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'संदेश जाना चाहिए...', सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी शिवसेना पार्षद की जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर के साथ मारपीट के मामले में शिवसेना कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे की जमानत को रद्द कर दिया है। साथ ही उन्हें 3 दिन के अंदर सरेंडर करने का निर्देश दिया गया है।

Corporator Ramesh Mhatre

कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे, Photo Credit- Social Media

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सुप्रीम कोर्ट ने ठाणे के सिविल अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ मारपीट के आरोपी शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे की जमानत रद्द कर दी है। कोर्ट ने उन्हें साफ निर्देश दिया है कि वह 3 दिन के अंदर सरेंडर करें। कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यह संदेश साफ तौर पर जाना चाहिए कि मेडिकल समुदाय को हाथ नहीं लगाया जा सकता है। 

 

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के जमानत आदेश पर रोक लगा दी है। 

 

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कोर्ट का कड़ा रुख

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान डॉक्टरों के साथ होने वाली मारपीट पर सख्त टिप्पणी की। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के जमानत आदेश पर रोक लगा दी। उन्होंने साफ किया कहा कि मेडिकल समुदाय के लोग दिन-रात हमारी सेवा करते हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह की हरकत को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 

 

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, 'यह संदेश साफ तौर पर जाना चाहिए कि मेडिकल फील्ड के लोगों को हाथ नहीं लगाया जा सकता।' कोर्ट ने आगे कहा, 'हेल्थ सिस्टम से जुड़े लोग हमारी सेवा करते हैं। उन पर इस तरह का हमला नहीं किया जा सकता।' साथ ही आदेश दिया कि रमेश म्हात्रे को 3 दिन के अंदर सरेंडर करना चाहिए।  

क्या था पूरा मामला?

शिवसेना कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे पर कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (KDMC) के शास्त्री नगर अस्पताल में डॉक्टरों और कर्मचारियों से मारपीट का आरोप है। इसी आरोप में बॉम्बे हाई कोर्ट ने कुछ सख्त शर्तों के साथ रमेश को रिहा करने का आदेश दिया था। इसी फैसले को महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। रमेश के वकील ने कोर्ट में कहा कि मामला मजिस्ट्रेट ट्रायल का है। इस मामले में अधिकतम 5 साल की सजा का प्रावधान है। उनका तर्क था कि आरोपी पहले भी हिरासत में रह चुका है। साथ ही जांच में सहयोग कर रहा है। 


आपको बता दे कि रमेश को 6 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। एक सेशंस कोर्ट ने उन्हें 14 जुलाई को जमानत दे दी थी। लेकिन इस मामले में हाई कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया था। बाद में 18 जुलाई को हुई एक विशेष सुनवाई के बाद जमानत के आदेश पर रोक लगा दी और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

 

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रमेश के वकील का तर्क

रमेश के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि मामला मजिस्ट्रेट ट्रायल का है और अधिकतम सजा पांच साल है। साथ ही आरोपी पहले भी हिरासत में रह चुका है और जांच में सहयोग कर रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। राज्य सरकार का रमेश के आपराधिक रिकॉर्ड और अन्य मामलों की ओर इशारा करने पर पीठ ने उन सभी मामलों का रिकॉर्ड भी तलब किया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों पर बार-बार होने वाले हमलों को महज सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए आरोपी को तुरंत सरेंडर करने का निर्देश दिया।


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