तुर्की और भारत के रिश्ते इन दिनों बेहद जटिल परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर में तुर्की ने पाकिस्तान को न केवल राजनयिक समर्थन दिया, बल्कि भारत के खिलाफ ड्रोन और गोला-बारूद भी मुहैया करवाया। जंग जैसे हालात में तुर्की की यह दखल भारत को पसंद नहीं आई। भारत ने भी सैन्य रणनीति के लिहाज से तुर्की को जवाब देने की ठानी। नई दिल्ली ने आर्मेनिया, ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने संबंधों को बेहतर किया। रक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ाया।
साइप्रस और ग्रीस के साथ भारत और इजरायल के बढ़ते सहयोग से अंकारा बेचैन है। उसके रुख में भारत के प्रति थोड़ी नरमी आई है, लेकिन उसने पाकिस्तान के अलावा बांग्लादेश का चयन एक ऐसे केंद्र के तौर पर की है, जहां से भारत की मुश्किलों को बढ़ाया जा सकता है। तुर्की की मंशा पाकिस्तान और बांग्लादेश में अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर भारत को दो तरफ से घेरने की है। ऐसे में आइये समझते हैं कि तुर्की के विदेश मंत्री ने हाल में बांग्लादेश की यात्रा क्यों की, तुर्की ढाका से क्या चाहता है और भारत के लिए यह खबर सतर्क करने वाली क्यों है?
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बांग्लादेश पर टिकीं तुर्की की उम्मीदें
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसी महीने बांग्लादेश की यात्रा की। 5 जून को बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से ढाका में मुलाकात की। तुर्की का मीडिया अपने विदेश मंत्री के बांग्लादेश दौरे को बेहद उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। उसका कहना है कि विदेश मंत्री हाकान फिदान की हालिया बांग्लादेश यात्रा को एक सामान्य राजनयिक दौरा नहीं न माने, क्योंकि अंकारा एशिया में अपनी पांरपरिक साझेदारियों से बढ़कर एक व्यापक भूमिका की तलाश में है।
क्या भारत को नाराज करेगा बांग्लादेश?
तुर्की का मीडिया लिखता है कि अपने शक्तिशाली पड़ोसी से घिरा बांग्लादेश रणनीतिक स्वायत्तता और तुर्की एशिया में अपने नजरिये का विस्तार चाहता है। यह संभावित एक नए रणनीतिक समीकरण की तरफ इशारा है।
बांग्लादेश में शेख हसीना की आवामी लीग की सरकार के पतन के बाद से ही तुर्की को बांग्लादेश में अपार संभावनाएं दिख रही हैं। उसको लगता है कि नई सरकार में दोनों देशों के बीच रणनीतिक और सैन्य सहयोग बढ़ाया जा सकता है, जबकि शेख हसीना सरकार में भारत के खिलाफ ऐसी लामबंदी करना नामुमकिन था।
तुर्की का मीडिया भी लिखता है कि बांग्लादेश की नई सरकार को यह दिखाना होगा कि ढाका दक्षिण एशिया का कोई अधीनस्थ देश नहीं है। यह एक स्वतंत्र देश है जो अनेक साझेदारियां बनाने में सक्षम है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यह है कि तुर्की के कहने पर बांग्लादेश भारत को नाराज करेगा?
अपने आपको कैसे पेश करने में जुटा तुर्की?
तुर्की चाहता है कि बांग्लादेश और उसके बीच एक सुनियोजित रक्षा-औद्योगिक और रणनीतिक साझेदारी हो, जिससे ढाका की नई दिल्ली पर निर्भरता कम हो सके। तुर्किये टुडे लिखता है कि बांग्लादेश की चीन पर अधिक निर्भरता जोखिम भरी है। पश्चिमी देश रक्षा साझेदारियों में शर्तें और धीमी प्रक्रिया अपनाते हैं। पाकिस्तान आज भी बांग्लादेश में बेहद संवेदनशील है। ऐसे में तुर्की ही एक विकल्प है, जिसके पास नाटो का अनुभव, रक्षा औद्योगिक क्षमता और मुस्लिम जगत में वैधता है। कुल मिलाकर तुर्की मीडिया के लेखों से एक बात तो साफ है कि अंकारा का पूरा फोकस बांग्लादेश को रक्षा साजो-सामान बेचना है।
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तुर्की का असली गेम प्लान क्या है?
तुर्की की मंशा बांग्लादेश को सिर्फ हथियार बेचने तक सीमित नहीं है। वह बांग्लादेश की सेना को आधुनिक बनाना चाहता है। उसकी ख्वाहिश यह भी है कि बांग्लादेश भारत के खिलाफ ठीक वैसै ही नीति का पालन करे जैसी मालदीव ने अपनाई। तुर्की बांग्लादेश को प्रशिक्षण, रखरखाव, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, संयुक्त उत्पादन, तटीय निगरानी, सीमा निगरानी, साइबर क्षमता और डिफेंस एजुकेशन पर सहयोग करने को तैयार है। उधर, ढाका ने भी तुर्की के ड्रोन, रॉकेट सिस्टम, बख्तरबंद प्लेटफॉर्म और अन्य रक्षा तकनीक पर दिलचस्पी दिखाई है। लेकिन असली प्लान बांग्लादेश के रास्ते हिंद महासागर, पूर्वोतर भारत, तटीय म्यांमार, आसियान ट्रेड रूट और रोहिग्याओं तक दखल देना है।