नेतन्याहू या अरब देश, किसके कहने पर ट्रंप ने नहीं किया ईरान हमला; अब क्या खतरा?
दुनिया को लगता है कि ईरान पर अमेरिका हमला होते होते रह गया। सारी तैयारियों के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने ऐन वक्त में अपना फैसला बदला। मगर अभी तक इसके पीछे की वजह लोगों को समझ नहीं आ रही है।

ट्रंप ने ईरान पर हमला क्यों टाला। ( AI Generated Image)
ईरान पर अमेरिकी हमले की 14 जनवरी को सबसे प्रबल संभावना थी। तेहरान की धमकी के बाद अमेरिका ने कतर स्थित अपने एयरबेस से सैनिकों को हटाना भी शुरू कर दिया था। आनन-फानन ईरान ने अपना एयरस्पेस बंद किया। इराक समेत मध्य पूर्व के कई देशों में एयरएक्टिविटी काफी हद तक बढ़ी। किसी भी वक्त अमेरिकी हमले का दावा किया गया। मगर आखिरी समय में ट्रंप ने अपना मिजाज बदला और ईरान पर हमला टाल दिया।
धमकी के बावजूद ट्रंप ने अचानक अपना फैसला क्यों बदला? इसकी अलग-अलग कहानी है। कुछ मुस्लिम देशों का दावा है कि उनके दखल के बाद ट्रंप ने हमला न करने का फैसला किया तो कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहूं ने डोनाल्ड ट्रंप को अभी हमला न करने की सलाह दी। आज यही जानेंगे कि ईरान पर अमेरिका के हमला न करने के पीछे कौन कौन से दावे हैं। तनाव कम होने संकेत के बावजूद भी ईरान पर हमले का खतरा क्यों मंडरा रहा है?
क्या इन चार देशों के आगे झुका अमेरिका?
14 जनवरी को मिडिल ईस्ट आई ने बताया कि खाड़ी देशों ने डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के प्रति नरम रुख अपनाने की खातिर बनाया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी अपनी खबर में बताया कि कतर, सऊदी अरब, ओमान और मिस्र ने ट्रंप प्रशासन के साथ संपर्क साधा और ईरान पर हमला न करने की अपील की। फोन हुई बातचीत में मध्य पूर्व देशों के नेताओं ने अमेरिका से कहा कि अगर ईरान पर हमला किया जाता है तो पूरा मामला क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकता है।
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ईरान पहले ही धमकी दे चुका था कि अगर अमेरिका ने उस पर हमला किया तो वह जवाब में मध्य पूर्व में स्थित उसके सैन्य ठिकानों और इजरायल को अपना निशाना बनाएगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की इस धमकी के बाद सऊदी अरब से तुर्की तक हलचल तेज हो गई। कई अरब देशों ने ईरान के अधिकारियों से संपर्क किया और अमेरिकी हमले के जवाब में उन पर कोई कार्रवाई न करने की अपील की। तेहरान और वाशिंगटन से लगातार संपर्क के बाद ओमान, सऊदी अरब, कतर और मिस्र ने ट्रंप प्रशासन पर हमला न करने का दबाव डाला।
इजरायल का एंगल क्या है?
15 जनवरी को न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी एक अन्य रिपोर्ट में दावा किया कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप से ईरान पर हमले को टालने की अपील की। इसके बाद ही अमेरिका ने यह फैसला लिया। 13 जनवरी को नेतन्याहू ने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस से बात की। इसी दिन अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनाए जाने वाले सैन्य विकल्पों पर चर्चा की। 14 जनवरी को ईरान और अमेरिका के बीच तनाव काफी हद तक बढ़ चुका था। इसी दिन बेंजामिन नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बात की। 15 जनवरी को व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने भी बातचीत की पुष्टि की।
पर्दे के पीछे चल रही तमाम डिप्लोमेसी के बीच 14 जनवरी को ही डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने प्रदर्शनकारियों की हत्या रोक दी है। फांसी की सजा को भी नहीं बढ़ाया जाएगा। उनके इस बयान के बाद से यह संकेत मिलने लगे थे कि अमेरिका शायद ही ईरान पर हमला करे। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान के हमलों के जवाब में इजरायल की सुरक्षा तैयारी पर्याप्त नहीं थी। इस कारण अमेरिका को ऐन वक्त में अपना फैसला टालना पड़ा, जबकि मध्य पूर्व के चार देशों ने ईरान को एक और मौका देने को कहा।
तो सैन्य तैयारियों की खातिर पीछे हटे ट्रंप
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक सैन्य विकल्पों को छोड़ा नहीं है। माना जा रहा है कि अमेरिका ने अभी अल्प विराम लगाया है। भविष्य में किसी भी वक्त ईरान पर सैन्य एक्शन हो सकता है। अमेरिकी सेना इस मौके को अपनी तैयारियों के तौर पर भुना रही है। मध्य पूर्व में पेंटागन लगातार हथियार और रक्षा उपकरण इकट्ठा कर रहा है।
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न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण चीन सागर से अमेरिका का विमानवाहक पोत अब्राहम लिंकन और उसके कुछ एस्कॉर्ट युद्धपोत मध्य पूर्व की तरफ बढ़ रहे हैं। जल्द ही लड़ाकू विमान, ईंधन भरने वाले विमान और एयर डिफेंस सिस्टम के पहुंचने की उम्मीद है।अमेरिका अब यूरोप से भी अपने एसेट्स मध्य पूर्व भेज रहा है। इसके अलावा ईरान के जवाबी हमले से निपटने की खातिर अमेरिका कतर स्थित अल उदैद एयरबेस पर मिसाइल इंटरसेप्टर और एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर रहा है।
क्यों ईरान पर मंडरा रहा हमले का खतरा?
डोनाल्ड ट्रंप कब क्या करेंगे? इसके बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता है। अगर देखा गया है कि ट्रंप जो कहते हैं, वह करते नहीं हैं। वेनेजुएला पर हमले से पहले ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने निकोलस मादुरो से बातचीत की है। इसकी पुष्टि खुद मादुरो ने भी की थी। दोनों के बीच काफी सौहार्दपूर्ण बातचीत हुई थी। 1 जनवरी को निकोलस मादुरो ने ट्रंप को सुलह का प्रस्ताव भेजा। इसमें ड्रग्स तस्करी और तेल क्षेत्र में अमेरिकी की एंट्री पर सहमति बनी। 2 दिन बाद ही ट्रंप ने वेनेजुएला पर हमला करके निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया।
13 जून को डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'उनकी टीम ईरान परमाणु मुद्दे के राजनयिक समाधान पर प्रतिबद्ध है। पूरे प्रशासन को ईरान के साथ बातचीत करने का निर्देश दिया गया।' मगर उनके बयान के कुछ घंटे बाद ही इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया। जब 20 जून को पूछा गया कि क्या इजरायल-ईरान संघर्ष पर अमेरिका भी हस्तक्षेप करेगा? तब व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने बताया कि ट्रंप अगले दो हफ्तों के भीतर फैसला करेंगे कि अमेरिका इसमें शामिल होगा या नहीं। बयान के विपरीत ट्रंप ने दो हफ्ते का इंतजार करना उचित नहीं समझा। उन्होंने दो दिन बाद यानी 22 जून को ही इजरायल पर बमबारी कर दी।
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