल घटनाओं से काफी मिलती है। उन्होंने उन बातों को गलत बताया जिनमें कहा जा रहा है कि फिल्म से दंगे या गलत काम बढ़ते हैं। बैंस के मुताबिक फिल्म में बस कुछ छोटी चीजें अलग हैं जैसे गोली किस अफसर ने चलाई या फिर एक पूर्व मुख्यमंत्री का सीन। इस फिल्म से नई पीढ़ी को पंजाब के उस समय का पता चल रहा है। शिरोमणि अकाली दल चुनाव में इसका फायदा उठाना चाहती है। बैंस ने यह भी याद दिलाया कि उस समय पंजाब और दिल्ली दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी।
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खालड़ा का काम
जसवंत सिंह खालड़ा पहले बैंक में काम करते थे। बाद में वह समाज की भलाई के लिए काम करने लगे। उन्होंने पता लगाया कि पंजाब में बहुत से अनजान लोगों को बिना बताए चुपचाप जला दिया गया था। खालड़ा का कहना था कि ऐसे 6,500 लोग थे। कुछ और लोगों ने यह संख्या इससे भी ज्यादा बताई थी। पुलिस के बड़े अफसरों ने उन्हें काम रोकने की धमकी दी लेकिन वह नहीं माने। फिर सितंबर 1995 में उन्हें उनके घर के बाहर से उठा लिया गया।
सतिंदर बैंस ने 5 मई 1996 को द इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर छापी थी। बैंस ने ही स्पेशल पुलिस ऑफिसर कुलदीप सिंह को ढूंढा था। कुलदीप सिंह उस अफसर का ड्राइवर था जिस पर हत्या का आरोप लगा था। कुलदीप सिंह की गवाही से ही सीबीआई को सबसे बड़ा सबूत मिला। इसी की वजह से पांच पुलिस वालों को उम्रकैद की सजा हुई। बैंस ने बताया कि कुलदीप सिंह को वह सुरक्षा और नौकरी में बढ़त नहीं मिली जिसका वादा किया गया था। बाद में कुलदीप सिंह की भी हत्या कर दी गई थी।
हत्या की पूरी बात
पत्रकार बैंस ने बताया कि खालड़ा को कई हफ्तों तक बहुत परेशान किया गया था। अक्टूबर 1995 के आखिर में उन्हें पुलिस स्टेशन के भीतर ही गोली मार दी गई। गवाह के अनुसार उनके शव को ऐसी जगह फेंका गया था जहां से नदी उन्हें पाकिस्तान की तरफ ले जाए। बैंस ने दावा किया कि उस समय के बड़े अफसर केपीएस गिल ने ही खालड़ा को मारने का आदेश दिया था। हालांकि इसका कोई पक्का सबूत कभी नहीं मिला। गिल हमेशा यही कहते थे कि वो खालड़ा को जानते तक नहीं थे।
इस केस में एक बड़ी बात यह है कि जिन अफसरों को सजा हुई, उनमें से डीएसपी जसपाल सिंह साल 2023 में जेल से बाहर आया था और तब से गायब है। बैंस ने अपने न्यूज पोर्टल पंजाब न्यूज एक्सप्रेस पर लिखा है कि उसे पकड़ने की कोई खास कोशिश नहीं की गई है।
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उस दौर की हकीकत
सतिंदर बैंस ने 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत का जिक्र करते हुए बताया कि उस दौर में आम लोग और हिंदू समाज बहुत डरे हुए थे। उस समय आतंकवादी हर जगह पाबंदियां और कपड़ों के नियम थोपते थे। बैंस ने माना कि आतंकवाद के खिलाफ पुलिस का एक्शन जरूरी था लेकिन उस दौरान पुलिस ने भी कानून तोड़कर हिरासत में बहुत गलत काम किए। पुलिस ने बिना किसी गलती के लोगों को बहुत परेशान किया। इन जुल्मों का हिसाब कभी पूरी तरह नहीं लिया गया और यह फिल्म उन्हीं अनकहे घावों को फिर से सामने ला रही है।