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NEET छात्र आंदोलन से ठप रहा संसद का मानसून सत्र? केवल 15 प्रतिशत हुआ काम

NEET छात्र आंदोलन और हंगामे के बीच संसद का मानसून सत्र बुरी तरह प्रभावित रहा। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल मानसून सत्र में लोकसभा में सिर्फ 15 प्रतिशत समय ही काम हुआ।

 Parliament Monsoon Session 2026

मानसून सत्र- लोकसभा, Photo PTI

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इस बार संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई 2026 से शुरू हुआ और यह 13 अगस्त 2026 तक चला। आंकड़े बताते हैं पिछले 22 साल में सिर्फ दो सत्र ही इससे बदतर रहे हैं। इससे पहले शीतकालीन सत्र 2010 में केवल 5 प्रतिशत और शीतकालीन सत्र 2013 में केवल 8 प्रतिशत ही काम हुआ था। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, जो संसद के कामकाज पर लगातार नजर रखती है, उसके मुताबिक इस बार मानसून सत्र 2026 में लोकसभा में तय समय का सिर्फ 15 प्रतिशत ही काम के लिए इस्तेमाल हुआ। राज्यसभा में हालात थोड़े बेहतर रहे, वहां 33 प्रतिशत समय काम हुआ। संसद का बाकी कीमती समय हंगामे-नारेबाजी में चला गया।  

 

वहीं दूसरी ओर प्रश्नकाल का समय भी खराब गुजरा, बता दें कि संसद में हर दिन एक तय समय होता है जिसे प्रश्नकाल कहते हैं। इसी दौरान सांसद सीधे सरकार से सवाल पूछ सकते हैं। इस सत्र में लोकसभा में कुल 380 सवाल पूछे जाने थे, लेकिन सिर्फ 2 सवालों का ही मौखिक रूप से जवाब मिल सका। इसके अलावा, राज्यसभा में भी 285 सवालों में से सिर्फ 16 सवालों का जवाब मिला। 

 

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छात्र आंदोलन से ठप पड़ा मानसून सत्र? 

मानसून सत्र कुल 25 दिन चला और 19 बैठकें हुईं। शुरुआत से ही सदन में जमकर हंगामा शुरू हो गया। सबसे बड़ा कारण छात्र आंदोलन रहा। विपक्ष ने NEET -UG पेपर लीक और छात्रों के आंदोलन पर चर्चा की मांग की, पर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बन पाई। इसके अलावा, राम मंदिर में कथित चंदा चोरी के मामले में भी सदन में जमकर हंगामा हुआ। इस वजह से पहले ही हफ्ते में लोकसभा सिर्फ 5 प्रतिशत और राज्यसभा सिर्फ 6 प्रतिशत काम कर पाई। बाद में भी यही हाल रहा। 

 

 

पूरे सत्र में रोजाना हंगामे के चलते सदन बार-बार स्थगित होता रहा, सिर्फ 28-29 जुलाई को ही ठीक-ठाक काम हुआ (28 जुलाई को करीब 9 घंटे)। बाकी दिन कामकाज लगभग शून्य रहा। सत्र के दौरान कुल 12 विधेयक पेश हुए, इनमें से 9 विधेयक ऐसे थे, जिन पर मंत्री के अलावा किसी सांसद ने चर्चा में हिस्सा नहीं लिया। सिर्फ पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 पर करीब 11 घंटे की विस्तृत चर्चा हुई। राज्यसभा में भी कई विधेयकों पर सीमित चर्चा हुई, लेकिन विस्तृत चर्चा मुख्य रूप से इसी विधेयक पर हुई।

 

सरकार के अलग आंकड़े 

बता दें कि सरकार के आंकड़े इससे थोड़ा अलग हैं, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सत्र के अंतिम दिन लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत बताई थी। यह अंतर इसलिए है क्योंकि सरकार और पीआरएस के गणना के तरीकों में फर्क है, पर दोनों ही आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि सत्र बेहद कम उत्पादक रहा। संसद का बाकी कीमती समय हंगामे और नारेबाजी में चला गया।

 

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संसद ठप रहने की कीमत 

संसद चलाना काफी खर्चीला काम है। इसमें सांसदों के साथ सचिवालय, सुरक्षा, तकनीकी सुविधाएं, अनुवाद और कर्मचारियों का खर्च शामिल होता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने 2012 में बताया था कि दोनों सदनों की कार्यवाही पर करीब ₹2.5 लाख प्रति मिनट खर्च होता है। यानी एक घंटे की कार्यवाही की लागत करीब ₹1.5 करोड़ बैठती है। हालांकि यह आंकड़ा पुराना है और आज खर्च ज्यादा हो सकता है। सरकार ने इसका कोई नया आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है। 

सरकार और विपक्ष आमने-सामने

संसद का मानसून सत्र खत्म होने के बाद बीजेपी और विपक्ष ने एक-दूसरे पर सदन की कार्यवाही ठप करने का आरोप लगाया। बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्हें अपरिपक्व, अनुभवहीन और अनुशासनहीन बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी के रवैये की वजह से पूरा मानसून सत्र खराब हुआ।

 

वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार पर संसद को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सदन में आकर विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे रहे थे। खरगे ने आरोप लगाया कि सरकार संसद को महत्वहीन बनाना चाहती है। 

अब आगे क्या? 

बता दें कि सत्र खत्म होने तक शीतकालीन सत्र 2026 की तारीखों का औपचारिक लान नहीं हुआ है। हालांकि, इतना तय है कि इस सत्र में उठे कई मुद्दे, जैसे परिसीमन और FCRA से जुड़े विधेयक, जिन्हें इस मानसून सत्र में टाल दिया गया। 


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