पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी ‘डिटेक्ट (पहचानो), डिलीट (हटाओ) और डिपोर्ट (निर्वासित करो)’ नीति के तहत अब तक 11 निरुद्ध केंद्र तैयार किए हैं जिनमें 335 अवैध प्रवासियों को रखा गया है। इस बीच शुक्रवार को नॉर्थ 24 परगना जिले में बांग्लादेश बॉर्डर के पास हकीमपुर चेकपोस्ट पर अवैध बांग्लादेशी अप्रवासियों का एक बड़ा ग्रुप इकट्ठा हुआ है।
बांग्लादेश की सीमा से सटे उत्तर 24 परगना के बशीरहाट में सबसे ज्यादा अवैध प्रवासी मौजूद हैं। इनके बांग्लादेशी या रोहिंग्या होने का संदेह है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने के मुताबिक, ' राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अब तक 11 निरुद्ध केंद्र तैयार किए गए हैं। इनमें से कुछ पुलिस जिलों के तहत संचालित हो रहे हैं, जबकि कुछ जिला स्तर पर संचालित हो रहे हैं।'
बांग्लादेशी अप्रवासियों ने सुनाई कहानी
यहां मौजूद एक एक बांग्लादेशी अप्रवासी ने कहा, 'मैं एक साल पहले यहां आया था। मैंने अपने दोस्त से पूछा कि क्या यहां काम मिलेगा, और उसने कहा हां मिलेगा। यही वजह है कि मैं बांग्लादेश से यहां आया हूं।'
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'मैं बांग्लादेश वापस जा रही हूं'
यहां एक सुमैया खातून नाम की बांग्लादेशी अप्रवासी ने कहा, 'मैं यहीं रहना चाहती हूं लेकिन कोई मुझे रहने नहीं दे रहा, इसलिए मैं वापस जा रही हूं। मेरे परिवार में मेरे माता-पिता और भाई-बहन हैं। मैं यहां अकेली हूं। मेरे पति दूसरी लड़की के साथ चले गए। अभी यहां के हालात ऐसे हैं कि मेरे पति कह रहे हैं, 'तुम बांग्लादेशी हो, वापस जाओ,' इसलिए मैं जा रही हूं। हम दो साल पहले फेसबुक पर मिले थे। हम फोन पर बात करते थे। मैं बॉर्डर पार करके आई। हमने मध्यमग्राम के एक मंदिर में शादी कर ली।'
खातून ने कहा, 'दो साल पहले एक ब्रोकर ने मुझे बॉर्डर पार कराने में मदद की, मुझसे 15,000 रुपये लिए। यह पैसे मैंने अपने माता-पिता को बताए बिना घर से लिए थे। शादी के बाद, मैंने अपने डॉक्यूमेंट्स बनवाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं बने। अब मैं वापस जा रही हूं। मेरी मां वहां मेरा इंतजार कर रही है। मैं अपने पति से फिर कभी नहीं मिलूंगी और न ही उनसे बात करूंगी। मेरी एक दो साल की बेटी भी है।'
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'लोकल मुसलमानों ने हमारी मदद की'
एक दूसरे बांग्लादेशी अप्रवासी अब्दुल ने कहा, 'हमारे पास यहां कोई दस्तावेज नहीं हैं। मैं यहां 2017 में आया था। अब 2026 है और 9 साल हो गए हैं। अभी सरकार की पॉलिसी है कि बिना दस्तावेज वाला कोई भी यहां नहीं रह सकता, वरना उसे जेल और फाइन का सामना करना पड़ेगा। हमारे पास फाइन भरने के साधन नहीं हैं। हमारे पास कोई दस्तावेज नहीं हैं। हम यहां गेस्ट हाउस की तरह रहते थे। शुरू में, हम किराया नहीं दे पाते थे, लेकिन कुछ लोकल मुसलमानों ने हमारी मदद की।'
पूर्व सीएम ममता के समय नहीं थी दिक्कत
अप्रवासी ने आगे बताया, 'एक बार, नगर निगम चुनाव के दौरान, हमारा नाम पुकारा गया। हम लाइन में भी खड़े हुए लेकिन दस्तावेज नहीं बना। काउंसलर को हमारे बारे में नहीं पता था, लेकिन पार्टी के सदस्यों को हमारे बारे में पता था और किसी ने हमें वापस जाने के लिए नहीं कहा। आप बांग्लादेश से हैं। बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद, हमें जाने के लिए मजबूर किया गया।'
अप्रवासी ने कहा कि जब पूर्व सीएम ममता बनर्जी यहां थीं, तो कोई दिक्कत नहीं थी। हम यहां बारासात में रहते थे, रिक्शा चलाते थे और तीन-चार साल हो गए हैं। जब दीदी थीं तो बेहतर था। अब जब नई सरकार आई है, तो हम डर के मारे जा रहे हैं। मैं अकेला हूं और अपनी जान को लेकर परेशान हूं, इसलिए मैं बांग्लादेश में अपने घर जा रहा हूं। मेरे पास यहां से कोई दस्तावेज नहीं हैं। मेरे पास बांग्लादेशी दस्तावेज हैं।