सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को आवारा कुत्तों से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि इस मामले की कल यानी शुक्रवार को सुनवाई होगी। पीठ ने अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा किया। और कहा, 'कुत्ता हमेशा उस शख्स को पहचान लेता है, जो कुत्तों से डरता है। जब उसे यह लगता है तो वह हमला कर देता है। हम यह बात अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहे हैं।'
सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि फीडिंग जोन परेशानी का कारण बन रहे हैं। यहां अधिक कुत्तों के कारण आसपास के लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यह भी कहा कि कुछ पशु मालिक सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को बिना पट्टे के छोड़ देते हैं। इससे सुरक्षा संबंधी चिंता बढ़ जाती है।
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वकील ने तर्क दिया कि राज्य आवारा कुत्तों का मालिक नहीं है। टीकाकरण और नसबंदी तक उसकी जिम्मेदारी सीमित है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी शख्स को अपने घर और गली तक जाने के अधिकारी से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। सड़कों को सुरक्षित और सुगम रखा जाना चाहिए।
माइक्रोचिप लगाने का सुझाव
वकील नकुल दीवान ने कुत्तों को माइक्रोचिप लगाने का सुझाव दिया। उनका कहना है कि बेंगलुरु में माइक्रोचिपिंग शुरू हो गई। यह महंगा भी नहीं है। उन्होंने 'पकड़ो, नसबंदी करो और छोड़ो मॉडल' का सुझाव दिया, लेकिन यह भी कहा कि कुत्तों को उसी स्थान पर ही छोड़ा जाए, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। दीवान ने एक विशेषज्ञ समिति के गठन की वकालत की, ताकि आवार कुत्तों की समस्या से निपटा जा सके। यह भी कहा कि कुत्तों की सामुदायिक संख्या पर अंकुश लगाना जरूरी है।
इलाके के प्रति संवेदनशील होते हैं कुत्ते
याचिकाकर्ता विजय गोयल के वकील ने कहा कि कुत्ते अपने इलाके को लेकर संवेदनशील होते हैं। उनका इलाका हर 200 से 300 मीटर में बदलता रहता है। अक्सर भोजन की तलाश में वह दूसरे कुत्ते के इलाकों में घुस जाते हैं। इससे टकराव का खतरा बढ़ जाता है। इस वजह से वहां रहने वाले लोगों को कुत्ते काटने का खतरा भी होता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों को घरों और सार्वजनिक सड़कों तक पहुंच की रक्षा की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया पिछला आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश को स्पष्ट किया और कहा कि सड़कों से हर आवारा कुत्ते को हटाने का आदेश नहीं दिया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों का कड़ाई से पालन करना है। अदालत ने कहा कि सिर्फ संस्थागत क्षेत्रों से कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया गया है। हालांकि पीठ ने यह भी पूछा कि अस्पताल के वार्डों और मरीजों के आसपास कितने कुत्तों को घूमने की अनुमति दी जानी चाहिए?
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आवासीय क्षेत्र तक आदेश को बढ़ाने की मांग
उधर, वकील विनय नवारे ने कहा कि एबीसी नियमों को चुनौती नहीं दी जा रही है। मगर समस्या उनके कार्यान्वयन में है। उन्होंने सभी राज्यों में लखनऊ मॉडल लागू कराने की वकालत की। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना होगा और इसमें सबसे अहम स्थानीय निकाय ग्राम पंचायत और नगर परिषद को शामिल किया जा सकता है।
एक अन्य वकील ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को आवासीय क्षेत्र तक बढ़ाने की मांग की। उनका कहना है कि कुत्ते को समझाया नहीं जा सकता। मगर कुत्ते के मालिक को समझाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एबीसी नियम कुत्तों की आबादी को धीरे-धीरे कम करने की खातिर बनाए गए हैं, न कि बढ़ाने को।
सड़कें आवारा जानवरों से मुक्त हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि देश में होने वाली मौतें सिर्फ कुत्तों के काटने सीमित नहीं है। आवारा जानवरों के कारण सड़क हादसों में भी जानें जाती हैं। सड़कें कुत्तों और आवारा जानवरों से मुक्त होनी चाहिए। कुत्तों के काटने की घटनाएं ही नहीं, बल्कि सड़कों पर आवारा जानवरों का घूमना भी खतरनाक साबित हो रहा है। यह दुर्घटनाओं का कारण बन रहा है। सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में होगा? यह कोई नहीं जानता। नगर निकायों को नियमों और निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा।