केंद्र सरकार ने 6 अक्टूबर 2026 को लैब्स में जानवरों पर होने वाले प्रयोगों को लेकर नए नियमों का मसौदा जारी किया था। इसे 7 अक्टूबर को सरकारी गजट में पब्लिश किया गया। इस पर आम लोगों से 5 नवंबर 2026 तक सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं। इसपर लगातार सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में पशु अधिकार संगठन 'पेटा इंडिया' (PETA India) ने जानवरों को लेकर केंद्र सरकार के नए नियमों को वापस लेने की मांग की है। संगठन का कहना है कि इन नियमों से जानवरों को मिलने वाली मौजूदा सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
पेटा इंडिया का कहना है कि नए नियमों के तहत वैज्ञानिक वजह और कानूनी मंजूरी मिलने पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत सुरक्षित जानवरों को भी पकड़कर उन पर प्रयोग किए जा सकते हैं। वहीं कुछ खास परिस्थितियों में आवारा कुत्तों और बिल्लियों पर भी प्रयोग करने की छूट दी गई है। पेटा इंडिया ने कहा कि मसौदे में ऐसी गंभीर पीड़ा पर रोक लगाने की बात कही गई है, जिसे कम नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद कुछ ऐसे प्रयोगों की अनुमति दी गई है, जिनमें जानवरों को काफी दर्द और तकलीफ हो सकती है।
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समझिए मसौदे में क्या है?
पशु प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण के लिए समिति (CCSEA), पशुपालन और डेयरी विभाग, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार ने इस मसौदे को जारी किया है। नए नियम 1968 और 1998 के पुराने नियमों की जगह लेंगे। अधिसूचना 30 सितंबर 2026 की है। गजट में यह 6 अक्तूबर को छपी। पढ़ें मसौदे में क्या है?
- जहां हो सके, जानवर की जगह दूसरा तरीका अपनाना होगा। जानवर कम से कम लिए जाएंगे और उन्हें तकलीफ कम से कम दी जाएगी।
- प्रयोग को तकलीफ के हिसाब से चार श्रेणी में बांटा गया है, नॉन-रिकवरी, हल्का, मध्यम और गंभीर।
- जिस प्रयोग में लंबे समय तक तेज दर्द हो और उसे कम न किया जा सके, वह नहीं होगा।
- गंभीर और नॉन-रिकवरी प्रयोग में अगर जानवर चूहे-खरगोश से बड़ा है, तो CCSEA मंजूरी देगी। फैसला 30 कामकाजी दिन में होगा।
- हल्के और मध्यम प्रयोगों की मंजूरी संस्था की अपनी नैतिक समिति (IAEC) देगी।
- जंगल से पकड़े गए जानवर, आवारा पशु और बंदरों के इस्तेमाल पर रोक है लेकिन बहुत जरूरी हो और कोई दूसरा रास्ता न हो, तो छूट मिलेगी।
- वन्यजीव कानून में सूचीबद्ध बंदरों पर प्रयोग बिल्कुल नहीं होगा।
- जानवर पालने, बेचने और उन पर प्रयोग करने वाली हर संस्था को CCSEA में पंजीकरण कराना होगा। पंजीकरण 3 साल चलेगा।
- हर संस्था को इच्छामृत्यु रजिस्टर रखना होगा। इसमें तारीख, जानवर की प्रजाति, तरीका, दवा की मात्रा और कारण लिखा जाएगा।
- इसपर शोधकर्ता और पशु-चिकित्सक दोनों के दस्तखत होंगे। हर प्रयोग पशु-चिकित्सक की निगरानी में होगा।
गड़बड़ी मिलने पर क्या होगा?
इस स्थिति में पहले कमी का नोटिस मिलेगा। सुधार के लिए 15 दिन होंगे। न सुधरे, तो पंजीकरण रद्द या निलंबित हो सकता है। इससे पहले संस्था को सुनवाई का मौका मिलेगा। जानवरों की जान को खतरा हो, तो तुरंत रोक लग सकती है। संस्था 30 दिन के अंदर मंत्रालय के सचिव से अपील कर सकती है। आवारा कुत्ते-बिल्लियों पर प्रयोग की मनाही है। हालांकि मसौदे के नियम 5(3) में कुछ शर्तों पर छूट का रास्ता है।
इस स्थिति में संबंधित अधिकारी छूट दे सकते हैं, लेकिन दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए। पहला उन जानवरों की सेहत और भलाई पर अध्ययन जरूरी हो, या पर्यावरण, इंसान या जानवरों की सेहत को गंभीर खतरा हो। दूसरा वैज्ञानिक कारण देकर साबित करना होगा कि यह काम सिर्फ आवारा या जंगली घरेलू जानवर से ही हो सकता है।
पेटा का क्या कहना है?
पेटा का कहना है कि दुनियाभर में जानवरों के बिना रिसर्च करने के नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। ऐसे में सरकार को जानवरों पर प्रयोग के नए रास्ते खोलने के बजाय ऐसी तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए, जिनमें जानवरों का इस्तेमाल न करना पड़े। साथ ही, जानवरों की सुरक्षा के मौजूदा नियमों को भी मजबूत किया जाना चाहिए।
संगठन ने इन प्रस्तावित नियमों को वापस लेने की मांग की है। उसका कहना है कि सरकार को ऐसे सख्त नियम बनाने चाहिए, जिनसे जंगली और समुदाय में रहने वाले जानवरों की सुरक्षा हो, प्रयोगशालाओं पर स्वतंत्र निगरानी बनी रहे और रिसर्च में जानवरों के बजाय दूसरे वैज्ञानिक तरीकों को प्राथमिकता दी जाए।