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विदेश में डॉक्टर की डिग्री लेने वालों के लिए बड़ी राहत, SC ने दिया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है की जब इंटर्न को पूरा स्टाइपेंड मिल चुका है तो भेदभाव करना असंवैधानिक है। अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को तीन हफ्ते में भुगतान का निर्देश दिया है।

Order on stipend for internship

प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit : ChatGpt

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विदेशी मेडिकल स्नातकों (एफएमजी) को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में जून 2023 से जून 2024 के बीच अपनी मेडिकल इंटर्नशिप पूरी करने वाले छात्रों को उनकी लंबित छात्रवृत्ति (वजीफा) राशि शीघ्र जारी की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि उन्हीं की तरह के इंटर्न को पहले ही पैसे दिए जा चुके हैं तो उनके साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता है। अदालत ने इस तरह के भेदभाव को अस्वीकार्य और संविधान के समानता सिद्धांत के विपरीत बताया। 

 

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने 4 फरवरी को एएमयू से संबद्ध एक मेडिकल कॉलेज की महिला विदेशी मेडिकल स्नातकों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका में भारतीय मेडिकल स्नातकों (इंडियन मेडिकल ग्रेजुएट्स, आईएमजी) और जूनियर महिला मेडिकल स्नातकों के बराबर वजीफा दिए जाने की मांग की गई थी। पीठ ने माना कि याचिकाकर्ताओं का दावा पूरी तरह न्यायसंगत है और इसमें लंबी सुनवाई की आवश्यकता नहीं है।

कुछ लोगों को मिला स्टाइपेंड

याचिका लगाने वाले भारतीय नागरिक हैं और उन्होंने दूसरे देशों जैसे- कजाकिस्तान, फिलीपींस, रूस और चीन जैसे देशों से अपनी मेडिकल शिक्षा पूरी की थी। अनिवार्य स्क्रीनिंग जरूरतों को पूरा करने के बाद उन्होंने भारत लौटकर जून 2023 से जून 2024 के बीच एएमयू के जेएन मेडिकल कॉलेज में अपनी अनिवार्य रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप पूरी की। याचिका में कहा गया कि इसके बावजूद उन्हें कोई स्टाइपेंड नहीं दिया गया, जबकि उसी संस्थान में इंटर्नशिप कर रहे भारतीय मेडिकल स्नातकों को प्रति माह 26,300 रुपये  दिया जा रहा था।

 

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुईं एडवोकेट चारू माथुर ने अदालत को बताया कि उनके बैच को पहले ही सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य मामले में 15 जुलाई 2025 को पारित आदेश के माध्यम से स्टाइपेंड मिल चुका है। ऐसे में सीनियर बैच को स्टाइपेंड न देना न केवल अनुचित है, बल्कि समानता के संवैधानिक सिद्धांत का भी उल्लंघन है। इसी आधार पर महिला मेडिकल स्नातकों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

 

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यूजीसी का मुद्दा

मामले की सुनवाई के दौरान एक प्रमुख मुद्दा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की पूर्व अनुमति का भी उठा। अधिकारियों की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि वे याचिकाकर्ताओं के स्टाइपेंड पाने के अधिकार से इनकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन बिना यूजीसी की स्पष्ट मंजूरी के स्टाइपेंड वितरित करने पर रेग्युलेटरी ऐक्शन की आशंका है। इस पर पीठ ने कहा कि ऐसी दलील पहले भी दी जा चुकी है और उस पर स्पष्ट रूप से निर्णय हो चुका है।

 

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों को यह कहते हुए पूर्ण संरक्षण दिया कि न्यायिक आदेशों के तहत दिए गए स्टाइपेंड पर यूजीसी या किसी अन्य नियामक संस्था द्वारा कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जाएगी। अदालत ने अपने पहले के आदेश को दोहराते हुए कहा कि छात्रवृत्ति का भुगतान छात्रों का अधिकार है और आपत्तियों या प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर इस अधिकार से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता।

 

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पीठ ने कहा कि जब अधिकार को लेकर कोई गंभीर विवाद ही नहीं है, तो भुगतान में देरी का कोई तुक नहीं बनता है। अदालत ने अपने पहले के एक फैसले का भी जिक्र किया जिसमें यह कहा गया था कि महिला ग्रेजुएट ट्रेनी इंटर्नशिप अवधि के दौरान स्टाइपेंड पाने की हकदार हैं।

 

उस मामले में संबंधित चिकित्सा संस्थान ने खुद यह बयान दिया था कि वह दो सप्ताह के भीतर पूरी छात्रवृत्ति राशि जारी करने के लिए तैयार है। उस आदेश में भी सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि यूजीसी द्वारा इस आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी कि स्टाइपेंड बिना अनुमति के दिया गया है।

अदालत ने बताया भेदभाव

पीठ ने यह भी कहा कि सीनियर्स को स्टाइपेंड देने से इनकार करना या कम देना न केवल भेदभाव है, बल्कि समान कार्य के लिए समान वेतन और समान सम्मान के सिद्धांत के खिलाफ भी है। अदालत ने इसे अस्वीकार्य करार देते हुए याचिका स्वीकार कर ली है। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'बकाया स्टाइपेंड राशि का भुगतान शीघ्र करें और किसी भी स्थिति में आज से तीन सप्ताह के भीतर पूरा भुगतान किया जाए।


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माना जा रहा है कि इस निर्णय से सैकड़ों विदेशी प्रशिक्षित भारतीय डॉक्टरों को सीधा लाभ मिलेगा, जो अनिवार्य चिकित्सा प्रशिक्षण के दौरान लंबे समय से असमान व्यवहार की शिकायत कर रहे थे।

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