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अगला एक साल चुनौतीपूर्ण, सुपर अल नीनो को लेकर 180+ वैज्ञानिकों ने चेताया

भारत पर एक बेहद शक्तिशाली 'सुपर अल नीनो' का खतरा मंडरा रहा है। इसको लेकर देश के 180 से ज्यादा पर्यावरण और मौसम वैज्ञानिकों ने बड़ी चिंता जताई है। सरकार से तुरंत जरूरी कदम उठाने की अपील की है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

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देश के वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि 2026-27 के दौरान अल नीनो का जोरदार असर देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर अब केवल तापमान और बारिश तक ही सीमित नहीं है बल्कि भारत के जंगलों, नदियों, समुद्री इकोसिस्टम आदि पर भी पड़ेगा। करीब 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने इस चरम जलवायु घटना के लिए तैयारी बढ़ाने को कहा है। 

 

हम सब जानते हैं कि अल-नीनो का असर जलवायु पर पड़ता रहता है। इसकी जानकारी हमें मिलती रहती है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अल नीनो के दौरान कोई जंगल छोटे होने लगे, कोई भी नदी सिकुड़ने लगी या किसी इलाके में किसी प्रजाति की संख्या अचानक गिरने लगे, तो क्या हम समय रहते हर बदलाव को दर्ज कर पाएंगे?

 

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अल नीनो आखिर करता क्या है?

अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक घटना है। आसान शब्दों में समझे तो समुद्र की सतह पर तापमान में किसी भी तरह की असामान्य बढ़ोतरी। समुद्र में होने वाला यह बदलाव दुनिया के कई हिस्सों को प्रभावित करता है। जितना ज्यादा यह मजबूत होगा दुनिया के हिस्सों में चरम मौसमी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। 

 

भारत के लिए इसका महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि मानसून और अल नीनो के बीच संबंध रहा है। जुलाई 2026 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने संसद में बताया था कि 2026 में अल नीनो की स्थिति कमजोर से बढ़कर मध्यम हुई थी। अक्टूबर-दिसंबर के दौरान इसके बहुत मजबूत होने की संभावना थी। साथ ही सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि भारत पर इसका वास्तविक असर केवल अल नीनो की ताकत से तय नहीं होता बल्कि समुद्र और वायुमंडल की दूसरी परिस्थितियां भी इसमें भूमिका निभाती हैं।

असल में चिंता क्या है?

अगर लंबे समय तक बारिश कम होती है और तापमान बढ़ता है तो इसका असर जंगलों पर पड़ सकता है। मिट्टी में नमी घट सकती है। छोटे जलाशय सूख सकते हैं और पेड़-पौधों पर पानी का दबाव बढ़ सकता है। इससे जंगल की आग का खतरा बढ़ सकता है।

 

बात सिर्फ इतनी नहीं है। जंगल एक पूरा इकोसिस्टम है। पेड़ों के अलावा उसमें कीड़े, पक्षी, मिट्टी के जीव और कई अनगिनत जीव शामिल होते हैं। अगर इस दौरान कुछ भी बदलता है तो इन जीवों के व्यवहार और संख्या में भी बदलाव हो सकता है। 

 

समस्या यह है कि ऐसे बदलाव हमेशा तुरंत दिखाई नहीं देते। किसी बड़ी प्रजाति के मरने की खबर सामने आ सकती है लेकिन किसी छोटे कीड़े या पौधे की स्थानीय आबादी में गिरावट शायद ही किसी को नजर आए। अगर इस दौरान निगरानी नहीं हुई तो बाद में यह पता लगाना भी मुश्किल हो सकता है कि बदलाव कब और कैसे शुरू हुआ था। यही वजह है कि वैज्ञानिकों की हालिया अपील में सिर्फ आपदा के बाद नुकसान गिनने के बजाय पहले से निगरानी और रिसर्च बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

 

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नदियों पर असर

अल नीनो से जुड़ी बारिश में कमी का एक महत्वपूर्ण असर पानी के स्रोतों पर हो सकता है। नदियां, तालाब और मौसमी जल के स्त्रोत केवल इंसानों के लिए पानी उपलब्ध नहीं कराते। इन पर मछलियों, कीड़ों, चिड़ियों और दूसरे जीवों की भी निर्भरता रहती है।

 

अगर किसी नदी या जलस्रोत में पानी का स्तर लंबे समय तक कम रहता है तो पानी का तापमान, ऑक्सीजन और उसमें रहने वाले जीवों की परिस्थितियां बदल सकती हैं। कुछ प्रजातियां ऐसी स्थिति को सह सकती हैं जबकि दूसरी प्रजातियां ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं।

 

यहां एक और समस्या सामने आती है। भारत में हर छोटी नदियां या जलाशयों की लगातार वैज्ञानिक निगरानी नहीं होती। इसलिए किसी चरम मौसम की घटना के बाद जो नुकसान सामने आएगा, उसका पूरा रिकॉर्ड मिलना जरूरी नहीं है। यानी जो चीज दर्ज नहीं हुई, उसके गायब होने का पता भी देर से चल सकता है।

 

वैज्ञानिकों की अपील में समुद्री पारिस्थितिकी को भी शामिल किया गया है। यह बदलाव हमेशा किसी बड़े तूफान की तरह दिखाई नहीं देता। कभी-कभी समस्या यह होती है कि किसी खास क्षेत्र में कुछ प्रजातियां कम हो रही हैं। अगर इसका लंबे समय तक रिकॉर्ड न रखा जाए तो बाद में इन बदलावों को किसी एक घटना से जोड़ना कठिन हो सकता है।

'सबसे बड़ा डर रिकवरी का है'

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि  2026-27 का अल नीनो भारत की किसी प्रजाति को हमेशा के लिए खत्म कर देगा। अभी यह कहने के लिए हमारे पास पर्याप्त प्रमाण नहीं है।  वैज्ञानिकों की चिंता का दूसरा पहलू यह है कि चरम मौसम घटनाएं पहले से ही दबाव झेल रहे इकोसिस्टम को और खराब कर सकता है। 

 

मान लीजिए कोई जंगल पहले ही गर्मी, इंसानी गतिविधियों और पानी की कमी के नुकसान से दबाव में है। उसी समय इस तरह की कोई स्थिति पैदा हो जाए तो इससे पहले जैसी स्थिति में लौटना आसान नहीं हो सकता। यही वह जगह है जहां ‘स्थायी बदलाव’ का सवाल सामने आता है। हर असर स्थायी नहीं होगा लेकिन कुछ स्थानीय आबादी या पारिस्थितिकी तंत्र को सामान्य स्थिति में लौटने में लंबा समय लग सकता है। 

 

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'चेतावनी नहीं, निगरानी की जरूरत'

180 से ज्यादा वैज्ञानिकों की अपील का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। उन्होंने चरम जलवायु घटनाओं के दौरान प्राकृतिक दुनिया और उससे जुड़े सामाजिक तंत्रों को बेहतर तरीके से समझने के लिए रिसर्च और मॉनिटरिंग बढ़ाने की जरूरत बताई है। मुश्किल काम यह पता लगाना है कि नुकसान शुरू कब हुआ। साथ ही कौन-सी प्रजाति पहले प्रभावित हुई और किस स्तर पर कोई तंत्र अपनी पुरानी स्थिति में कैसे लौट पाएगी।

 

प्रकृति में छोटे-बड़े बदलाव हमारी निगरानी से ना छूट पाएं इसके लिए भरसक प्रयास करने होंगे। कहीं ऐसा ना हो कि कुछ मामलों में लौटना बहुत मुश्किल हो जाएं। फिलहाल वैज्ञानिकों के पास यह कहने का आधार नहीं है कि 2026-27 का अल नीनो निश्चित रूप से ऐसे स्थायी नुकसान करेगा। लेकिन उपलब्ध चेतावनियां यह जरूर बताती हैं कि अगर यह घटना बहुत मजबूत होती है तो भारत के प्राकृतिक तंत्रों पर इसके असर को दर्ज करने और समझने में देरी खुद एक बड़ी समस्या बन सकती है।


वैज्ञानिकों का मानना है कि नुकसान होने के बाद हाथ-पांव मारने से बेहतर है कि अभी से तैयारी की जाए। इसके लिए जगह-जगह छोटे मौसम केंद्र बनाने, तापमान और नमी का रिकॉर्ड रखने तथा वैज्ञानिकों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है। अल नीनो को रोकना हमारे हाथ में नहीं है लेकिन सही समय पर सही कदम उठाकर इसके नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है।

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