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क्या नाटो से अमेरिका को अलग कर सकते हैं ट्रंप, तुर्की क्यों टेंशन में?

नाटो से अमेरिका को अलग करने की ट्रंप की ख्वाहिश पुरानी है। ईरान युद्ध ने उन्हें एक और मौका दे दिया है। मगर कानूनी तौर पर यह करना आसान नहीं होगा। समझते हैं पूरा मामला।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (Photo Credit: PTI)

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने पश्चिमी सहयोगियों से नाखुश हैं। ब्रिटेन और फ्रांस के खिलाफ वह सार्वजनिक तौर पर अपना गुस्सा जाहिर कर चुके हैं। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बातचीत में भी ट्रंप नाटो से अमेरिका को अलग करने की बात कह चुके हैं। यह कोई पहली बार नहीं जब ट्रंप के निशाने पर नाटो आया है। वह लंबे समय से फिजूलखर्ची और नाटो के बाकी सदस्यों से कम फंडिंग का मुद्दा उठाते रहे हैं।

 

हाल ही में ट्रंप ने नाटो से अमेरिका  को अलग करने के संकेत दिए हैं। अगर ऐसा हुआ तो यह पश्चिम देशों की सुरक्षा को बड़ा खतरा साबित होगा। आइये समझते हैं कि ट्रंप नाटो से अलग क्यों होना चाहते हैं? इससे किसे फायदा होगा, क्या कानूनी तौर पर ट्रंप के लिए ऐसा करना आसान है, वहीं तुर्की की दिक्कत क्यों बढ़ सकती हैं?

 

यह भी पढ़ें: 'इन आतंकियों के पास परमाणु हथियार होते तो...', ईरान पर अब क्या बोले ट्रंप?

नाटो से ट्रंप को दिक्कत क्या है?

  • सबसे पहले समझते हैं कि ट्रंप को नाटो से दिक्कत क्या है? 2016 में अपने चुनावी अभियान में ट्रंप ने नाटो को पुराना और अप्रासंगिक संगठन बताया था। उन्होंने यूरोपीय देशों पर कम रक्षा खर्च करने का न केवल आरोप लगाया, बल्कि यह भी कहा कि नाटो आतंकवाद जैसे नए खतरों से निपटने में सक्षम नहीं है।

 

  • 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद अपना पुराना बयान दोहराया, लेकिन बाद में रुख नरम पड़ा। तब ट्रंप ने कहा था कि नाटो अब अप्रासंगिक नहीं है। यह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शामिल होगा। 

 

  • 2017 में ही ब्रसेल्स शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने नाटो के अन्य सहयोगियों को फटकार लगाई। आरोप लगाया कि यह देश अपना उचित हिस्सा नहीं दे रहे हैं। उन्होंने नाटो के अर्टिकल 5 पर भी अपना रुख स्पष्ट नहीं किया।

 

  • 2018 में ट्रंप ने पहली बार नाटो से अमेरिका को बाहर निकालने की धमकी दी और अन्य सदस्य देशों से जीडीपी खर्च 2 फीसद से बढ़ाकर 4 फीसद करने की मांग की। 2019 में कहा कि अमेरिका अधिक बोझ उठा रहा है। नाटो के सदस्य देश अमेरिका पर ही निर्भर है। ट्रंप की दबाव वाली रणनीति काम भी कर रही है। नाटो में शामिल देशों ने साल 2035 तक अपना रक्षा खर्च जीडीपी का 5 फीसद तक करने का लक्ष्य तय किया है।

 

  • 2024 में ट्रंप ने यह कहते हुए यूरोपीय देशों की धड़कन बढ़ा दी कि अगर नाटो सदस्य पैसा नहीं देंगे तो वह उनकी रूस से सुरक्षा नहीं करेंगे। इसी साल एक अन्य बयान में ट्रंप ने कहा कि अगर यूरोपीय देश रक्षा खर्च नहीं बढ़ाएंगे तो रूस उनके साथ जो चाहे वह कर सकता है। ईरान मामले से पहले इसी साल जनवरी महीने में डोनाल्ड ट्रंप और नाटो के यूरोपीय सदस्य देशों के बीच ग्रीनलैंड मुद्दे पर टकराव हो चुका है। 

नाटो क्या है, इसका इतना महत्व क्यों?

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) की साल 1949 में स्थापना की गई थी। उस समय अमेरिका, डेनमार्क, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्समबर्ग, इटली, पुर्तगाल, नॉर्वे और आइसलैंड समेत कुल 12 सदस्य देश थे। मौजूदा समय में नाटो में कुल 32 देश शामिल हैं। नाटो सामूहिक सुरक्षा की शक्ति देता है। इसके अनुच्छेद 5 में ही सामूहिक सुरक्षा का उल्लेख है। इसके मुताबिक अगर एक सदस्य देश पर हमला होता है तो उसे सभी देशों पर हमला माना जाएगा। 

ट्रंप नाटो से हताश क्यों?

ईरान के साथ जंग में अमेरिका के हाथ पैर फूलने लगे हैं। डोनाल्ड ट्रंप अपने यूरोपीय सहयोगियों से बार-बार मदद मांगी। लेकिन किसी भी देश ने उनका साथ नहीं दिया। जंग में अकेला पड़ता देख ट्रंप बौखला उठे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवाने में ब्रिटेन और फ्रांस उसकी मदद करें और अपने जहाज यहां भेजे। मगर दोनों देशों ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। 

अमेरिका के साथ क्यों नहीं आ रहे नाटो के बाकी देश

नाटो चार्टर के मुताबिक अगर अमेरिका पर हमला होता तो उसके सदस्य देशों को युद्ध में शामिल होना पड़ता। मगर ईरान ने सिर्फ खाड़ी में स्थित उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इजरायल व खाड़ी के अन्य देशों पर हमला किया। यह देश नाटो के सदस्य नहीं है। यह भी है कि ईरान पर हमले से पहले अमेरिका ने नाटो के सदस्य देशों से सलाह भी नहीं ली। यही कारण है कि नाटो ने ईरान युद्ध से दूरी बना रखी है।

 

अब आपका सवाल होगा कि अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ जंग में नाटो के सदस्य देशों ने अमेरिका का भरपूर साथ दिया था तो ईरान पर ऐसा क्यों नहीं। दरअसल, अफगानिस्तान पर हमले से पहले 11 सितंबर 2001 को अल-कायदा ने न्यूयार्क और वाशिंगटन पर भीषण हमला किया था। इन हमलों के बाद ही अमेरिका ने वार ऑन टेरर अभियान चलाया था, जिसमें नाटो के बाकी सदस्यों ने अपनी भी सेना भेजी थी।

नाटो से अमेरिका हटा तो किसको फायदा होगा?

अगर अमेरिका खुद को नाटो से अलग करता है तो यह रूस की बड़ी रणनीतिक जीत होगी। रूस ने यूक्रेन पर यह कहते हुए हमला किया था कि वह नाटो में शामिल होना चाहता है। दरअसल, रूस नाटो को अपने लिए खतरा मानता है। वहीं यूरोपीय देश रूस के खिलाफ नाटो को सुरक्षा कवच के तौर पर देखते हैं। नाटो में शामिल देशों में सबसे बड़ी और सबसे मजबूत सेना अमेरिका के पास है। सबसे अधिक धन अमेरिका खर्च करता है। उसके पास सबसे अधिक एयरबेस और मिलिट्री बेस हैं। 

 

रूस के बाद सबसे बड़ा परमाणु जखीरा है। यह संगठन उन सदस्य देशों को परमाणु छतरी प्रदान करता है, जिनके पास अपना खुद का परमाणु बम नहीं है। जैसे तुर्की के इंसिरलिक एयबेस पर अमेरिका ने अपने परमाणु हथियार तैनात कर रखे हैं। यही कारण है कि ट्रंप नाटो को सिर्फ 'कागजी शेर' कहते हैं।

नाटो से अलग होने पर कानून क्या कहता?

ट्रंप भले ही कई बार नाटो से अलग होने की बात कह चुके हैं, लेकिन कानूनी तौर पर यह इतना आसान नहीं है। मगर ट्रंप को कानून की परवाह कहां होती है। 1973 में अमेरिका में युद्ध शक्ति अधिनियम बना। इसके तहत बिना कांग्रेस के मंजूरी के राष्ट्रपति किसी भी देश पर हमले का आदेश नहीं दे सकते। मगर ट्रंप ने इसका उल्लंघन करके ईरान पर हमला किया। 2024 में पारित कानून के मुताबिक कांग्रेस अधिनियम के बिना या अमेरिकी सीनेट में दो-तिहाई बहुमत के बगैर नाटो से अमेरिका को अलग करना संभव नहीं है।

ट्रंप के पास विकल्प कौन से?

दुनियाभर के रणनीतिकारों को आशंका है कि ट्रंप शायद औपचारिक तौर पर नाटो से अमेरिका को अलग न करे, बल्कि उसकी जगह कुछ ऐसे कदम उठाएंगे, जिससे कागजी तौर पर अमेरिका नाटो का सदस्य होगा, लेकिन सैन्य तौर पर उसकी भूमिका सीमित होगी। ट्रंप नाटो के अंतर्गत तैनात सैनिकों को वापस बुला सकते हैं। कमान संरचना में तैनात अमेरिकी अधिकारियों को हटा सकते हैं।

अगर नाटो टूटा तो तुर्की क्यों बढ़ेगी टेंशन?

इजरायल और तुर्की के बीच तकरार बढ़ती जा रही है। इसी साल फरवरी में इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने कहा था, 'तुर्की एक नए खतरे के तौर पर उभर रहा है, तुर्की नया ईरान है।' हाल ही में इजरायल ने तुर्की की बढ़ती आक्रामकता के खिलाफ ग्रीस और साइप्रस के साथ एक सैन्य गठबंधन तैयार किया है। गाजा पीस बोर्ड में भी तुर्की के शामिल करने का इजरायल ने खुलकर विरोध किया था। कुछ समय पहले इजरायली अखबार जेरूसलम पोस्ट ने लिखा था कि तुर्की खुद को क्षेत्रीय नेता के तौर पर स्थापित कर रहा है। वहीं अमेरिका के वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा था कि तुर्की को काबू करना जरूरी है।

 

यह भी पढ़ें: 'प्लीज तुरंत जहाज भेजें', मैक्रों ने माना किया तो बदतमीजी पर उतरे ट्रंप

 

2 मार्च को हुर्रियत अखबार में शिक्षाविद सेब्नेम उदुम ने लिखा- तुर्की नाटो का सदस्य है, सीरिया में यथास्थिति और इजरायल की ऊर्जा सुरक्षा के कारण तुर्की के खिलाफ बल प्रयोग की संभावना नहीं है। अब सवाल उठ रहा है कि अगर 

अमेरिका नाटो से अलग होता है तो क्या होगा?

माना जा रहा है कि अमेरिका के अलग होने से नाटो टूट जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो इसका सीधे तौर पर इजरायल को तुर्की के खिलाफ रणनीतिक लाभ मिल सकता है, क्योंकि तुर्की मीडिया और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के बाद तुर्की इजरायल का अगला निशाना होगा। बता दें कि तुर्की 1952 से नाटो का सदस्य है। 


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