84.7 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार, एक तिहाई अंडरवेट, पोषण योजनाओं का हुआ क्या?
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे कई नई रिपोर्ट में कुपोषण की स्थिति में सुधार तो हुआ है लेकिन कई राज्यों में स्थिति अब भी चिंतानक है।

पीएम पोषण योजना के तहत स्कूली बच्चों को आहार दिया जाता है। Photo Credit: PTI
भारत में अस्पतालों में प्रसव की संख्या बढ़ने के बावजूद शिशु पोषण की स्थिति चिंताजनक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के आंकड़े बताते हैं कि देश में पोषण से जुड़ी तमाम योजनाओं के बाद भी एक बड़ा तबका, पोषण से कोसों दूर है। NFHS-6 की रिपोर्ट बताती है कि 6 से 23 महीने के सिर्फ 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल पा रहा है।
भारत में यह तब हो रहा है, जब आंगनबाड़ी, पोषण 2.O जैसी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये केंद्र और राज्य सरकारें खर्च कर रहीं हैं। देश के 84.7 फीसदी बच्चे, पोषक आहार से दूर हैं, कुपोषित हैं। नए आंकड़े बताते हैं कि छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में केवल स्तनपान की दर पिछले चार साल में तेजी से घटी है। 2021-22 में यह दर 63.7 प्रतिशत थी, जो NFHS-6 में घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई है। करीब आठ प्रतिशत की गिरावट आई है।
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1 तिहाई बच्चे अंडरवेट हैं
लंबे समय तक कुपोषण से होने वाली यह समस्या अब भी करीब एक-तिहाई बच्चों में है। देश में करीब एक 67.2 फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें सही आहार नहीं मिला है और वे अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन वाले हैं। यह आंकड़े, 5 साल तक के बच्चों के हैं। 31.8 फीसदी बच्चों को ही पोषण मिल पाता है। साल 2019-21 में यह आंकड़ा 32.1 था।
कुपोषण से होने वाली बीमारियों का दर्द समझिए
सही पोषण न मिल पाने की वजह से बच्चों के बहुत पतले होने की समस्या भी बनी हुई है। 6-23 महीने के बच्चों में पर्याप्त आहार पाने वाले कुल बच्चों की दर केवल 15.3 फीसदी। 5 साल से कम उम्र के 35.5% बच्चे ऐसे हैं, जिनका कद उम्र के हिसाब से कम है। 2019-21 में यह दर 29.3 फीसदी थी।
लंबाई के हिसाब से कम वजन के गंभीर मामले भी चिंताजनक बने हुए हैं। देश के 19 फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जिनका वजन, कद के हिसाब से ठीक नहीं है। साल 2019-21 में यह दर 19.3 फीसदी थी। गंभीर मामले में यह आंकड़ा 5.2 प्रतिशत है, जो कि साल 2019-21 में 19.3 थी। देश के 31.8 फीसदी बच्चे अंडरवेट हैं। 1.3 बच्चे ओवर वेट हैं।
डॉ. शाहिद अख्तर,पेडिट्रिशियन, आयशा हेल्थ केयर
बच्चों को 5 साल तक सही पोषण न मिले तो उनका विकास रुक जाता है। शरीर कमजोर हो जाता है, कद नहीं बढ़ता, वजन नहीं बढ़ता। बार-बार बीमार पड़ते हैं। दिमाग का विकास धीमा हो जाता है, कुछ मामलों में बच्चे हाइपर एक्टिव होने लगते हैं। ज्यादा गंभीर कुपोषण हो तो बच्चा सुस्त, चिड़चिड़ा और कमजोर रहता है। आगे चलकर बीमारियां और बढ़ जाती हैं। 5 साल तक संतुलित भोजन, दूध और फल-सब्जी बहुत जरूरी है।
रिपोर्ट में अच्छा क्या है?
सर्वे में कुछ अच्छी खबरें भी हैं। पूर्ण टीकाकरण की दर 76.6 प्रतिशत से बढ़कर 82.6 प्रतिशत हो गई है। गर्भावस्था में पहले तीन महीने में जांच कराने वाली माताओं की संख्या बढ़ी है और आयरन-फोलिक एसिड की गोली लेने में भी सुधार हुआ है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, शिशु को जन्म के बाद पहले छह महीने तक सिर्फ मां का दूध ही मिलना चाहिए। इसके बाद दो साल या उससे ज्यादा समय तक स्तनपान के साथ अन्य आहार भी दिया जाना चाहिए। NFHS-6 के आंकड़े दिखाते हैं कि इस दिशा में अभी काफी काम बाकी है।
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पोषण योजनाओं पर कितना खर्च करती है सरकार?
केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2025-26 में पोषण योजना पर 12,750 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा था। यह 2024-25 के संशोधित अनुमान 10,600 करोड़ से करीब 20 प्रतिशत ज्यादा है। 2025-26 की शुरुआत में 12,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन संशोधित अनुमान में इसे घटाकर ₹ 10,600 करोड़ कर दिया गया।
पीएम पोषण योजना पहले मिड डे मील योजना के नाम से चर्चित थी। स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना इस योजना का मकसद था, जिससे कुपोषण की समस्या कम हो। 2026-27 में इस पर 12,750 करोड़ रुपये खर्च करने का अनुमान है।
सरकार कौन सी योजना चलाती है?
केंद्रीय स्तर पर 'सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0' योजना है, जिसके तहत 6 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से 'टेक होम राशन' और गर्म पका हुआ भोजन जैसी पूरक पोषण सेवाएं दी जाती हैं। दूसरी प्रमुख योजना 'प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण' है। इसे पीएम पोषण योजना भी कहते हैं। पहले इसे मिड-डे मील कहा जाता था।
सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को दोपहर का पौष्टिक भोजन मुफ्त दिया जाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत बच्चों में कुपोषण और एनीमिया को रोकने के लिए 'एनीमिया मुक्त भारत' और 'विटामिन-ए संपूरण योजना' जैसे कुछ कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
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राज्यों में चल रहीं योजनाएं कौन सी हैं?
राज्य सरकारें इन केंद्रीय योजनाओं अपने-अपने राज्यों में लागू करती हैं। राज्य सरकारों की अपनी भी योजनाएं हैं। यूपी में 'मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना' के तहत प्रभावित बच्चों को पोषण सहायता दी जाती है, जबकि मध्य प्रदेश में 'मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संवर्धन कार्यक्रम' के जरिए अति कुपोषित (SAM) बच्चों की विशेष देखभाल की जाती है।
राजस्थान में 'मुख्यमंत्री बाल गोपाल योजना' चलाई जा रही है। यहां स्कूली बच्चों को दूध मुहैया कराया जाता है। बिहार में सप्लीमेंट्री न्यूट्रीशन प्रोग्राम चलाया जाता है। महाराष्ट्र में बच्चों से जुड़ी कुछ योजनाएं इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलेपमेंट सर्विस स्कीम भी चलाई जाती है।
सवाल क्या है?
पोषण की तमाम योजनाओं के बीच एक सच्चाई देश के 31.8 प्रतिशत बच्चों तक ही सही पोषण पहुंच पा रहा है, जबकि पोषण योजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च हो रहे हैं।
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