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क्यों होते हैं हेलीकॉप्टर हादसे? समझिए 2 पंखे, इंजन और क्रैश का खेल

उत्तराखंड में शायद ही कोई ऐसा साल गुजरा हो, जब विमान हादसे न हुए हैं। आखिर हादसे हो क्यों रहे हैं, हादसों का विज्ञान क्या कह रहा है, पढ़ें हर सवाल का जवाब।

ट्रांस भारत हेलीकॉप्टर

ट्रांस भारत का हेलीकॉप्टर जोशीमठ के पास क्रैश हुआ था। यह हादसा 30 अक्टूबर को हुआ है। Photo Credit: PTI

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उत्तराखंड के चमोली जिले में शुक्रवार को 'ट्रांस भारत एविएशन' का हेलीकॉप्टर बद्रीनाथ से देहरादून लौटते समय हादसे का शिकार हो गया। हादसे में पायलट और 5 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई। हेलीकॉप्टर ने देहरादून से दोपहर करीब 12 बजकर 20 मिनट पर उड़ान भरी और करीब 1 बजकर 11 मिनट पर बद्रीनाथ पहुंचा। यहां 5 यात्री बैठे और वापसी के लिए हेलीकॉप्टर ने उड़ान भरा। विमान इसी दौरान अनियंत्रित हुआ और गिर पड़ा। 

हादसे की शुरुआती वजह अधिकारियों ने खराब मौसम को बताया है। एयर एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) और डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) के अधिकारी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि हादसा खराब मौसम की वजह से हुआ है या खराब इंजन की वजह या पायलट की वजह से कोई चूक हुई है।

चमोली जिला प्रशासन की शुरुआती रिपोर्ट बताती है कि हेलीकॉप्टर हाथी पर्वत इलाके में खराब मौसम में फंसा और नीचे उतरते समय गिरा। मौसम विभाग ने 30 अक्टूबर को चमोली के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया था। मौसम विभाग ने साफ कहा है कि अलग-अलग जगहों पर बिजली, ओलों और 40 से 50 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से हवाओं के साथ आंधी-तूफान का खतरा आ सकता है। बद्रीनाथ घाटी में सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक खराब मौसम के कारण उड़ानें रोकी गई थीं। मौसम सुधरने के बाद उन्हें फिर शुरू किया गया था।

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किस सवाल का जवाब अब तक नहीं मिला?

AAIB की टीम मलबा तलाश रही है। अभी ब्लैक बॉक्स नहीं मिला है। मलबा लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुका है। हेलीकॉप्टर का टेल एरिया बचा है।  हादसे की जगह नजदीकी सड़क से 20 से 22 किमी दूर है। पैदल जोखिम भरे रास्ते से लोग वहां पहुंच रहे हैं। DGCA ने हादसे के बाद एलान किया था कि सीजन के बाकी समय में सभी चार्टर हेलीकॉप्टर उड़ानों में को-पायलट होना अनिवार्य होगा। अब चार्टर उड़ानों में सिंगल पायलट की इजाजत नहीं दी जाएगी। चार धाम रूट के 11 ऑपरेटरों ने इस नियम पर आपत्ति जताकर 2 नवंबर से सेवाएं रोकने की बात कही है।

Abhishek Rai, Aeronautical Engineer

उत्तराखंड हादसे के बाद एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर हेलिकाप्टर क्रैश क्यों होते हैं?

इंटरनेशनल हेलिकॉप्टर सेफ्टी फाउंडेशन (IHSF) और फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) ने हेलीकॉप्टर हादसों पर कई स्टडी की हैं। अलग-अलग स्टडी में एक सामान्य सी बात सामने आई कि तीन वजहों से हादसे होते हैं। पहला इंजन खराब हो, दूसरा मौसम खराब हो और तीसरा पायलट सही वक्त पर सही फैसला लेने से चूक जाए। कैसे, समझिए-

क्यों होते हैं हेलीकॉप्टर हादसे?

एयरोनॉटिकल इंजीनियर अभिषेक राय ने इन्हीं संस्थाओं की स्टडी का जिक्र करते हुए कहा, 'हेलीकॉप्टर हादसों की एक बड़ी वजह मानवीय गलतियां और खराब मौसम हैं। जब अचानक घना कोहरा या बादल आ जाते हैं तो पायलट को दिशा और ऊंचाई का सही अंदाजा नहीं लग पाता। ऐसी स्थिति में आगे कुछ न दिखने की वजह से उड़ता हुआ हेलीकॉप्टर अक्सर पहाड़ों, पेड़ों या बिजली के तारों से टकरा जाता है। कई बार पायलट से उड़ान के दौरान नियंत्रण खोने जैसी चूक भी सीधे बड़े हादसे में बदल जाती है।'

उन्होंने कहा, 'तकनीकी खराबी और हेलीकॉप्टर की जटिल बनावट भी हादसे की एक वजह है। हेलीकॉप्टर में रोटर, टेल रोटर या गियरबॉक्स सबसे संवेदनशील हिस्से हैं। इनमें से किसी एक में भी खराबी आने पर उसे तुरंत संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। सिंगल इंजन वाले विमान सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं। कभी-कभी हेलीकॉप्टर अपने ही पंखों से बनी हवा के भंवर में फंसकर तेजी से नीचे गिरने लगता है। हेलीकॉप्टर जमीन के काफी करीब उड़ते हैं, इसलिए किसी भी तकनीकी खराबी या झटके को संभालने के लिए पायलट के पास वक्त बहुत कम होता है। कुछ संभल पाए, उससे पहले विमान हादसे का शिकार हो जाते हैं।'

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कब पायलट की गलती से होते हैं हादसे?

एयरोनॉटिकल इंजीनियर अभिषेक राय ने कहा, 'फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक 5 से 10 प्रतिशत हादसे स्थानिक भटकाव से होते हैं। इनमें से 90 प्रतिशत जानलेवा होते हैं। इंसान का शरीर जमीन पर संतुलन बनाए रखने के लिए बना है। हवा में आंखों, कान के अंदरूनी हिस्से और मांसपेशियों-जोड़ों के सेंसर से आने वाले संकेत कई बार आपस में मेल नहीं खाते। इससे दिमाग को गलत संकेत मिलते हैं और पायलट को भ्रम हो जाता है।'

कई बार धीमे और लंबे मोड़ के बाद अचानक सीधे होने पर लगता है कि विमान उलटी तरफ झुक रहा है। लंबे मोड़ या स्पिन के बाद दिमाग को लगता है कि घूमना बंद हो गया है। सीधा करने पर उलटी दिशा में घूमने का एहसास होता है। पायलट शरीर की संवेदना पर भरोसा करके गलत सुधार करता है और विमान जमीन से टकरा सकता है। कई बार ज्यादा भटकाव होने की वजह से विमान हादसे का रूट तय नहीं हो पाता है और हादसे हो जाते हैं। अचानक रफ्तार बढ़ने या घटने पर ऊपर या नीचे होने का झूठा एहसास होता है। अंधेरे आसमान में रात की टेकऑफ के दौरान भी ऐसा हो सकता है। गलत प्रतिक्रिया से क्रैश या स्टॉल हो सकता है।

कौन से हेलीकॉप्टर ज्यादा जोखिम वाले होते हैं?

एयरोनॉटिकल इंजीनियर अभिषेक राय ने साल 2021 में साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसा देखा गया है कि सिंगल इंजन वाले हेलीकॉप्टर सबसे ज्यादा जोखिम वाले होते हैं। एक इंजन फेल होने के बाद संभलने का कोई मौका नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि मल्टी इंजन वाले हेलीकॉप्टर भी फेल होता है लेकिन ज्यादा संभावना होती है कि हादसा टल जाए। 

हादसे की वैज्ञानिक वजह क्या है? 

अभिषेक राय ने कहा, 'सबसे ज्यादा हादसे कम दूरी के उड़ानों के दौरान होते हैं। समुद्री उड़ानों से 10 गुना ज्यादा हादसे जमीनी उड़ानों में होते हैं। छोटे कॉमर्शियल हेलीकॉप्टर में सिर्फ एक ही पायलट होता है। वह कंप्यूटर या ऑटोपायलट के बजाय खुद देखकर उड़ान भरते हैं, जिससे गलती की गुंजाइश बढ़ जाती है। सिंगल इंजन और कम ब्लेड वाले मॉडल ज्यादा संवेदनशील होते हैं। एक पिस्टन इंजन और कम रोटर ब्लेड वाले हल्के हेलीकॉप्टरों में अचानक आई तकनीकी खराबी या हवा के झोंके को संभालना कठिन होता है। ये हेलीकॉप्टर ज्यादा संवेदनशील होते हैं।'

सिंगल-इंजन, सिंगल-पिस्टन या रेसिप्रोकेटिंग इंजन वाले हेलीकॉप्टर सबसे अधिक जोखिम भरे और खतरनाक माने जाते हैं। ट्विन-इंजन इसलिए सुरक्षित माने जाते हैं क्योंकि हेलीकॉप्टरों में एक इंजन फेल होने पर दूसरा बैकअप के रूप में काम करता है। सिंगल-इंजन हेलीकॉप्टरों में इंजन या पंखे में हल्की खराबी आने से, थ्रस्ट कम होने से पायलट के पास संभलने का वक्त ही नहीं मिल पाता है। भारी वजन, प्रतिकूल मौसम या ज्यादा ऊंचाई जैसी जटिल परिस्थितियों में इन हल्के इंजनों में पावर रिजर्व की गुंजाइश ही नहीं बच पाती है। नियंत्रण खोने की वजह से विमान हादसाग्रस्त हो जाते हैं।

Abhishek Rai, Aeronautical Engineer

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ऊपर और पीछे के पंखों का काम क्या है?

हेलीकॉप्टर में अटैच सबसे बड़े पंखे को मेन रोटर कहते हैं। पीछे वाले पंखे टेल रोटर कहे जाते हैं। दोनों तरह पखों का काम अलग-अलग होता है। दोनों अलग-अलग काम करके एक दूसरे से जुड़े हैं। एक पंखा हेलीकॉप्टर को जमीन से ऊपर उठाता है और हवा में रोकता है, थ्रस्ट तैयार करता है। इनमें लगे ब्लेड्स हेलीकॉप्टर को मुड़ने, दिशा बदलने में मदद करते हैं। 

इंजीनियर अभिषेक राय ने बताया कि जब ऊपर का बड़ा पंखा तेजी से एक तरफ घूमता है तो हेलीकॉप्टर की पूरी बॉडी अपने आप उल्टी दिशा में गोल-गोल घूमने लगता है। पीछे लगे छोटा पंखे एक तरफ से हवा का धक्का मारकर बॉडी को सीधा रखता है। हेलीकॉप्टर एक ही जगह घूमने की तुलना में आगे-पीछे इसी वजह से घूमते हैं। पायलट अपने पैरों से पैडल दबाकर इस छोटे पंखे की ताकत को कम या ज्यादा करता है। इससे हेलीकॉप्टर हवा में एक ही जगह खड़े-खड़े आसानी से दाएं या बाएं मुड़ पाता है।

भारत में कितने हेलीकॉप्टर हैं?

इंडियन ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (IBEF) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 90 हेलीकॉप्टर ऑपरेटर हैं, जिनमें नॉन-शेड्यूल्ड ऑपरेटर, निजी कंपनियां, राज्य सरकारें और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। इनके पास कुल 280 टरबाइन हेलीकॉप्टर हैं। यह अमेरिका में संचालित 14,000 हेलीकॉप्टरों की तुलना में बहुत ही कम संख्या है। पिस्टन इंजन वाले हेलीकॉप्टर की तुलना में इन्हें ज्यादा बेहतर और सुरक्षित माना जाता है। भारत में 1 हजार से ज्यादा हेलीकॉप्टर हैं लेकिन ज्यादतर कॉमर्शियल हेलीकॉप्टर सिंगल इंजन हैं।


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