जिस कंपनी पर 20 छात्रों की मौत का आरोप, नाम बदलकर उसी को CBSE ने थमाया OSM टेंडर
CBSE के रिजल्ट के बाद OSM सिस्टम को लेकर बवाल हो रहा है। जिस कंपनी को यह टेंडर दिया गया था उस कंपनी ने तेलंगाना में भी खराब प्रदर्शन किया था और अब नियम और नाम बदलकर CBSE ने उसी कंपनी को टेंडर थमा दिया।

सांकेतिक तस्वीर,Photo Credit: AI
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के 12वीं क्लास का रिजल्ट जारी होने के बाद जमकर विवाद हो रहा है। विवाद का कारण ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OMS) है। इस साल बोर्ड ने कंप्यूटर स्क्रीन पर कॉपियों की जांच करने के लिए यह सिस्टम लागू किया था। इस काम को पूरा करने की जिम्मेदारी कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड (Coempt Eduteck Pvt. Ltd.) नाम की एक कंपनी को दी गई थी। इस कंपनी को टेंडर देने के लिए कई नियम बदले गए। रिपोर्ट्स के अनुसार, CBSE अब इस कंपनी पर कार्रवाई करने की तैयारी कर रही है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जब यह सिस्टम लागू करने पर विचार किया जा रहा था उस समय बोर्ड की एक रिपोर्ट में 32 प्वाइंट्स पर चिंता जाहिर की गई थी।
CBSE के टेंडर देने की प्रक्रिया पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड पर इस तरह की गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। इससे पहले साल 2019 में भी कंपनी विवाद में फंस चुकी है। तेलंगाना में 2019 के इंटरमीडिएट रिजल्ट में 3.8 लाख से ज्यादा छात्र फेल हो गए थे। इस मामले में कंपनी पर मूल्यांकन और प्रशासनिक गड़बड़ियों के आरोप लगे थे। इस विवाद के दौरान 20 से ज्यादा छात्रों की मौत हो गई थी। उस समय इस कंपनी का नाम ग्लोबारेना टेक्नोलॉजीज था और अब नाम बदलकर कंपनी को टेंडर दिया गया। आखिर CBSE ने ऐसी विवादित कंपनी को इतना बड़ा टेंडर क्यों दिया?
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OSM पर विवाद की कहानी
कंपनी के टेंडर के बारे में जानने से पहले इस पूरे विवाद को समझना जरूरी है। ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OMS) एक ऐसा सिस्टम है जिसे बोर्ड ने समय बचाने के लिए लागू किया है। इस सिस्टम के तहत फिजिकल कॉपी टीचर के पास चेकिंग के लिए नहीं जाएगी बल्कि टीचर्स को एक स्कैन कॉपी डिजिटल फॉर्मेट में दी जाएगी। बोर्ड का कहना है कि इससे कम समय में पेपर चेक हो पाएंगे और रिजल्ट जल्दी जारी किया जा सकेगा। कॉपी स्कैन करने के लिए बॉर्ड को किसी कंपनी की जरूरत थी और उसके लिए टेंडर निकाला गया। यह टेंडर कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया। कंपनी ने बच्चों की कॉपी स्कैन करके उसे डिजिटल फॉर्मेट में करके टीचर्स तक पहुंचाया।
यहीं से गड़बड़ शुरू हो गई। कंपनी ने पहले तो पेपर स्कैन करने में ही कई गलतियां कर दी। कई टीचर्स ने दावा किया कि उन्हें जो कॉपी चेक करने के लिए दी गई थी उसमें उन्हें सही से दिखाई नहीं दे रहा था यानी कॉपी कई जगहों पर ब्लर थी। इसी कारण कई जगहों पर टीचर्स ने अपने अंदाजे से कॉपी चेक की जिससे रिजल्ट में गलती हुई।
इतना ही नहीं, कॉपी स्कैन करके उन्हें व्यवस्थित नहीं किया गया। जब रिजल्ट जारी होने के बाद बच्चों ने नंबर कम आने की शिकायतें की तो बोर्ड ने पहले तो शिकायतों को सुना नहीं और बच्चों को पहल से स्थापित प्रक्रिया का पालन करने के लिए कहा। कई छात्रों ने अपनी कॉपी की जांच करने की मांग की। बोर्ड ने प्रोसेस के तहत उन्हें उनकी कॉपी दे दी। इसके बाद बवाल तब बढ़ा जब छात्रों ने गलत कॉपी दिए जाने की शिकायत की। कई छात्रों को जिस कॉपी के आधार पर नंबर दिए गए वह उनकी थी ही नहीं।
https://twitter.com/sidhant_sarthak/status/2060356865645859314
CBSE टेंडर की टाइमलाइन
एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस प्रक्रिया के लिए टेंडर तीन बार जारी हुआ है और इसमें कई खामियां सामने आई हैं।
- पहला टेंडर- फरवरी 2025 में जारी लेकिन बाद में सार्वजनिक रिकॉर्ड से गायब कर दिया गया।
- दूसरा टेंडर- मई 2025 में हुआ जिसमें चार कंपनियों ने आवेदन किया और सभी कंपनियों को मूल्यांकन में फेल कर दिया गया। इसके बाद टेंडर रद्द हो गया।
- तीसरा टेंडर- नियमों में बदलाव किया गया और कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड को एलिजिबल कर दिया गया। इसके बाद उसी कंपनी को टेंडर दे दिया।
क्या आरोप लगे?
दो बार टेंडर निकालने के बाद भी बोर्ड ने कंपनियों को अयोग्य घोषित कर दिया गया था लेकिन तीसरी बार टेंडर जारी करने के लिए नियमों में बदलाव किया गया। इसमें सबसे बड़ा बदलाव जो किया गया वह यह था कि पुरानी गड़बड़ियों और विफलताओं वाला प्रतिबंध हटा दिया। पहले कंपनियों के खराब प्रदर्शन और अधूरा काम छोड़ने के कारण उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता था। इसके बाद यह शर्त हटा दी गई। इसका सीधा फायदा कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड को हुआ जिसने 2019 में तेलंगाना रिजल्ट में खराब प्रदर्शन किया था।
पहले जो कंपनी कभी भी ब्लैकलिस्ट हुई हो, उसे बाहर करने का नियम था लेकिन इसे बाद में बदल दिया गया। नियम बदलकर यह कर दिया गया कि जो कंपनी अभी ब्लैकलिस्ट हो उसे ही बाहर किया जाएगा।
इसके साथ ही औसत टर्नओवर की सीमा 50 करोड़ की गई और सॉफ्टवेयर की गुणवत्ता मानक को कम किया गया। सॉफ्टवेयर CMMI स्तर 1 से 5 तक होते हैं। इसमें पहले लेवल 5 जरूरी था लेकिन बाद में लेवल 3 को स्वीकार कर लिया गया। इसके साथ ही बड़े प्रोजेक्ट का अनुभव, अपने डेटा सेंटर की शर्त, सोर्स कोड पर कंट्रोल की शर्त हटा दी गई। इसके साथ ही गलत स्कैनिंग, पन्ने गायब होना और आंसर की की गड़बड़ियों पर जुर्नामा था लेकिन बाद में मुख्यत देरी पर इसे केंद्रीत कर दिया गया। इसके साथ भी कई अन्य नियम बदले गए। जिसके कारण अब CBSE पर सवाल उठ रहे हैं।
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खराब प्रदर्शन के बाद भी क्यों चुना?
अब सीधा सवाल बोर्ड से पूछा जा रहा है कि जब कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड का पुराना रिकॉर्ड खराब था तो नियमों को बदलकर उस कंपनी को टेंडक क्यों दिया गया? अधिकारियों ने बताया कि CBSE ने बकायदा टेंडर निकाला था और इस कंपनी ने सबसे कम कीमत की बोली लगाई थी। बताया जा रहा है कि CBSE ने 40 पन्नों की एक कॉपी को स्कैन करने और सॉफ्टवेयर के काम के लिए इस कंपनी को केवल 25 रुपये प्रति कॉपी का पेमेंट किया, जबकि दूसरी सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी ने इसके लिए 60 रुपये मांगे थे। बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि गलती सॉफ्टवेयर की वजह से नहीं बल्कि मानवीय भूल के कारण हुई है। एक अधिकारी के अनुसार, कॉपियों की अदला-बदली शायद मास्किंग के दौरान हुई।
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