देशभर की सियासी पर्टियों में मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का चलन शुरू हो चुका है। चुनाव से ठीक पहले सियासी दल बड़ी-बड़ी घोषणाएं करते हैं, ताकि सत्ता में उनकी वापसी हो सके। अब गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त की रेवड़ी बांटने वाली संस्कृति की कड़ी आलोचना की और इसे आर्थिक विकास में बाधा बताया। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का यह सही समय है।
तमिलनाडु में उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी को फ्री बिजली देने का प्रस्ताव है। अब इसी मामले में तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल की। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया है।
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फ्रीबीज से देश का आर्थिक विकास रुकता है
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की और कहा, 'देश के अधिकांश प्रदेश राजस्व घाटे वाले हैं। बावजूद इसके वह विकास को नजरअंदाज करके मुफ्त की रेवड़ी बांट रहे हैं। अदालत का कहना है कि फ्रीबीज से देश का आर्थिक विकास रुकता है। राज्यों को सभी को मुफ्त खाना, साइकिल और बिजली देने की जगह रोजगार के विकास पर काम करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया है। तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने अपनी याचिका में इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट रूल्स- 2024 के एक नियम को चुनौती भी दी है।
क्या यह खुश करने पॉलिसी नहीं है?
अदालत ने कहा कि अगर राज्य गरीबों का हाथ थामते हैं तो यह समझ में आता है। हम भारत में किस तरह का कल्चर बना रहे हैं? यह समझा जा सकता है कि वेलफेयर उपाय के तहत आप उन लोगों को बिजली देना चाहते हैं, जो बिजली का चार्ज नहीं दे सकते। लेकिन जो लोग खर्च कर सकते हैं और जो नहीं कर सकते, उनके बीच फर्क किए बिना आप बांटना शुरू कर देते हैं। क्या यह खुश करने की पॉलिसी नहीं होगी?
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सब फ्री में देंगे तो कौन काम करेगा: मुख्य न्यायाधीश
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राज्यों को रोजगार के रास्ते खोलने पर काम करना चाहिए। अगर आप सुबह से शाम तक फ्री खाना, फ्री साइकिल और फ्री बिजली देना शुरू करते हैं तो कौन काम करेगा और फिर वर्क कल्चर का क्या होगा। पीठ ने कहा कि राज्य डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स पर खर्च करने की जगह सैलरी देने और ऐसी उदारता बांटने का काम करते हैं।