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कैसे सरकारें गिराता है अमेरिका, वेनेजुएला से क्या सीख सकती दुनिया?

अमेरिका अपने हितों के हिसाब से दुनिया को चलाता है। अगर कुछ उसके हिसाब या हित में नहीं है तो उसे अपने पक्ष में लाने की पूरी कोशिश करता है। यह कोशिश कूटनीतिक और सैन्य दोनों हो सकती है।

Donald Trump and Nicolás Maduro

डोनाल्ड ट्रंप और निकोलस मादुरो। (AI generated image)

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रिजीम चेंज... इस शब्द पर अमेरिका को खूब दिलचस्पी है। अपने आर्थिक और सामरिक हितों के लिहाज से सरकार बनाना और बिगाड़ना उसके बाएं हाथ का खेल है। दो साल पहले यानी 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट हुआ। उसी साल सीरिया में बशर अल असद को सत्ता से हटा दिया गया। दोनों ही जगह अंतरिम सरकारें देश चला रही हैं। इन अंतरिम सरकार के नेताओं की अमेरिका से नजदीकियां जगजाहिर हैं।

 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने 2021 में अमेरिका को 'Absolutely Not' कहा था। उसके बाद इमरान खान के साथ क्या हुआ, सबको पता है। इमरान खान और असीम मुनीर एक-दूसरे के दुश्मन हैं। वही असीम मुनीर डोनाल्ड ट्रंप के करीबी हैं। दरअसल, अमेरिका इमरान खान से एक एयरबेस मांग रहा था, ताकि यहां से अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ ऑपरेशन किया जा सके। मगर इमरान खान ने अमेरिका को साफ मना कर दिया। इसका खुलासा उन्होंने एक इंटरव्यू में खुद ही किया। शायद अमेरिका को यही बात बुरी लग गई।

 

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सीरिया के अपदस्थ राष्ट्रपति बशर अल असद को ईरान और रूस का करीबी माना जाता था। 2024 में विद्रोह भड़कने के बाद असद को रूस जाना पड़ा। अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद अहमद हुसैन अल-शरा को सीरिया का नया नेता बनाया गया। इतना ही नहीं, उसकी पुरानी पहचान अबू मोहम्मद अल-जुलानी को भी मिटा दिया गया। अमेरिका ने जुलानी का नाम आतंक की सूची में डाल रखा था। उस पर लाखों रुपये का इनाम था। मगर सत्ता संभालते ही सबकुछ हटा दिया गया। आज सीरिया में अल-शरा अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है।

 

बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दावा किया था कि अमेरिका उसके सेंट मार्टिन द्वीप पर एक सैन्य अड्डा बनाना चाहता है। एक अधिकारी ने प्रस्ताव रखा था कि द्वीप दे दीजिए और सत्ता पर बने रहिए। मगर हसीना ने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। उनके दावे के कुछ दिन बाद ही पूरे बांग्लादेश में हिंसा और अराजकता फैली। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को अपना पद और देश छोड़ना पड़ा। हालांकि अमेरिकी विदेश विभाग ने शेख हसीना के दावों का खंडन किया था। बाद में यह भी खुलासा हुआ कि यूएसएड के तहत बांग्लादेश में भारी रकम भेजी गई थी।  

 

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वेनेजुएला से क्या सीख मिलती है?

अमेरिका किसी भी देश में सरकार अचानक नहीं गिराता है। यह एक प्लानिंग के तहत किया जाता है। कई बार इसके पीछे वर्षों की मेहनत होती है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो 2013 से ही अमेरिका के रडार पर थे। अमेरिका ने उन्हें तानाशाही, वोट चोरी, चुनाव में धांधली, गैर-कानूनी सरकार और बाद में ड्रग्स तस्करी के आरोप में घेरा। अमेरिका के प्रभाव वाले कई देश भी मादुरो को तानाशाह मानने लगे। वेनेजुएला की चुनाव प्रक्रिया पर वर्षों तक सवाल उठाया गया। वहां का विपक्ष भी अमेरिका के साथ आ गया। उसने भी मादुरो सरकार पर वोट चोरी का आरोप लगाया। मादुरो ने विपक्ष पर एक्शन लिया तो तानाशाह कहा गया।

 

बार-बार इन आरोपों के जिक्र से दुनिया में नैरेटिव बना की मादुरो तानाशाह और चुनाव धांधली से जीतते हैं। 2024 में भी मादुरो की जीत को अमेरिका ने धांधली बता खारिज कर दिया और चुनाव आयोग पर मिलीभगत का आरोप लगाया। अमेरिका ने मादुरो की जगह विपक्ष की नेता एडमंडो गोंजालेज को असली राष्ट्रपति माना।

 

मादुरो की तरह ही अमेरिका शेख हसीना पर भी चुनाव में धांधली का आरोप लगाता रहा है। अनफेयर इलेक्शन के नाम पर वह जनता और विपक्ष के बीच अपने हित में माहौल बनाता है। दुनिया को वेनेजुएला की घटना से यह सीखना चाहिए कि वह कैसे अमेरिकी नैरेटिव से बचे, क्योंकि अमेरिका अपने हित में किसी भी देश को अपना निशाना बना सकता है। उसका सिर्फ एक ही मकसद होता है, वह उसका आर्थिक और सामरिक हित हैं।

सत्ता परिवर्तन के अमेरिकी टूल्स

  • अमेरिका मीडिया और नैरेटिव की जंग लड़ता है। दुनियाभर की मीडिया के माध्यम से सरकारों को तानाशाह, चुनावी धांधली से जीत और भ्रष्टाचारी दिखाता।
  • लोकतंत्र के नाम पर आंदोलन भड़काना, इन आंदोलनों को मीडिया से समर्थन देना।
  • गैर-सरकारी संगठनों और विपक्षी दलों की फंडिंग करना, ताकि मौजूदा सरकार के खिलाफ जमीनी स्तर पर माहौल बनााए जा सके।
  • चुनावी हस्तक्षेप, सियासी दल और सोशल मीडिया के जरिये जनमत को प्रभावित करना। अमेरिका सबसे अधिक यूएसएड के माध्यम से दखल देता है।
  • आर्थिक प्रतिबंध से देश को कमजोर करना। अंतराष्ट्रीय संगठनों के जरिये दबाव डालना। व्यापार और बैंकिंग पर रोकना। अमेरिका क्यूबा, वेनेजएला और ईरान के साथ यह कर चुका है।

सैन्य हस्तक्षेप: अगर इन सबसे बात नहीं बनती है तो अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप करता है। 2003 में परमाणु बम बनाने की फर्जी रिपोर्ट के आधर पर इराक पर हमला बोला और बाद में वहां के शासक सद्दाम हुसैन को फांसी पर चढ़ा दिया। 2011 में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी को भी इन्हीं आरोपों के तहत मारा था।


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