PM मोदी का लिथियम पर जोर, भंडार मिलने के बाद भी विदेशों से क्यों खरीदता है भारत?
भंडार मिलने के बावजूद भारत क्रिटिकल मिनरल्स लिथियम, निकेल और कोबाल्ट के मामले में दूसरे देशों पर कितना निर्भर है? पढ़ें रिपोर्ट

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit-ChatGPT
क्या आपको लगता है कि हमारे भविष्य को ऊर्जा देने वाले महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की प्रोसेसिंग के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना चाहिए? मुझे तो बिल्कुल नहीं लगता! लिथियम, निकेल, कोबाल्ट... ये EV, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र के लिए बहुत जरूरी हैं। इसके बावजूद, इन खनिजों को शुद्ध करने और इस्तेमाल के लायक बनाने के लिए भारत काफी हद तक दूसरे देशों से आयात पर निर्भर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 नवंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर यह बात कही। उनका यह बयान भारत को महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार की कोशिशों को दिखाता है। लिथियम भी ऐसा ही एक जरूरी खनिज है, जिसका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक गाड़ियों, मोबाइल फोन और बैटरी बनाने में होता है। दिलचस्प बात यह है कि जम्मू-कश्मीर के रियासी में लिथियम के बड़े संसाधन मिलने के बावजूद भारत को आज भी विदेशों से लिथियम और उससे तैयार सामग्री खरीदनी पड़ रही है।
आखिर ऐसा क्यों है? क्या भारत के पास लिथियम निकालने और साफ करने की पर्याप्त तकनीक नहीं है? या फिर इसकी प्रोसेसिंग और बैटरी बनाने के कारोबार में चीन की मजबूत पकड़ भारत के लिए बड़ी चुनौती है? आंकड़ों से समझिए क्या है भारत में लिथियम, निकेल, कोबाल्ट की तस्वीर।
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लिथियम, निकेल, कोबाल्ट के मामले में भारत कितना आत्मनिर्भर?
भारत सरकार ने 2,814 करोड़ रुपये की महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण योजना को मंजूरी दी है। फिलहाल भारत लिथियम, निकेल और कोबाल्ट के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है। नीति आयोग की रिपोर्ट में 2025 के व्यापार आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने निकेल का करीब 1,174.6 मिलियन डॉलर, कोबाल्ट का 13 मिलियन डॉलर और लिथियम का 32.79 मिलियन डॉलर का आयात किया। रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 से 2025 के बीच निकेल के आयात मूल्य में सालाना औसतन 0.1 फीसदी की गिरावट रही, जबकि कोबाल्ट के आयात मूल्य में 16.9 फीसदी और लिथियम में 5.1 फीसदी की सालाना औसत बढ़ोतरी दर्ज की गई।
लिथियम के लिए दूसरे देशों पर कितना निर्भर भारत?
लिथियम के मामले में भारत अलग-अलग देशों से इसकी प्रोसेसिंग के बाद तैयार होने वाले उत्पाद खरीदता है। 2025 के नीति आयोग के रिपोर्ट के मुताबिक, लिथियम ऑक्साइड और हाइड्रॉक्साइड के आयात में अर्जेंटीना की हिस्सेदारी 32.5 फीसदी, बेल्जियम की 25.6 फीसदी और चीन की 22.6 फीसदी थी। वहीं, लिथियम कार्बोनेट के आयात में चीन सबसे आगे रहा, जिसकी हिस्सेदारी 34.3 फीसदी थी।
वहीं अमेरिका से 21 फीसदी, चिली से 13.6 फीसदी और बेल्जियम व अर्जेंटीना से 10.5-10.5 फीसदी लिथियम कार्बोनेट आयात किया गया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत लिथियम के लिए केवल एक देश पर निर्भर नहीं है, लेकिन चीन की भूमिका अहम है।
निकेल के लिए किन देशों पर निर्भर भारत?
निकेल का इस्तेमाल बैटरी, स्टेनलेस स्टील आदि में होता है। नीति आयोग के अनुसार, 2025 में भारत के निकेल आयात में चीन की हिस्सेदारी 26.2 फीसदी थी। इसके बाद जापान की 13.5 फीसदी, अमेरिका की 9 फीसदी, नॉर्वे की 6.6 फीसदी और ब्रिटेन की 5.8 फीसदी हिस्सेदारी रही। इन पांच देशों से भारत के कुल निकेल आयात का 61.1 फीसदी हिस्सा आया।
कोबाल्ट के लिए किन देशों पर निर्भर भारत?
कोबाल्ट का इस्तेमाल खासतौर पर बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में होता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत के कुल कोबाल्ट आयात में बेल्जियम की हिस्सेदारी 58.3 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका की 27.4 फीसदी थी। इसके अलावा चीन से 6.5 फीसदी, जर्मनी से 5.4 फीसदी और नीदरलैंड से 1 फीसदी कोबाल्ट आयात किया गया। यानी बेल्जियम और दक्षिण अफ्रीका मिलकर भारत के कोबाल्ट आयात का 85.7 फीसदी हिस्सा सप्लाई करते हैं।
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भंडार लिथियम मिलने के बावजूद उत्पादन क्यों शुरू नहीं हुआ?
हाल ही में जम्मू-कश्मीर का रियासी जिला लिथियम की खोज के बाद काफी चर्चा में आया था। फरवरी 2023 में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने यहां करीब 59 लाख टन लिथियम अयस्क होने का अनुमान जताया था। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि यहां 59 लाख टन शुद्ध लिथियम मौजूद है। यह जमीन में मौजूद लिथियम वाले अयस्क का अनुमान है। खनन शुरू करने से पहले यह पता लगाना जरूरी है कि इसमें कितना लिथियम है, उसे निकालना कितना आसान है और इस पर कितना खर्च आएगा। इन सभी जांचों के बाद ही तय हो सकता है कि यहां खनन करना फायदेमंद होगा या नहीं।
सरकार की योजना से कम होगी निर्भरता?
इसी निर्भरता को कम करने के लिए भारत ने नई योजना शुरू की है। केंद्र सरकार ने 4 नवंबर 2026 को क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए 2,814 करोड़ रुपये की कैपेक्स सपोर्ट योजना को मंजूरी दी। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी। इसके तहत दो लिथियम प्रोसेसिंग प्लांट और दो निकेल प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित किए जाएंगे। हर एक लिथियम प्लांट की न्यूनतम क्षमता 30 हजार टन और प्रत्येक निकेल प्लांट की न्यूनतम क्षमता 50 हजार टन होगी। सरकार इन प्लांट की स्थापना के लिए योग्य निवेश पर 30 फीसदी तक पूंजी सब्सिडी देगी।
चुनौती क्या है?
भारत के लिए सिर्फ लिथियम, निकेल और कोबाल्ट के भंडार खोज लेना काफी नहीं है। इन खनिजों को जमीन से निकालने, साफ करने, इस्तेमाल लायक बनाने और पुराने उत्पादों से दोबारा हासिल करने की व्यवस्था भी बनानी होगी। नीति आयोग के मुताबिक, देश में खनन की नई परियोजनाएं शुरू होने में कई बार 10 साल से भी ज्यादा समय लग जाता है।
ऐसे में आने वाले कुछ सालों तक भारत को अपनी जरूरतों के लिए दूसरे देशों से खनिज खरीदने पड़ेंगे। इसके लिए भारत को देश में ही खनिजों की प्रोसेसिंग की क्षमता बढ़ानी होगी। दूसरे देशों के साथ भी समझौते करने होंगे, ताकि खनिजों की सप्लाई में कोई रुकावट न आए।
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