क्या है ट्रंप का शांति बोर्ड, कौन से देश शामिल होंगे और कौन से नहीं?
डोनाल्ड ट्रंप के शांति बोर्ड में शामिल होने की हामी अधिकांश मुस्लिम देशों ने भर दी है। मगर चीन, रूस और भारत समेत कई देशों ने अभी तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है।

डोनाल्ड ट्रंप। (AI Generated Image)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक नया 'संयुक्त राष्ट्र' बनाना चाहते हैं। दुनिया इसे शांति बोर्ड के नाम से जानेगी। फिलहाल इसका काम गाजा में शांति और पुनर्निर्माण की निगरानी करना है, लेकिन अमेरिका की भविष्य में योजना है कि दुनियाभर के संघर्षों को शांति बोर्ड के माध्यम से ही हाल किया जाए। अभी तक 50 देशों को शांति बोर्ड में शामिल करने का न्योता भेजा गया है। कई देशों ने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया है तो वहीं भारत और फ्रांस जैसे देश अभी असमंजस की स्थिति में है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पीस बोर्ड में शामिल होने का न्योता स्वीकार कर लिया है। अमेरिका ने अपने विरोधी चीन और रूस को भी न्योता दिया है।
शांति बोर्ड में शामिल होंगे 8 मुस्लिम देश: डोनाल्ड ट्रंप को सबसे पहले आठ मुस्लिम देशों का साथ मिला। पाकिस्तान, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात ने शांति बोर्ड में शामिल होने का ऐलान किया। सऊदी अरब ने चुप्पी साधी तो ट्रंप ने खुलकर मोहम्मद बिन सलमान से शामिल होने की अपील की। इसके बाद सऊदी अरब, तुर्की, जॉर्डन, इंडोनेशिया, कतर के विदेश मंत्रियों ने एक संयुक्त बयान जारी किया और शांति बोर्ड का हिस्सा बनने का ऐलान किया।
चार देशों ने अमेरिका से बनाई दूरी: आठ मुस्लिम देशों के अलावा मोरक्को, कजाखस्तान, वियतनाम, हंगरी, अर्जेंटीना और बेलारूस भी शांति बोर्ड में शामिल होंगे। वहीं फ्रांस, डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन ने शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप लगातार अपनी बयानबाजी से फ्रांस के राष्ट्रपति का मजाक रहा रहे हैं। हाल ही में उनके चैट को भी सार्वजनिक कर दिया था। वहीं ग्रीनलैंड के मुद्दे पर डेनमार्क की तनातनी चल रही है।
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असमंजस में कौन कौन से देश: भारत समेत कई देशों ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह शांति बोर्ड में शामिल होंगे या नहीं। चीन, रूस, भारत, जापान, थाईलैंड ने अभी क शांति बोर्ड में शामिल होने का निर्णय नहीं लिया है। इटली, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे यूरोपीय देश भी असमंजस में हैं। हाल ही में चीन ने संयुक्त राष्ट्र की वकालत की। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चीन और रूस जैसे देश ट्रंप के प्लान से दूरी बना सकते हैं।
क्या है शांति बोर्ड?
डोनाल्ड ट्रंप शांति बोर्ड के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र को रिप्लेस करना चाहते हैं। पिछले साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान शांति बोर्ड का प्रस्ताव रखा गया था। व्हाइट हाउस ने 11 पन्नों का एक चार्टर तैयार किया। इसमें कुल आठ अध्याय और 13 अनुच्छेद हैं। पूरे चार्टर में गाजा का एक भी बार उल्लेख नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि शांति बोर्ड सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं रहेगा।
ट्रंप प्रशासन शांति बोर्ड को अंतरराष्ट्रीय निकाय बनाना चाहता है। इसका भविष्य में देशों के बीच होने वाले संघर्ष को निपटाने में इस्तेमाल किया जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप शांति बोर्ड के सबसे शक्तिशाली चेहरा होंगे। उनके पास वीटो पावर होगी। बोर्ड की कार्रवाई और सदस्यता रद्द करने की ताकत उनके ही हाथ में होगी।
शांति बोर्ड में शामिल होने वाले सामान्य देश तीन साल तक सदस्य होंगे। वहीं एक बिलियन डॉलर का भुगतान करने वाले देशों को स्थायी सीट मिलेगी। शांति बोर्ड और उसके तहत गठित अन्य समितियों का काम गाजा में पुनर्विकास, मानवीयत सहायता पहुंचाना और हमास को हथियार विहीन बनाना है।
- सबसे पहले: शांति बोर्ड- 50 से अधिक देशों के नेता होंगे सदस्य। ट्रंप होंगे बोर्ड के अध्यक्ष।
- दूसरे स्थान पर: कार्यकारी बोर्ड- कुल सात सदस्य होंगे। तुर्की और कतर को भी जगह मिली।
- तीसरे स्थान पर: एनसीएजी- कुल 15 सदस्य होंगे। फिलिस्तीनी प्राधिकरण के पूर्व उप मंत्री अली शाथ अध्यक्ष।
अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF): तीन नागरिक संगठन के अलावा एक सैन्य ढांचा भी तैयार होगा। इसमें दुनियाभर की सेना अपने जवानों को गाजा भेजेगी। इस बल का मुख्य काम गाजा से हमास को हथियार विहीन बनाना और इजरायली सेना को चरणबद्ध तरीके से हटाना है। आईएसएफ का नेतृत्व अमेरिकी जनरल जैस्पर जेफर्स करेंगे।
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क्या संयुक्त राष्ट्र को मात दे पाएंगे ट्रंप?
डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले ही कार्यकाल से संयुक्त राष्ट्र के आलोचक रहे हैं। कई बार संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाओं की फंडिंग रोकी और हाल ही में 60 से अधिक संस्थाओं से अमेरिका को हटा लिया है। हाल ही में ट्रंप ने शांति बोर्ड की तारीफ की और कहा कि काश संयुक्त राष्ट्र और अधिक कर पाता। काश हमें शांति परिषद की आवश्यकता न होती। मैंने जितने भी युद्ध सुलझाए हैं, उनमें से किसी भी युद्ध में संयुक्त राष्ट्र ने मेरी मदद नहीं की। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र को हटा पाना आसान नहीं है। उसके पास कानूनी मान्यता के अलावा व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन है। कुछ लोगों को यह भी लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप के बाद शायद ही शांति बोर्ड का अस्तित्व बचे।
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