सरकारें बदलीं, मगर व्यवस्था नहीं; कैसे US के रिजीम चेंज ने दुनिया को तबाह किया?
व्यवस्था के नाम पर दुनियाभर में अराजकता मचाने का अमेरिकी इतिहास पुराना है। लोकतंत्र के नाम पर चुनी हुई सरकारों को गिराना भी उसकी पुरानी रणनीति है। समझते हैं अमेरिका का रिजीम चेंज ऑपरेशन।

अमेरिका का रिजीम चेंज ऑपरेशन। (Photo Credit: khabargaon)
अमेरिका दुनियाभर के हर देश में अपने हिसाब की सरकार चाहता है। वह चाहता है कि धरती की हर जगह उसके हितों और उनकी कंपनियों को लीक से हटकर महत्व मिले। सरकारें उसके अनुकूल नीतियों का सृजन करें। 'हां' और 'न' के बिना हर हुक्म का पालन करें। जब कोई सरकार अमेरिका से भिड़ने या आंख दिखाने की कोशिश करती है तो वाशिंगटन को यह रास नहीं आता है। यही से एंट्री होती है अमेरिका की सात दशक पुरानी और बेहद कुख्यात रिजीम चेंज पॉलिसी की।
अमेरिका उन सरकारों को उखाड़ फेंकता है, जो उसके मुताबिक नहीं चलती हैं। अमेरिका के अधिकांश रिजीम चेंज ऑपरेशन खुफिया होते हैं, लेकिन इराक में सद्दाम हुसैन, अफगानिस्तान में तालिबान और वेनेजुएला में मादुरो के खिलाफ अमेरिका ने पर्दे के पीछे वाली नीति नहीं अपनाई। यहां अमेरिका की सरकार ने प्रत्यक्ष रिजीम चेंज का सहारा लिया।
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पिछले साल ईरान में छात्रों का आंदोलन भड़का। अमेरिका ने भरपूर सहयोग दिया। लेकिन रिजीम चेंज नहीं हो पाया। दुनिया को लगता है कि ईरान पर अमेरिका का हमला परमाणु हथियारों के खिलाफ हैं, लेकिन असली मकसद तेहरान में रिजीम चेंज करके अपने हिसाब की सरकार का चयन करना है, ताकि वहां के तेल भंडार पर नियंत्रण हासिल किया जा सके।

CIA के रेजीम चेंज के हथियार
20वीं सदी के आरंभ और खासकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने अपनी ताकत का इस्तेमाल दुनियाभर में तख्तापलट कराने में किया। अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी ने छात्र, किसान, हड़ताल, विरोध प्रदर्शन, जन आंदोलन, कूटनीतिक दबाव, मीडिया, लोकतंत्र, चुनाव में धांधली जैसे मुद्दों को हथियार बनाकर सरकारों को गिराने का काम किया। तानाशाही और चुनाव में धांधली उसका सबसे लोकप्रिय हथियार है। वेनेजुएला, इराक, ईरान और सीरिया में इसी का इस्तेमाल भी किया
कम्युनिस्ट सरकारों के पीछे पड़ा भारत
अमेरिका तख्तापलट में सरकारों के खिलाफ बागी गुट, बागी सेनाओं और विपक्षी नेताओं को भी मदद पहुंचाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी प्रशासन ने दुनियाभर में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट सरकारों को निशाना बनाया, क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता है कि दुनियाभर में कम्युनिज्म फैले। वह इसे अपने दबदबे और ताकत के लिए खतरा मानता है।

कास्त्रो और उनके समर्थक सरकारों को बनाया निशाना: अमेरिका के पड़ोस में स्थित क्यूबा सबसे बड़ा सरदर्द बनकर उभरा। वहां के दिवंगत नेता फिदेल कास्त्रो का रुख अमेरिका विरोधी था। सीआईए ने कास्त्रो को कई बार मारने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। लैटिन अमेरिका में कास्त्रो का समर्थन करने वाली हर सरकार को सीआईए ने अपना निशाना बनाया। सीआईए का तर्क है कि दुनियाभर में उसके तख्तापलट लोकतंत्र को बढ़ावा देते हैं।
ईरान में तख्तापलट से दोबारा कोशिश तक: अमेरिका की सीआईए ने यूनाइटेड किंगडम के साथ मिलकर 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग का तख्तापलट कर दिया। उनकी जगह शाह को ईरान की गद्दी मिली। इससे यह साफ हो जाता है कि अमेरिका को लोकतंत्र से बहुत कुछ लेना-देना नहीं है। मोहम्मद मोसद्देग को हटाने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि उन्होंने एंग्लो-ईरानी तेल कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। ब्रिटेन और अमेरिका इसके खिलाफ थे।
शाह पहलवी के सत्ता में आने के बाद अमेरिका और ईरान 1979 तक दोस्त थे। यह दोस्ती इतनी मजबूत थी कि अमेरिका ने तेहरान को परमाणु रिएक्टर और यूरेनियम तक दिया, ताकि ईरान नागरिक परमाणु कार्यक्रम चला सके। 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान और अमेरिका के बीच दुश्मनी का नया दौर आरंभ हुआ। चार दशकों में अमेरिका ने दर्जनों पर ईरान में तख्तापलट की साजिश रची।

45 लाख मौतों वाला रिजीम चेंज ऑपरेशन
अमेरिका ने मध्य पूर्व में सत्ता परिवर्तन का सबसे क्रूर रूप अपनाया। करीब दो दशक तक सीरिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान में दखल दिया। करीब 5.8 ट्रिलियन डॉलर की रकम खर्च की। जंग में 2001 से मध्य-पूर्व में 940,000 लोग की जान गई। अगर अप्रत्यक्ष मौतों की संख्या जोड़ ले तो यह संख्या 45 लाख से भी अधिक होती है। सिर्फ इराक में अमेरिका से लड़ाई में सीधे तौर पर करीब 315,000 लोग मारे गए।
अमेरिका ने 2011 में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ तख्तापलट की अगुवाई की। व्यापक सैन्य अभियान के बाद गद्दाफी को मार गिराया गया। अमेरिका के रिजीम चेंज के बावजूद लीबिया आज भी हिंसा की चपेट में है। कई अलग-अलग गुट सक्रिय हैं। एक दशक से अधिक समय से लीबिया में सत्ता की लड़ाई जारी है।

इन देशों में भी अमेरिका ने दिया दखल
अमेरिका ने साल 1963 में इक्वाडोर, 1964 में ब्राजील, चिली और बोलीविया, 1983 में ग्रेनेडा और 1989 में पनामा में तख्तापलट को समर्थन दिया। ग्वाटेमाला के पूर्व राष्ट्रपति जैकोबो अर्बन्ज ने जमीन का राष्ट्रीयकरण आरंभ किया। अमेरिका ने ग्वाटेमाला के इस कदम को पूंजीवाद के खिलाफ माना। सीआईए ने 1954 में चुने हुए राष्ट्रपति जैकोबो अर्बन्ज को हटाने में अहम भूमिका निभाई। नतीजा यह हुआ कि 1960 से 1996 तक पूरा देश गृह युद्ध में फंसा रहा।
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यातना और क्रूरता का दौर: ब्राजील में 1964 में हुए सैन्य तख्तापलट का अमेरिका ने साथ दिया। सीआईए की मदद से राष्ट्रपति जोआओ गौलार्ट को सत्ता से बेदखल कर दिया गया। अमेरिका ने चिली में सैन्य तख्तापलट करके जनरल ऑगस्टो पिनोशे को 17 साल तक सत्ता में बैठाए रखा। तख्तापलट के बीच ही सोशलिस्ट राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे को अपनी जान गंवानी पड़ी। अलेंदे अमेरिका की कॉपर कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करने वाले थे। अमेरिका इसी बात से उनसे नाराज था। चिली में सैन्य तख्तापलट के बाद दमन का क्रूर चक्र चला। हजारों लोगों को यातना झेलनी पड़ी। जबरन गायब किया जाने लगा। लाखों लोगों को देश छोड़ना पड़ा और 3000 से अधिक लोगों की हत्याएं हुईं।

सरकार बदलना आसान, लेकिन व्यवस्था बदलना कठिन
किसी देश की सरकार गिराना आसान है। जनता, छात्रों और नागरिक संगठनों के दबाव के आगे सरकारें गिरी भी हैं। अफगानिस्तान, इराक और वेनेजुएला में सैन्य दखल से अमेरिका ने सरकार बदली। लेकिन असली समस्या उस देश की व्यवस्था बदलने में आती है। सरकार बदलने की अपेक्षा व्यवस्था बदलना आसान नहीं होता है। जनता को यह विश्वास दिलाना बेहद कठिन होता है कि नया शासन तंत्र पहले से अच्छा है।
- अमेरिका ने हैती में साल 1994 में राष्ट्रपति जीन-बर्ट्रां अरिस्तीद को सत्ता में लाने की खातिर सैन्य दखल दिया। शुरुआती सफलता भी मिली। अमेरिका हैती की व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन नहीं ला सका। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका वहां से जल्दी निकलना चाहता था।
- अमेरिका ने 2001 में अफगानिस्तान में अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ जंग शुरू की। लगभग दो दशक तक संघर्ष चला। 2021 को अमेरिका अफगान जनता को अधर में डालकर काबुल से चला गया। आज अफगानिस्तान पर तालिबान का दोबारा कब्जा हो गया है। वहां की जनता को कोई राजनैतिक समाधान नहीं मिला है। सिवाय इसके की जंग में करीब 243,000 लोगों को सीधे तौर पर जान गंवानी पड़ी।

- अमेरिका ने इराक पर सामूहिक विनाश के हथियार बनाने का आरोप लगाया। 2003 में सद्दाम हुसैन सरकार के खिलाफ सेना उतारी। सद्दाम शासन का पतन हुआ। आज दो दशक बाद भी इराक में शांति नहीं आई। अमेरिका वहां की जनता को कोई विकल्प नहीं दे पाया है। देश में आज भी कई मिलिशिया गुट सक्रिय है।
- 2024 में सीरिया में बशर अल असद की सरकार को आतंकियों ने गिरा दिया। विरोध गुट की अगुवाई करने वाले अहमद अल-शरा को वाशिंगटन से भरपूर सहयोग मिल रहा। असद के अपदस्थ होने के बाद अल-शरा राष्ट्रपति बने। व्हाइट हाउस पहुंचे। आतंकी की उपाधि तक वापस ले ली गई। तख्तापलट के दो साल बीत जाने के बावजूद सीरिया पूरी तरह से पटरी पर नहीं लौटा। वहां की मौजूदा सरकार में तुर्की का प्रभाव बढ़ रहा है। इससे इजरायल बेहद चिंतित है।
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