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जंग पर आमादा हूती विद्रोही आखिर सऊदी अरब से चाहते क्या हैं?

हूती विद्रोही और सऊदी अरब के बीच संघर्ष की खाई और गहरी होती जा रही है। अलग-थलग पड़ चुके सऊदी अरब को एक भरोसेमंद साथी की दरकार है। मगर सवाल यह है कि हूती विद्रोही भी क्या चाहते हैं?

 Saudi Arabia and Houthi rebels Conflict

हूती-सऊदी जंग। (Photo Credit: Social Media)

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मध्य पूर्व में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच संघर्ष गहराता जा रहा है। एक दशक पहले साल 2015 में हूती और सऊदी अरब के बीच जंग का आगाज हुआ था। साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्था के बीच युद्धविराम लागू हुआ। 13 जुलाई को सना एयरपोर्ट पर सऊदी समर्थित बलों की एयर स्ट्राइक के बाद यह युद्धविराम टूट गया।

 

इसी महीने की सात तारीख से हूती विद्रोहियों ने न केवल यमन के भीतर व्यापक संघर्ष छेड़ा, बल्कि सऊदी अरब के कई शहरों, सैन्य ठिकानों और तेल सुविधाओं पर ड्रोन व बैलेस्टिक मिसाइल से अटैक किया। अब सवाल उठता है कि यमन के हूती विद्रोही अपने पड़ोसी सऊदी अरब से क्या चाहते हैं? सऊदी अरब हूती विद्रोहियों को बड़ा खतरा क्यों मानता है? समझते हैं सबकुछ...

 

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  • युद्धविराम होने के बावजूद सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ तीन मोर्चों पर नाकेबंदी कर रखी है। पिछले चार साल से हूती विद्रोही रियाद की समुद्री, हवाई और आर्थिक नाकेबंदी के घेरे में है। हूती विद्रोही का स्पष्ट कहना है कि नाकेबंदी के जवाब में नाकेबंदी की जाएगी। मसलन वे सऊदी नाकेबंदी को समाप्त करवाना चाहते हैं।

 

  • यमन की राजधानी सना समेत भले ही देश के बड़े भूभाग पर विद्रोहियों का कब्जा, लेकिन इनके पास आय के बड़े साधन नहीं है। हूती विद्रोहियों की रणनीति लाल सागर की घेरेबंदी करके समुद्री टैक्स वसूलने की है। यह व्यवस्था ठीक वैसे ही होगी, जैसा ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में चाहता है। 

 

  • हूती विद्रोहियों का सबसे बड़ा लक्ष्य पूरे यमन में अपना शासन स्थापित करना है। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार और उसकी फौज का समर्थन करता है। यह सरकारी सेना हूती विद्रोहियों से लड़ रही है। रियाद को लगता है कि अगर यमन में हूती विद्रोहियों का शासन हो जाएगा तो उसकी सुरक्षा और आर्थिक हित खतरे में पड़ सकते हैं।

 

  • ईरान की तरह हूती विद्रोही भी क्षेत्र के किसी देश में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी नहीं चाहते हैं। अमेरिका से दोस्ती रखने वाले क्षेत्रीय देश ईरान और हूती विद्रोहियों के निशाने पर हैं।

 

  • विद्रोहियों की अगली रणनीति मारिब और तैज शहरों पर कब्जा करने की है। सऊदी अरब हवाई हमले करके राह में सबसे बड़ा रोड़ा बना है। अगर इन दोनों शहरों पर हूती विद्रोहियों का कब्जा होता है तो सऊदी अरब के लिए यह बड़ा खतरा होगा, क्योंकि ये तेल और गैस उत्पादन के बड़े केंद्र है। इससे हूतियों के खिलाफ रियाद की आर्थिक नाकेबंदी टूट सकती है।   

अपनी किन रणनीतियों पर कामयाब होते दिख रहे हूती

दो मोर्चे पर घिरा: सऊदी अरब दो मोर्चे पर घिर चुका है। यमन से हूती विद्रोही ड्रोन और मिसाइल बरसाने में जुटे हैं। दूसरी तरफ इराक से ईरान समर्थित मिलिशिया ने पूर्व-पश्चिम तेल पाइपाइन पर हमला किया। सऊदी अरब के पास एक बड़ी वायुसेना है। मगर अभी तक बाब अल-मंडेब या लाल सागर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल नहीं किया गया। माना जा रहा है कि इससे पीछे सऊदी अरब का एक डर है। रियाद को लगता है कि अगर हूती विद्रोहियों के खिलाफ ऑलआउट अभियान शुरू किया गया तो ईरान उस पर हमला कर सकता है।

 

अलग-थलग की रणनीति: सऊदी अरब ने जुलाई में 14 देशों के साथ मिलकर एक नौसैनिक गठबंधन बनाया। अगस्त में पाकिस्तान और तुर्की के साथ मक्का समझौता किया। उसे भरोसा था कि संकट के समय में अमेरिका मदद को सामने आएगा। मगर यह हूतियों की रणनीतिक जीत है कि उनके खिलाफ रियाद का साथ देने कोई क्षेत्रीय... देश यहां तक कि अमेरिका भी नहीं आया।

 

संघर्ष की कीमत थोपी: हूती विद्रोही सऊदी अरब पर संघर्ष की भारी कीमत थोपने पर भी कामयाब रहे। उन्होंने न केवल सैन्य ठिकानों को तबाह किया, बल्कि ईंधन से जुड़े बुनियादी ढांचे को भारी चोट पहुंचाई। हमले के बाद सऊदी अरब ने अपनी पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन और तेल निर्यात दोनों बंद कर दिया। इसका खामियाजा यूरोप को भी उठाना पड़ रहा है। रियाद ने तेल की कुछ खेपों में कटौती की है। 

 

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अंतरराष्ट्रीय पहचान: पिछले 10 साल के संघर्ष में हूती विद्रोहियों को दुनियाभर के अखबारों ने कवरेज दी। लेकिन हाल ही में अमेरिका के साथ उनकी गुप्त मीटिंग बड़ी रणनीतिक कामयाबी है, क्योंकि वर्षों से हूती विद्रोहियों को इंतजार था कि कोई बड़ी शक्ति उनसे बातचीत की पहल करे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस बातचीत का जिक्र किया।


ट्रंप ने कहा, 'हूतियों ने हमें फोन किया था। वे हमसे लड़ना नहीं चाहते।' बाद में कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि अमेरिका और हूती विद्रोहियों के बीच सीधी बैठक हुई है। इसमें ओमान ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई।


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