ISRO के प्राइवेटाइजेशन पर भड़की कांग्रेस, समझिए पूरे विवाद की कहानी
ISRO निजीकरण को लेकर बहस अब और तेज हो रही है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश के स्पेस प्रोग्राम को लेकर 'आक्रामक निजीकरण एजेंडा' चला रही है।

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। Photo Credit-Chat GPT
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने सोमवार को केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश के स्पेस प्रोग्राम को लेकर 'आक्रामक निजीकरण एजेंडा' चला रही है। उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि प्राइवेट स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए ISRO का गला क्यों घोंटा जा रहा है और उसे कमजोर क्यों किया जा रहा है? इसके अलावा, अपने एक पोस्ट में उन्होंने हाल में आई उन खबरों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि रॉकेट बनाने के काम में आगे चलकर ISRO की भूमिका कम होगी।
बता दें कि इन खबरों के मुताबिक, भारत के स्पेस सेक्टर में बड़ा बदलाव होने वाला है। ISRO अब खुद रॉकेट बनाने का काम धीरे-धीरे बंद करेगा। इसके बदले आगे रॉकेट बनाने की जिम्मेदारी निजी कंपनियों और कुछ सरकारी कंपनियों सौंपी जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे ISRO रिसर्च, नई टेक्नोलॉजी, वैज्ञानिक मिशन और जरूरी स्पेस सिस्टम पर ज्यादा ध्यान देगा। इस बदलाव का मकसद देश में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना और स्पेस सेक्टर को तेजी से आगे बढ़ाना है।
यह भी पढ़ें: बिहार सरकार लाई विद्या साथी ऐप, 24 घंटे मिलेंगे टीचर; स्टूडेंट्स का क्या फायदा?
क्या है पूरा विवाद?
ISRO को लेकर चल रहा विवाद दरअसल इस बात पर टिका है कि भारत अंतरिक्ष एजेंसी अब खुद रॉकेट बनाने और सैटेलाइट लॉन्च करने के काम से पीछे हटती जा रही है। तकनीकें और संपत्तियां धीरे-धीरे प्राइवेट कंपनियों को सौंपी जा रही हैं। IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका के मुताबिक, आने वाले समय में इसरो कोई रॉकेट खुद नहीं बनाएगा। रॉकेट बनाने का काम प्राइवेट सेक्टर या PSU को दिया जाएगा। इसकी शुरुआत SSLV से हो चुकी है। SSLV की तकनीक और इसे बनाने के अधिकार हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को दिए जा चुके हैं। अब PSLV और LVM3 जैसे बड़े रॉकेटों को भी निजी कंपनियों को देने की तैयारी है।
इसी बीच एक और खबर आई कि बड़ी संख्या में वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया और मिशनों में भी देरी हो रही है, जिससे विवाद और बढ़ा। कांग्रेस के नेता जयराम रमेश और बाकी विपक्ष का कहना है कि यह 'आक्रामक निजीकरण एजेंडा' सीधे PM और PMO की तरफ से चलाया जा रहा है, ताकि जानबूझकर इसरो को कमजोर किया जा सके। हालांकि, इस फैसले पर सरकार का कहना है कि इससे इसरो रूटीन कामों के बोझ से मुक्त होकर रिसर्च और नए मिशनों पर बेहतर तरीके से ध्यान दे पाएगा।
पिछले कुछ दिनों में हमारे देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में ISRO की भविष्य की भूमिका को लेकर कई खबरें सामने आई हैं। यह पूरी तरह स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा की तरह अंतरिक्ष कार्यक्रम को लेकर भी मोदी सरकार का आक्रामक निजीकरण का एजेंडा है। साफ है कि इसकी प्रेरणा खुद प्रधानमंत्री और उनके PMO से आ रही है। रॉकेट के विकास और निर्माण में ISRO की भूमिका को काफी सीमित करने की तैयारी है और सैटेलाइट से जुड़ी उसकी अधिकांश एसेट्स को पूरी तरह निजी कंपनियों को सौंपा जाना है। स्पेस स्टार्टअप्स को निश्चित रूप से प्रोत्साहन और समर्थन मिलना चाहिए लेकिन ISRO, जिसकी लंबे समय से निजी क्षेत्र के साथ उपयोगी और सफल साझेदारी रही है, उसे अब कमजोर और शक्तिहीन क्यों किया जा रहा है? पिछले कुछ महीनों में ही ISRO के 100-120 प्रमुख प्रोफेशनल्स नौकरी छोड़ चुके हैं, शायद उन्हें आने वाले हालात का अंदाजा हो गया है। ISRO के एक प्रतिष्ठित पूर्व चेयरमैन, जो प्रधानमंत्री से प्रेरित होकर अक्टूबर 2018 में BJP में शामिल हुए थे, उन्होंने भी इस नए अभियान को लेकर गंभीर संदेह जताए हैं। फिर जीवित पांच अन्य प्रतिष्ठित पूर्व चेयरमैन इस बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी बात क्यों नहीं रखते? जयराम रमेश, कांग्रेस सांसद
https://twitter.com/Jairam_Ramesh/status/2091756906843131930
कौन हैं बहस के मुख्य चेहरे, किसपर असर?
बहस कांग्रेस और खुद सत्ताधारी दल से जुड़े पूर्व ISRO चीफ इसके पक्ष में नहीं हैं। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने मोदी सरकार और PMO पर सीधा आरोप लगाया, तो दूसरी तरफ IN-SPACe, डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस और NSIL जैसी सरकारी संस्थाएं हैं जो निजीकरण की इस पूरी प्रक्रिया को अमल में ला रही हैं। इससे फायदे में HAL और L&T जैसी बड़ी प्राइवेट कंपनियां हैं, जिन्हें रॉकेट तकनीक मिल रही है। इसके अलावा, असर ISRO के उन 100-120 वैज्ञानिकों पर पड़ा है जिन्होंने इस्तीफा दे दिया। इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला नाम BJP से जुड़े पूर्व ISRO चेयरमैन का है, जिन्होंने खुद इस निजीकरण मुहिम पर सवाल खड़े किए हैं।
कब, क्या हुआ?
- 2020-21 में स्पेस सेक्टर रिफॉर्म्स की शुरुआत, IN-SPACe का गठन हुआ और प्राइवेट कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर खोला गया
- अक्टूबर 2021: PM मोदी ने ISpA (Indian Space Association) लॉन्च करते हुए स्पेस सेक्टर में निजी भागीदारी बढ़ाने की नीति साफ की
- 25 मार्च 2026: संसदीय स्थायी समिति (विज्ञान व तकनीक) की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि इसरो की उच्च-स्तरीय अंतरिक्ष और वैज्ञानिक तकनीकों को निजी कंपनियों को बहुत कम (अंडरवैल्यूड) दामों पर ट्रांसफर किया गया।
- जुलाई 2026: डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस ने फ्लैगशिप मिशनों से जुड़े ग्रुप 'A' वैज्ञानिकों के इस्तीफे रोकने के लिए इमरजेंसी आदेश जारी किया
- अगस्त 2026 (शुरुआत): IN-SPACe चेयरमैन पवन गोयनका ने पुष्टि की कि SSLV तकनीक HAL को ट्रांसफर हो चुकी है, PSLV-LVM3 भी होने वाला है।
- 24 अगस्त 2026: पूर्व ISRO चेयरमैन जी. माधवन नायर के संदेह जताने के बाद, कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने X पोस्ट के जरिए इसे "आक्रामक निजीकरण एजेंडा" बताते हुए हमला बोला
कहां से उठी यह बहस?
यह विवाद मुख्य रूप से दिल्ली से जुड़ा है, जहां संसद में मार्च 2026 को संसदीय समिति की रिपोर्ट पेश हुई और कांग्रेस ने अपना विरोध दर्ज कराया। 2 अहम स्पेस लोकेशन भी इसके केंद्र में हैं, पहला आंध्र प्रदेश का ऐतिहासिक श्रीहरिकोटा स्पेसपोर्ट, जिसका भविष्य अब अनिश्चित बताया जा रहा है, दूसरा तमिलनाडु में बन रहा नया दूसरा स्पेसपोर्ट, जिस पर ISRO करीब 1,000 करोड़ रुपये का निवेश कर रहा है और जिसे अब एक निजी कंपनी को सौंपे जाने की योजना है।
कैसे बदल रहा ISRO का भविष्य?
बता दें कि सरकार यह काम धीरे-धीरे कर रही है। पहले SSLV रॉकेट बनाने का जिम्मा HAL को सौंपा गया, और अब PSLV और LVM3 जैसे बड़े रॉकेट भी इसी राह पर हैं। ISRO की कमर्शियल शाखा NSIL ने कई तकनीकें प्राइवेट कंपनियों को ट्रांसफर की हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तमिलनाडु के नए स्पेसपोर्ट को भी जल्द किसी प्राइवेट कंपनी को सौंपे जाने की तैयारी है। इस पूरी प्रक्रिया को IN-SPACe नाम की संस्था देख रही है, जिसका काम ही स्पेस सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों को लाना है।
और पढ़ें
Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies
CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | EDITORIAL POLICY | Sitemap





