भारत पिछले कुछ सालों में रक्षा निर्यात के मामले में काफी आगे बढ़ा है। 2013-14 में भारत केवल 686 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात करता था, अब 2025-26 में यह आंकड़ा 38,424 करोड़ तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा करीब 56 गुना ज्यादा है। हालांकि, दुनिया भर में रक्षा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.2 फीसदी है। अमेरिका 43 फीसदी, फ्रांस 10 फीसदी, रूस 8 फीसदी पर है। भारत इन देशों से अभी बहुत पीछे है। दूसरी ओर रक्षा आयात के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है।
सरकार ने 2029 तक हर साल 50,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात और 3 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन का बड़ा लक्ष्य रखा है। अगले 3 से 4 सालों में इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए 11,576 करोड़ यानी करीब 30 फीसदी की और बढ़त चाहिए होगी। वहीं उत्पादन के मामले में 2029 तक 3 लाख करोड़ का टारगेट रखा गया है। यानी इस दिशा में उत्पादन के लिए करीब 68 फीसदी की बढ़त चाहिए।
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रक्षा निर्यात के मामले में भारत कितना पीछे?
भारत अभी भी दुनिया के शीर्ष 25 रक्षा निर्यातक देशों की सूची में स्थायी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है। भारत आखिरी बार इस लिस्ट में 4 साल पहले 23वें नंबर पर था। इस लिस्ट में जगह बनाने के लिए अभी और रफ्तार चाहिए होगी। दूसरी ओर बड़ी रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च घट रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि भारत निर्यात के मामले में दूसरे देशों के शीर्ष लिस्ट में कैसे अपनी जगह बना पाएगा।
आंकड़ों के मुताबिक, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO का बजट रुपयों में बढ़ा है। केंद्रीय बजट 2026-27 में इसके लिए 29,100.25 करोड़ रुपये दिए गए, जो पिछले वित्त वर्ष 2025-26 के 26,816.82 करोड़ रुपये की तुलना में अधिक है। करीब 8.5% की बढ़ा है। दूसरी ओर कुल रक्षा बजट के अनुपात में यह आंकड़ा लगातार घट रहा है।
2014-15 में कुल रक्षा खर्च का 4.7% हिस्सा R&D पर जाता था, जो 2026-27 के बजट अनुमान में घटकर सिर्फ 3.7% रह गया है। इंडस्ट्री प्रोटोटाइप डेवलपमेंट के लिए टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड में 16% कटौती हुई है। सीधे तौर पर देखा जाए तो रुपयों में बढ़त दिख रही है, लेकिन प्राथमिकता के तौर पर रिसर्च पीछे छूट रहा है।
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दुनिया की तुलना में रक्षा निर्यात में कहां पिछड़ रहा भारत?
बता दें कि रक्षा निर्यात में केवल हथियार (मिसाइल, टैंक आदि) ही नहीं, बल्कि रडार, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, कंपोनेंट्स, स्पेयर पार्ट्स, सॉफ्टवेयर और डिफेंस से जुड़ी दूसरी चीजें भी शामिल हैं। ऐसे में दुनिया के टॉप 25 हथियार बेचने वाले देशों में अपनी पक्की जगह बनाने के लिए अभी हर दिशा में काम करना होगा। क्योंकि इस मामले में सिर्फ हथियार बेच देना काफी नहीं होता, ग्राहक देशों को ट्रेनिंग देना, पार्ट्स सप्लाई करते रहना और लंबे समय तक सर्विस देना भी जरूरी होता है।
सरकार टारगेट को पूरा करने के लिए अब निजी क्षेत्र की भागीदारी 25 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी करने, कंपोनेंट और सब-सिस्टम एक्सपोर्ट बढ़ाने, और डिफेंस कॉरिडोर व FDI के जरिए निवेश आकर्षित करने पर दांव लगा रही है।