कैसे 'दोस्त' से दुश्मन बना अल-कायदा? अमेरिका से भिड़ने की पूरी कहानी
दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। अफगानिस्तान में अमेरिका और अल-कायदा के बीच सोवियत संघ के खिलाफ ऐसा ही रिश्ता था। बाद में यह कट्टर दुश्मनी में बदल गया। दशकों तक चलने वाले युद्ध को जन्म दिया।

अल-कायदा और अमेरिका की दुश्मनी। (Photo Credit: Social Media)
दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका और सबसे खतरनाक आतंकी संगठन अल-कायदा के बीच दुश्मनी तीन दशक से भी अधिक पुरानी है। 1990 के दशक से शुरू हुई अदावत की यह कहानी दुनियाभर में कई जगहों पर आज भी अलग-अलग रूपों में जारी है। वर्तमान में अल-कायदा और उससे जुड़े संगठन अफ्रीफा महाद्वीप में सक्रिय हैं। 1990 के दशक में अमेरिका ने अल-कायदा को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। जब केन्या और तंजानिया में उसके दूतावासों पर हमले हुए तो अमेरिका की नींद टूटी। मगर तब तक काफी देर हो चुकी थी।
उस वक्त अल-कायदा का सरगना आतंकी ओसामा बिन लादेन था। उसने अमेरिका के खिलाफ 'पवित्र युद्ध' का एलान कर दिया था। लादेन के इस कदम ने पूरे मध्य-पूर्व को हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। अमेरिका और अल-कायदा की दुश्मनी ने ही अफगानिस्तान युद्ध, इराक युद्ध और बाद में सीरिया गृह युद्ध की नींव रखी। सोमालिया, सूडान और यमन में तबाही के तार अल-कायदा से जुड़े थे। माली, बुर्किना फासो और नाइजर की जनता आज भी अल-कायदा से जूझ रही है।
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पर्ल हार्बर के 85 साल बाद अमेरिका की धरती पर सबसे बड़ा हमला भी अल-कायदा ने किया। इस हमले से पूरी दुनिया हिल उठी। आतंकवाद की परिभाषा गढ़ी जाने लगी। आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय संगठन बनने लगे। आतंकियों से निपटने, उन्हें तलाशने, नेटवर्क और फंडिंग को ध्वस्त करने के रास्ते खोजे जाने लगे। पहले अफगानिस्तान और बाद में इराक में अमेरिका को अपनी सेना भेजनी पड़ी।
अल-कायदा के हमले ने अमेरिका को मध्य-पूर्व और खासकर अफगानिस्तान में ध्यान केंद्रित करने पर मजबूत किया। करीब दो दशक तक प्रत्यक्ष जंग चली। इराक, अफगानिस्तान, सोमालिया और सीरिया में भीषण तबाही मची। आज जानेंगे कि कैसे अमेरिका और अल-कायदा में दुश्मनी हुई, संगठन की नींव कैसे पड़ी, लादेन अमेरिका का दुश्मन नंबर-वन कैसे बना और अल-कायदा ने अमेरिका को कब-कब जख्म दिए। विश्वव्यापी व्यू में आज की कहानी... अमेरिका और अल-कायदा की अदावत की।
अल-कायदा का उदय
1979 से 1989 तक अफगानिस्तान में सोवियत संघ और अफगान लड़ाकों की बीच जंग चली। उस वक्त अफगानिस्तान में कमुनिस्ट सरकार थी। उसकी मदद में सोवियत संघ ने अपनी सेना भेजी। दूसरी तरफ अफगानिस्तान में तमाम मुजाहिद्दीन संगठनों का जन्म होने लगा। इन संगठनों की सीधी लड़ाई सोवियत सेना से थी। सोवियत संघ के खिलाफ जन्मे संगठनों को पाकिस्तान की सीमा में ट्रेनिंग मिली। अमेरिका ने हथियार सौंपे और सऊदी अरब से फंडिंग मिली।

1980 में ओसामा बिन लादेन और अब्दुल्ला अज्जाम ने अरब लड़ाकों का समूह बनाया। यह समूह अफगानिस्तान पहुंचा और सोवियत संघ के खिलाफ जंग लड़ी। 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत संघ की वापसी से ठीक एक साल पहले 1988 में ओसामा बिन लादेन ने अल-कायदा नाम का संगठन बनाया। इसका लक्ष्य ग्लोबल जिहाद और खिलाफत की स्थापना करना था। जिस लादेन ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका की मदद की। बाद के दशक में वही लादेन अमेरिका का सबसे बड़ा जानी- दुश्मन बनकर उभरा।
कैसे शुरू हुई अमेरिका और अल-कायदा में दुश्मनी?
साल 1990-91 में खाड़ी युद्ध हुआ। 2 अगस्त 1990 को सद्दाम हुसैन की इराकी सेना ने पड़ोसी देश कुवैत पर कब्जा कर लिया। बाद में अमेरिका को भी इस जंग में कूदना पड़ा। उसने 34 देशों का संगठन बनाया। अमेरिका ने ऑफरेशन डिजर्ट शील्ड चलाया। इसके तहत सऊदी अरब में अमेरिका समेत तमाम सहयोगी देशों की सेना को तैनात किया गया।
उस वक्त ओसामा बिन लादेन ने कुवैत पर इराकी हमले का विरोध किया। 24 फरवरी 1991 को अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने जमीनी हमला शुरू किया। महज 100 घंटे में कुवैत को इराकी सेना के कब्जे से छुड़ा लिया। इसी खड़ी जंग की एक घटना ने ओसामा बिन लादेन को हमेशा-हमेशा के लिए अमेरिका का दुश्मन बना दिया।

ओसामा बिन लादेन नहीं चाहता था कि सऊदी अरब में अमेरिकी सेना की तैनाती हो। वह चाहता था कि सऊदी अरब की रक्षा में उसके लड़ाकों को तैनात किया जाए। यही से अमेरिका और लादेन में दुश्मनी शुरू हुई। सऊदी अरब की सरकार के फैसले से लादेन इतना खफा था कि उसने 1991 में ही अपना देश छोड़ दिया और सूडान में जाकर पनाह ली। 1996 तक यही रहा।
अमेरिका पर अल-कायदा के हमले
अदन होटल अटैक: अल-कायदा से जुड़े लोगों ने अमेरिका पर सबसे पहला हमला 29 दिसंबर 1992 को यमन के अदन में करने का प्रयास किया। यमन के गोल्ड मोहर होटल में अमेरिकी सैनिक ठहरे थे। 100 सैनिकों का एक दस्ता सोमालिया ड्यूटी करने को निकला था। तभी दो आतंकियों ने होटल पर हमला कर दिया। हमले में अमेरिकी सैनिक तो बच गए, लेकिन दो लोगों की जान गई और चार अन्य पर्यटक घायल हुए। हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों को अल-कायदा के कैंप में ट्रेनिंग मिली थी।

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला: न्यूयॉर्क सिटी के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर पहली बार हमला 26 फरवरी 1993 को हुआ था। उसके ट्विन टावर्स को विस्फोटक से भरे ट्रक से टकराकर उड़ाने का प्रयास किया। इस घातक हमले में 6 लोगों की जान गई 1000 से अधिक लोग घायल हुए। रामजी यूसुफ हमले का मुख्य मास्टरमांइड था। उसे अल-कायदा से ट्रेनिंग मिली थी। हालांकि मुकदमे में सीधे तौर पर अल-कायदा का नाम नहीं आया।
सोमालिया ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर केस: अमेरिका ने साल 1992 में अपनी सेना सोमालिया भेजी। वहां अकाल फैला था। संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत अमेरिका लोगों तक मदद पहुंचाना चाहता था। मगर सोमाली सरदार मोहम्मद फराह एडिड उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा था। अमेरिका ने 1993 में फहाह एडिड पर 24 संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की हत्या का आरोप लगाया। उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई का एलान किया।
जुलाई महीने में अमेरिका ने एक बड़ा हमला किया। इसमें 70 सोमाली नागरिकों की जान गई। इस घटना ने अमेरिका के प्रति सोमालियाई नागरिकों में नफरत पैदा कर दी।इस बीच अमेरिकी खुफिया विभाग को जानकारी मिली कि 3 अक्टूबर 1993 को एडिड अपने शीर्ष सहयोगियों के साथ एक होटल में बड़ी मीटिंग करने वाला है। अमेरिका की सेना ने एक ऑपरेशन का प्लान तैयार किया।

दोपहर लगभग साढ़े तीन बजे 100 अमेरिकी रेंजर्स और 12 ब्लैकहॉक हैलीकॉप्टर से होटल पर हमला किया। अमेरिका ने लगभग 19 लोगों को पकड़ भी लिया। तभी सोमाली लड़ाकों ने हमला कर दिया। दोनों ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों को मार गिराया गया। कम से कम 18 सैनिकों की जान गई और 200 से अधिक सोमालियाई नागरिक भी मारे गए। बाद में लादेन ने खुलासा किया कि उसने इस हमले में शामिल हथियार और लड़ाकों की व्यवस्था की थी।
जब दहला रियाद: सऊदी अरब की राजधानी रियाद में 13 नवंबर 1995 को एक बड़े हमले को अंजाम दिया गया। यह हमला अमेरिकी द्वारा संचालित सऊदी नेशनल गार्ड के ट्रेनिंग सेंटर पर किया गया। इसमें पांच अमेरिकी और दो भारतीय नागरिकों की जान गई। हमले को अंजाम देने वाले चार सऊदी नागरिकों ने बाद में कबूल किया कि उन्होंने लादेन से प्रेरणा ली थी।
अमेरिकी दूतावास अटैक: 7 अगस्त 1998 को अल-कायदा ने अमेरिका पर दशक का सबसे बड़ा हमला किया। केन्या की राजधानी नैरोबी और तंजानिया के दार-एस-सलाम शहर में विस्फोटकों से भरे ट्रकों को दूतावास की इमारत से भिड़ा दिया। इसमें 12 अमेरिकी नागरिकों समेत 224 लोगों की जान गई।
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यूएसएस कोल अटैक: यमन में अदन की खाड़ी के पास अमेरिकी नाव यूएसएस कोल पर हमला किया। इसमें 17 अमेरिकी नागरिकों की जान गई। 30 से अधिक लोग घायल हुए। एक हमलावर ने बारूद से भरी नाव को अमेरिकी पोत से भिड़ा दी। बाद में लादेन ने हमले की प्रशंसा की।
दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी हमला: अमेरिका की धरती पर अल-कायदा ने दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी हमला 11 सितंबर 2001 को अंजाम दिया। इस हमले को दुनिया 9/11 के नाम से भी जानती है। पर्ल हार्बर पर हुए भीषण हमले के 60 साल बाद अमेरिका में हुआ यह दूसरा सबसे भयावह हमला था। इसमें लगभग 3000 लोगों की जान गई।
आतंकियों ने चार विमानों को अगवा किया। दो विमानों को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावरों से भिड़ा दिया। तीसरा विमान पेंटागन से टकराया। चौथा विमान व्हाइट हाउस या कैपिटल हिल की तरफ बढ़ रहा था। यात्रियों के भारी प्रतिशोध के बाद यह जहाज पेंसिल्वेनिया में एक खाली खेत में जा गिरा।

कितना घातक था 9/11 अटैक?
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर अटैक में 343 दमकलकर्मी और पैरामेडिक्स की जान गई। इसके अलावा 23 पुलिस अधिकारी और पोर्ट अथॉरिटी के 37 पुलिसकर्मियों की मौत हुई। 2000 बच्चों ने अपने माता-पिता में से एक को खो दिया। 146 ऐसे बच्चे थे, जिन्होंने अपने माता-पिता दोनों को खोया। 50 से अधिक गर्भवती महिलाएं विधवा बन गईं।
आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का ग्लोबल वार
9/11 हमले ने पूरे अमेरिका में गुस्से और प्रतिशोध की एक लहर पैदा की। अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध का एलान किया। हमले में 80 से अधिक देशों के नागरिकों को नुकसान उठाना पड़ा। 136 देशों ने अमेरिका को सैन्य मदद की पेशकश की। अमेरिका ने आतंकियों की फंडिंग पर सबसे बड़ा हमला किया। 196 देशों ने आतंक के खिलाफ अमेरिका के वित्तीय युद्ध का समर्थन किया। दुनियाभर में आतंकी संगठनों से जुड़ी संपत्तियां जब्त की जाने लगीं।
तालिबान सरकार ने दी लादेन को शरण
ओसामा बिन लादेन 1996 में सूडान से अफगानिस्तान आ चुका था। वह सबसे पहले जलालाबाद पहुंचा और उसके बाद हिंदु कुश की पहाड़ियों में गुप्त ठिकाना बना लिया। अमेरिकी दबाव के कारण ईरान, इराक, सऊदी अरब ने लादेन को शरण नहीं दी। मगर तालिबान सरकार ने उसका स्वागत किया। 9/11 अटैक के बाद अमेरिका ने तालिबान पर लादेन को सौंपने का दबाव बनाया। मगर बात नहीं बनी।
दो दशक तक चली जंग
7 अक्टूबर 2001 को अमेरिका ने ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम की शुरुआत की। नाटो सहयोगियों के साथ मिलकर अल-कायदा और तालिबान के अफगानिस्तान स्थित ठिकानों पर बमबारी की। अल-कायदा, तालिबान और अमेरिका की जंग को एक दशक बीत चुके थे। तभी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पाकिस्तान के एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के होने की जानकारी मिली। 2 मई 2011 को अमेरिका ने 'ऑपरेशन नेपच्यून स्पीयर' चलाया और कुछ घंटों में ही अपने सबसे बड़े दुश्मन ओसामा बिन लादेन को मार गिराया।

20 साल बाद लौटी अमेरिकी सेना
अल-कायदा और अमेरिका के बीच शुरू हुई जंग लादेन की मौत के एक दशक बाद तक जारी रही। 2021 में अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान से अपना बोरिया-बिस्तर समेटा। तालिबान दूसरी बार सत्ता में आया है। करीब दो दशक तक चली जंग के बाद अमेरिका को खाली हाथ लौटना पड़ा।
इराक युद्ध और जवाहिरी की मौत
अफगानिस्तान जंग के बीच ही अमेरिका ने इराक पर सामूहिक विनाश के हथियार बनाने का आरोप लगाया। अमेरिका ने सैन्य हमला किया। इराक से शासक सद्दाम हुसैन को फांसी दी। लगभग 23 साल बाद 2026 में अमेरिका सेना ने इराक से भी अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया। लादेन की मौत के बाद अल-कायदा की कमान अयमान अल जवाहिरी के हाथ आई। 31 जुलाई 2022 को अफगानिस्तान के काबुल में अमेरिकी ड्रोन हमले में जवाहिरी को भी मार दिया गया।
सीरिया की सत्ता तक पहुंचा आतंकी
सीरियाई गृह युद्ध के दौरान अल-कायदा ने अल-नुसरा फ्रंट बनाया। इसकी स्थापना आतंकी अबू मोहम्मद अल-जुलानी ने की। आज दुनिया जुलानी को अहमद अल-शरा के नाम से जानती है। यह सीरिया के मौजूदा राष्ट्रपति है। बाद में जुलानी ने हयात तहरीर अल-शाम नाम से एक नया संगठन बनाया।
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