अहमदाबाद हादसा: 'केस छोड़ो, मुआवजा लो,' एयर इंडिया क्यों चाहता है Right to Forgo?
एयर इंडिया का कहना है कि कंपनी, परिवारों के साथ पारदर्शी तरीके से बात कर रही है। अंतिम क्षतिपूर्ति, इंडस्ट्री के नियमों के आधार पर ही किया जा रहा है।

12 जून 2025 को दुर्घटनाग्रस्त एयर इंडिया का विमान। Photo Credit: PTI
12 जून 2025 को गुजरात के अहमदाबाद में एयर इंडिया का एक विमान क्रैश हुआ था। हादसे में 241 से ज्यादा यात्रियों और नागरिकों की मौत हो गई थी। अब विमान हादसे के बाद एयर इंडिया की ओर से पीड़ितों के परिवारों को एक अतिरिक्त नकद मुआवजे की पेशकश की जा रही है। एयर इंडिया की इस पेशकश पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि अगर विवाद हुआ तो पीड़ित पक्ष केस भी नहीं कर पाएगा।
'द क्विंट' की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह अतिरिक्त राशि उन परिवारों को दी जा रही है जो एयर इंडिया और विमान निर्माता कंपनियों के खिलाफ भविष्य में कोई भी कानूनी मामला न चलाने की लिखित सहमति देंगे। रिपोर्ट में बताया गया है कि एक परिवार को 10 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि की पेशकश की गई है, लेकिन यह राशि अलग-अलग केस में में अलग-अलग हो सकती है।
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एयर इंडिया का एलान क्या है?
12 जून 2025 को अहमदाबाद से लंदन जा रहा बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। विमान में सवार 241 और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की जान चली गई थी। हादसे के बाद, टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया ने प्रति पीड़ित 25 लाख रुपये के अंतरिम भुगतान और 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की थी।
एयर इंडिया पीड़ितों से क्या चाहती है?
अब एयर इंडिया प्रभावित परिवारों को एक 'क्षतिपूर्ति दस्तावेज' (इंडेम्निटी डॉक्युमेंट्स) पर हस्ताक्षर करने के लिए कह रही है। इस पर हस्ताक्षर करने का मतलब है कि परिवार बोइंग, जनरल इलेक्ट्रिक, सफरान और हनीवेल जैसी कंपनियों सहित एयर इंडिया पर मुकदमा करने का अधिकार छोड़ देंगे। हैरानी की बात यह है कि इस समझौते के दायरे में भारत सरकार, नागरिक उड्डयन मंत्रालय, डीजीसीए (DGCA) और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को भी शामिल किया गया है।
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सवाल क्यों उठ रहे हैं?
दस्तावेज बता रहे हैं कि इस रकम को अगर परिवारों ने मंजूर किया तो इसे 'फाइनल सेटेलमेंट' या अंतिम निपटान माना जाएगा। इसका मतलब है कि भविष्य में परिवार का कोई भी सदस्य या कानूनी वारिस किसी भी देश की अदालत में इन कंपनियों या सरकारी संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाएगा। अगर कोई सदस्य कानूनी कार्रवाई करता है तो उसे सुलझाने की पूरी जिम्मेदारी हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति की होगी।
विदेशी कोर्ट में भी हैं लंबित मामले
हादसे में जान गंवाने वालों में 53 ब्रिटिश, 7 पुर्तगाली और एक कनाडाई नागरिक भी शामिल थे। एयर इंडिया और हनीवेल जैसी कंपनियों के खिलाफ लंदन और अमेरिका की अदालतों में मामले चल रहे हैं। पीड़ितों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों का कहना है कि एयर इंडिया ने परिवारों को इस तरह का ऑफर दिया है।
एयर इंडिया ने अपने बयान में कहा है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी है और मुआवजे की राशि कानूनी ढांचे के आधार पर तय की गई है। एयरलाइन का कहना है कि भविष्य में गैरजरूरी मुकदमों से बचने के लिए 'फुल एंड फाइनल' सेटलमेंट का यह तरीका इंडस्ट्री का मानक है।
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क्या होता है 'मुकदमे का अधिकार' छोड़ना?
अंग्रेजी में एक प्रचलित टर्म ऐसे मामलों के लिए इस्तेमाल होता है, 'Forgo Right to Sue', जिसका मतलब होता है कि मुकदमा करने के अधिकार को त्याग देना।
रुपाली पंवार, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट:-
मुकदमा छोड़ने के अधिकार का मतलब है कि आप किसी समझौते या कॉन्ट्रैक्ट में इस बात पर सहमत हो जाएं कि किसी खास मामले में आप दूसरी पार्टी पर कोर्ट केस नहीं करेंगे।
कैसे समझें इसे?
अगर आपकी कार से कोई हादसा होता है। आप पीड़ित व्यक्ति को हर्जाना दे देते हैं। बदले में आप यह उससे लिखवा सकते हैं कि भविष्य में वह आप पर केस नहीं करेगा।'Forgo Right to Sue' कहते हैं।
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क्या गैर कानूनी है ऐसा समझौता?
एडवोकेट आनंद मिश्रा ने कहा, 'इंडियन कॉन्ट्रेक्ट एक्ट, 1872 की धारा 28, इस पर बात करती है। भारतीय कानून सामान्यतः ऐसे समझौतों को अमान्य मानता है जो किसी व्यक्ति को अदालत जाने से पूरी तरह रोकते हैं, लेकिन इसके कुछ अपवाद भी होते हैं।'
स्निग्धा त्रिपाठी, एडवोकेट:-
अगर दो पक्ष आपसी सहमति से विवाद सुलझा लेते हैं और समझौते के तहत मुकदमा न करने पर राजी होते हैं तो यह मान्य है। अगर कॉन्ट्रैक्ट में लिखा है कि विवाद होने पर आप कोर्ट जाने के बजाय 'मध्यस्थता' का रास्ता चुनेंगे तो कानून इसे सही मानता है। क्लेम सेटलमेंट के समय जब आप किसी कंपनी से पैसा लेते हैं तो आप इस अधिकार को छोड़ सकते हैं।
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कब नहीं हो सकता है ऐसा समझौता?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट शुभम गुप्ता के मुताबिक संविधान हर नागरिक को कानूनी मुकदमा लड़ने का अधिकार देता है। किसी को डराकर या धमकाकर या धोखे से यह अधिकार नहीं छीना जा सकता है। अगर कोई समझौता जनहित के सिद्धांतों के ही खिलाफ है तो केस न करने की शर्त, कोर्ट से खारिज हो सकती है। जब कंपनियां किसी आम आदमी से जबरन ऐसे हस्ताक्षर कराती हैं तो ऐसे समझौते अवैध होते हैं।
एयर इंडिया ऐसा क्यों चाहता है?
यह क्लॉज न केवल एयर इंडिया और उससे जुड़ी कंपनियों को भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में होने वाले मुकदमों से राहत दे सकता है। कंपनी का मकसद कानूनी विवादों को स्थायी तौर पर खत्म करना है और निर्माताओं को सुरक्षा देना है। कंपनी का अलग-अलग मुकदमों में समय और धन दोनों खर्च होता है। ऐसे हादसों पर आमतौर पर हर कंपनी यही चाहती है कि एक बार सेटेलमेंट हो जाए, जिसके बाद मुकदमेबाजी खत्म हो जाए।
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