सांसदों के फंड खर्च करने पर उठे सवाल, जमकर मचा बवाल, समझिए MPLADS की कहानी
लोकसभा और राज्यसभा सांसदों को हर साल 5 करोड़ का फंड मिलता है। इन दिनों इसी फंड को लेकर खूब शोर मचा हुआ है और कई तरह से सवाल उठ रहे हैं।

सांसदों के फंड पर उठे सवाल, Photo Credit: Khabargaon
सांसदों को हर साल अपने क्षेत्र में काम कराने के लिए 5 करोड़ मिलते हैं। इसे सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLAD) फंड कहा जाता है। 5 साल में कुल 25 करोड़ रुपये। कई सांसद इस राशि का अच्छे से इस्तेमाल करते हैं लेकिन कुछ सांसदों का यह फंड पड़ा रह जाता है या इस्तेमाल में गड़बड़ी होती है। ऐसी ही कई खामियां इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुईं हैं। कई सांसदों के फंड को लेकर सवाल उठे तो उन्होंने खुलकर सफाई दी। कई सांसद ऐसे भी हैं जिन्होंने इस पर चुप्पी साधे रखी। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर इस फंड का इस्तेमाल कौन, कैसे कर रहा है।
वाराणसी के सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सांसद कोटे में अभी तक 11 करोड़ 31 लाख रुपये अलॉट हुए, जिसमें से उन्होंने 2 करोड़ 82 लाख रुपये खर्च कर किए। नेता विपक्ष राहुल गांधी जो कि रायबरेली से सांसद हैं उन्हें 9 करोड़ 80 लाख रुपये अलॉट हुए और उन्होंने इसमें से करीब 48 लाख रुपये खर्च कर दिए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संसदीय क्षेत्र गांधीनगर के लिए भी 9 करोड़ 80 लाख रुपये अलॉट किए गए और उन्होंने करीब 29 लाख रुपये खर्च किए। इस तरह से 18वीं लोकसभा के सभी सांसदों के कोटे में कुल 5 हज़ार 485 करोड़ 26 लाख रुपये अलॉट किए गए, जिसमें से 1 हज़ार 407 करोड़ 62 लाख रुपये खर्च किए गए। राज्यसभा के लिए अलॉटेड लिमिट का आंकड़ा 3 हज़ार 272 करोड़ और 39 लाख का रहा जबकि टोटल एक्पेंडिचर इसका एक तिहाई यानी 1310 करोड़ 17 लाख का रहा।
ये सारे आंकड़े बीते कुछ दिनों में आपने सोशल मीडिया पर अलग-अलग सांसद के नाम से देखे होंगे, ये खबर भी सुनी होगी कि फलां सांसद के कोटे में इतने पैसे अलॉट किए गए, उन्होंने इतने काम कराए और इतने रुपये खर्च किए या अमुक सांसद सोशल मीडिया पर तो खूब एक्टिव हैं लेकिन इलाके में काम करवा नहीं रहे।
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खबर यह भी आई कि BJP IT सेल चीफ अमित मालवीय ने X पर पोस्ट कर राजस्थान कांग्रेस के 3 सांसदों पर आरोप लगाया कि उन्होंने MPLADS फंड्स को हरियाणा में खर्च किया, जो नियमों के खिलाफ है। यह MPLAD फंड चर्चा में तब भी आया जब शिवसेना (UBT) MP प्रियंका चतुर्वेदी ने इस MPLADS फंड्स की डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम पर सवाल उठाया। दावा किया कि खास मंत्रियों के फंड्स का डेटा आउटडेटेड है और 'मिसिंग' फंड्स की समस्या भी है। मैनपुरी से समाजवादी पार्टी (SP) की सांसद डिंपल यादव ने भी ऐसी ही एक शिकायत राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह से की है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
क्या है MPLADS?
MPLADS एक सरकारी योजना है। 1993 में जब देश में पी. वी. नरसिंह राव की सरकार थी तब इसकी शुरुआत हुई थी। तय हुआ था कि हर सांसद को अपने संसदीय में कुछ काम कराने के लिए पैसे दिए जाएं। सड़क, स्कूल, अस्पताल, पीने के पानी की व्यवस्था, सामुदायिक भवन आदि इत्यादि जैसे स्थानीय जरूरत वाले काम। इस स्कीम के तहत सांसदों को यह अधिकार मिले कि वे अपने लोकसभा/राज्यसभा क्षेत्र में विकास कार्यों की सिफारिश कर सकें। ध्यान दीजिएगा, यहां हमने सिफारिश शब्द का इस्तेमाल किया बजाए काम कराने के, ऐसा क्यों? वह आगे समझ आएगा, जब आपको बताएंगे कि इस फंड के पैसों का इस्तेमाल होता कैसे है।
कितने पैसे मिलते हैं सांसद को?
1993 में जब इस स्कीम की शुरुआत हुई थी तब तय हुआ कि हर एक सांसद को 5 लाख रुपये हर साल दिए जाएंगे। मतलब एक पूरे टर्म में कुल 25 लाख रुपये लेकिन अगले ही साल इसमें बदलाव किए गये और तय हुआ कि अब 5 लाख हर साल के बजाय एक करोड़ रुपये हर साल के दिए जाएंगे। मतलब एक पूरे टर्म का 5 करोड़। इसके बाद 1988 में फिर यह राशि एक करोड़ से दो करोड़ हुई और 2011-12 से दो करोड़ सालाना की यह राशि 5 करोड़ कर दी गई। माने हर सांसद को हर साल 5 करोड़ रुपये का फंड अलॉट किया जाएगा, इस तरह से एक पूरे टर्म में उनके पास 25 करोड़ रुपये हो जाएंगे काम कराने के लिए लेकिन ऐसा भी नहीं कि सांसद जी कोई भी काम कराएं और इस कोटे से पैसे खर्च कर देंगे। इसके लिए भी नियम बनाए गए हैं।
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किस काम में खर्च हो सकता है पैसा?
MPLADS का पैसा सांसद कहां खर्च कर सकते हैं इसके बारे में सरकारी शब्दों में लिखा है कि MPLADS का हर पैसा स्थायी, सार्वजनिक और गैर-राजनीतिक काम पर ही खर्च होगा, जिसका फायदा आम जनता को मिले। आसान शब्दों में कहे तो सांसद MPLADS का पैसा
• स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल, लाइब्रेरी,
• अस्पताल, एंबुलेंस, स्वास्थ्य केंद्र,
• पेयजल की सुविधा (हैंडपंप, पानी की टंकी),
• सड़कें, पुल, रेलवे हॉल्ट, फुटपाथ,
• बिजली, स्ट्रीट लाइट, सार्वजनिक शौचालय,
• खेल के मैदान, जिम, पार्क,
जैसे कामों के लिए खर्च किया जा सकता है। शर्त बस इतनी है कि जगह सरकारी या पंचायत की होनी चाहिए। एक शर्त और है जिसे मानना कानूनी तौर से अनिवार्य है। नियम कहता है कि कोई भी काम हो उसमें सांसदों को हर साल अपनी राशि का कम से कम 15% अनुसूचित जाति (SC) और 7।5% अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी वाले क्षेत्रों के लिए खर्च करना अनिवार्य है।
यह तो हुई बात की किन कामों में ये पैसा खर्च हो सकता है लेकिन क्या करना है के साथ ही, क्या नहीं करना है यह भी बताया गया। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन की गाइडलाइन के मुताबिक सांसद अपनी निधि का उपयोग इन (निम्नलिखित) कामों के लिए नहीं कर सकते-
• किसी भी प्रकार के कार्यालय या आवासीय भवन (सरकारी या निजी) का निर्माण।
• मरम्मत और रखरखाव के कार्य (कुछ विशेष छूट को छोड़कर)।
• जमीन खरीदने या मुआवजे के भुगतान के लिए।
• धार्मिक स्थलों (पूजा के स्थानों) के निर्माण या मरम्मत के लिए।
• व्यावसायिक या निजी संगठनों से जुड़े कार्यों के लिए।
• सरकारी कर्मचारियों के लिए फर्नीचर या उपकरण खरीदने के लिए।
• किसी जीवित या मृत व्यक्ति के नाम पर संपत्ति का नामकरण करने के लिए।
इन कामों का सासंद कोटा से कराना पूरी तरह से वर्जित है। माने इसमें सांसद जी एक रुपया भी कोटे से इस्तेमाल नहीं कर सकते। कहां कर सकते हैं इसे लेकर भी नियम हैं। गाइडलाइन के मुताबिक -
लोकसभा सांसद: केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र (Constituency) में।
राज्यसभा सांसद: जिस राज्य से वे चुने गए हैं, उस पूरे राज्य में कहीं भी।
मनोनीत (Nominated) सांसद: पूरे देश में कहीं भी। इस कोटे की राशि का इस्तेमाल कर सकते हैं।
यहां एक अपवाद भी है जिसे लेकर हाल फिलहाल में राजस्थान और हरियाणा के बीच विवाद देखा गया। जैसा कि हमने शुरुआत में बताया था कि बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट कर इस बात पर आपत्ति जताई थी कि राजस्थान में कांग्रेस के तीन सांसदों ने अपनी MPLADS की राशि दूसरे राज्य में खर्च की। इसके जवाब के तौर पर भजनलाल सरकार के मंत्री के के विश्नोई सफाई दी और बताया था, 'हम पूरे देश को एक यूनिट मानकर चल रहे हैं। जब हम विकसित भारत की बात कर रहे हैं, तो ऐसे में अगर कोई सांसद अपनी निधि देश के किसी दूसरे हिस्से में खर्च करता है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।'
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कुछ हद तक केके विश्नोई ने सही भी कहा। गाइडलाइन के मुताबिक MPLADS की राशि के इस्तेमाल को लेकर अपवाद यह है कि सांसद अपने क्षेत्र के बाहर भी साल में अधिकतम 25 लाख रुपये तक के काम की सिफारिश कर सकते हैं, बशर्ते उसका मकसद राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना हो। इसके अलावा अगर देश में कहीं गंभीर प्राकृतिक आपदा (जैसे बाढ़, भूकंप) आती है तो सांसद वहां 1 करोड़ रुपये तक और अपने राज्य की आपदा के लिए 25 लाख रुपये तक दे सकते हैं।
हालांकि, केके विश्नोई ने यह तो नहीं बताया कि उनके सांसदों ने कितनी राशि दूसरे इलाके में दी और किस मकसद से। खैर इसी बात से अपना अगला सवाल भी आता है। सवाल कि सांसद अपने कोटे के पैसों का इस्तेमाल कब और कितना कर सकते हैं। क्या हर एक सासंद को एक जैसा ही फंड अलॉट होता है, जवाब है नहीं।
कितना पैसा इस्तेमाल हो सकता है?
साल 2023 में आई मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन की गाइडलाइन के मुताबिक, सांसदों के कोटे में दिए जाने वाले पैसे को ट्रांसफर करने का तरीका बदल दिया गया है। पहले सरकार जिले को सीधे पैसा भेज देती थी, कभी एडवांस में, तो कभी किश्तों में। तब पैसा खाते में दिखता था लेकिन अब सीधे पैसा नहीं भेजा जाता। नए सिस्टम में पैसा पहले से जिलों में जमा नहीं होता। पैसा केंद्र सरकार के 'केंद्रीय नोडल खाते' में रहता है और जैसे-जैसे काम होता है, पैसा सीधे वेंडर (काम करने वाले) के खाते में भेजा जाता है। साथ ही ज़िले की एक निकासी लिमिट तय कर दी जाती है यानी खर्च करने की लिमिट तय कर देती है। पैसे खाते में नहीं दिखेंगे लेकिन सरकार आश्वस्त करती है कि इतनी रकम तक खर्च की जा सकती है। यह लिमिट कैसे तय होती है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि सांसद उस साल कितने महीने तक अपने पद पर रहे हैं। यह कैल्कुलेशन वित्तीय वर्ष के आधार पर होता है, यानी 1 अप्रैल से 31 मार्च तक। अगर इस एक साल के बीच सांसद 9 महीने से ज्यादा समय तक पद पर रहते हैं तो उन्हें 100% यानी पूरे 5 करोड़ की अनुमति मिलती है। वहीं अगर सांसद का कार्यकाल पूरे साल में 3 महीने से लेकर 9 महीने तक का ही है तो उन्हें वार्षिक आवंटन का 50% (यानी 2.5 करोड़) मिलता है और अगर यह कार्यकाल 3 महीने से कम है तो उस साल के लिए उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता।
यहां एक सवाल ये भी मन में आएगा कि अगर सांसद महोदय ने एक साल में या एक पूरे टर्म में पैसा खर्च ही नहीं किया तो क्या यह पैसा सरकार वापिस ले लेगी? क्या यह पैसा लैप्स कर जाएगा? इस सवाल का जवाब है- नहीं। MPLADs का पैसा 'नॉन-लैप्सेबल' (Non-lapsable) होता है। इसका मतलब है कि अगर एक साल में 5 करोड़ रुपये खर्च नहीं हुए, तो वह पैसा वापस नहीं जाता, बल्कि अगले साल के खाते में जुड़ जाता है और उसे बाद में इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां तक कि अगर सांसद का कार्यकाल खत्म हो जाता है, तो बची हुई राशि उनके उत्तराधिकारी (नए सांसद) के खाते में ट्रांसफर हो जाती है ताकि अधूरी परियोजनाओं को पूरा किया जा सके। ध्यान रहे, फंड सांसदी को जाता है, न कि सांसद को। मतलब यह पैसा नरेंद्र मोदी नहीं, सांसद नरेंद्र मोदी के कहने पर खर्च होगा। अगर पैसा बच गया और आने वाले समय में अगर वाराणसी में कोई और सांसद आते हैं तो वह इसे खर्च करेंगे।
अब अगर आते हैं अपने उस सवाल पर जिसका जिक्र हमने शुरुआत में किया था। MPLADS के बारे में आपको बताया था कि हर सांसद हर साल 5 करोड़ रुपये तक का काम कराने की सिफारिश कर सकता है। यहां इस सिफारिश शब्द के मायने क्या हैं? इसका जवाब भी एक सवाल है। सवाल क्या पैसा सांसद के खाते में जाता है? जवाब है - बिल्कुल नहीं। सांसद निधि का एक भी पैसा कभी भी सांसद के निजी या आधिकारिक बैंक खाते में नहीं जाता है। सांसद के हाथ में नकदी या फंड का कोई चेक नहीं आता। इस फंड से सांसद का सरोकार बस सिफारिश (Recommendation) का है। वे जिला प्रशासन को लिखित में देते हैं कि 'मेरे क्षेत्र में अमुक जगह पर यह काम (जैसे स्कूल का कमरा या सड़क) होना चाहिए।' इसके बाद उस पैसे पर उनका सीधा नियंत्रण नहीं रहता। ध्यान दीजिएगा सरकारी दस्तावेजों में लिखा गया कि सीधा नियंत्रण नहीं होता है। जिला प्रशासन (डीएम/कलेक्टर) के पास केवल एक 'सहायक खाता' (Subsidiary Account) खुलता है। इस खाते में नकद पैसा नहीं भेजा जाता, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा Drawing Limit तय की जाती है। असल में सांसद के लिए अलॉटेड MPLADS का पूरा पैसा दिल्ली में केंद्र सरकार के स्तर पर एक सेंट्रल नोडल अकाउंट में रहता है। जब कोई ठेकेदार या वेंडर काम पूरा करता है, तो ईस नोडल अकाउंट से काम का पेमेंट सीधे वेंडर के बैंक खाते में हो जाता है। ॉ
इसे पूरे प्रोसेस को समझें तो सबसे पहले-
1. सांसद काम की सिफारिश करते हैं।
2. जिला प्रशासन (DM) उस काम को मंजूरी देता है और टेंडर निकालता है।
3. वेंडर/ठेकेदार काम करता है।
4. काम पूरा होने पर जिला प्रशासन बिल पास करता है।
5. भुगतान के समय पैसा 'केंद्रीय नोडल खाते' से इलेक्ट्रॉनिक रूप से कटकर सीधे वेंडर के खाते में ट्रांसफर हो जाता है।
आसान शब्दों में कहे तो पैसा सरकार की तिजोरी (केंद्रीय खाता) से निकलता है और काम करने वाले वेड़र माने मजदूर/ठेकेदार की जेब में जाता है। बीच में न तो सांसद और न ही जिला प्रशासन उस पैसे को अपने पास 'होल्ड' कर सकते हैं। यह नई व्यवस्था पारदर्शिता लाने और फंड के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए बनाई गई।
इस तरह से MPLADS का पैसा इस्तेमाल होता है और इसके बाद जो भी काम हुए हैं उनकी जियो टैगिंग के साथ फोटो और काम का पूरा ब्यौरा पोर्टल पर रियल टाइम में अपलोड़ किया जाता है। यह सब कुछ पब्लिक डोमेन में होता है जिसे कोई भी देख सकता है। एक साल के पूरे काम का हर साल एक ऑडिट भी होता है। जिला प्राधिकरण इसे CA या फिर स्थानीय निधि परीक्षकों के माध्यम से कराता है। ऐसा नहीं कि कोई भी यह ऑडिट कर सकता है। इसके लिए भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) या राज्य के महालेखाकार (AG) द्वारा अनुमोदित पैनल से ऑडिटर चुने जाते हैं। ऑडिट में यह देखा जाता है कि पैसा सही जगह खर्च हुआ है या नहीं, खाते सही हैं या नहीं और नियमों का पालन हुआ है या नहीं। इसी पोर्टल पर आप भी जाकर अपने इलाके के सांसद को अलॉट हुए पैसे, उनके किए हुए काम और पेंडिंग कामों की पूरी लिस्ट भी देख सकते हैं। देश के सभी सांसदों की MPLADS प्रोफाइल दिखाना तो संभव नहीं है इसलिए हम देश के कुछ चर्चित सांसदों की MPLADS फंड का हिसाब-किताब बताते हैं।
किसके पास कितना पैसा, कितना हुआ काम?
सबसे पहले शुरुआत करते हैं वाराणसी के सांसद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से। पीएम मोदी बीते 11 साल से वाराणसी लोकसभा सीट से सांसद हैं। उनकी MPLADS प्रोफाइल बताती है कि उन्हें 18वीं लोकसभा के लिए अब तक 11 करोड़ 31 लाख रुपये अलॉट हुए हैं, जिनमें से 2 करोड़ 88 लाख रुपये खर्च किए गए। उन्होंने कुल 219 कामों की सिफारिश की जिसमें से 43 काम पूरे हो चुके हैं।
अगली प्रोफाइल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की है। यूपी के रायबरेली सीट से सांसद राहुल गांधी के कोटे में 9 करोड़ 80 लाख रुपये अलॉट हुए और उन्होंने अब तक 47 लाख 97 हजार 249 रुपये खर्च किए हैं। 148 कामों के लिए सिफारिश दी जिसमें से केवल 3 काम पूरे हुए हैं।
बात करें बिहार के सारण से बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूडी की तो उन्हें 9 करोड़ 80 लाख रुपय अलॉट हुए लेकिन पोर्टल के मुताबिक इन्होंने ना तो एक भी रुपया खर्च किया और ना ही एक भी काम के लिए सिफारिश दी। हिमाचल प्रदेश के मंडी से बीजेपी सांसद कंगना रनौत के MPLADS पोर्टफोलियो में भी एलोकेटेड लिमिट 9 करोड़ 80 लाख की है जिसमें से खर्च 1 करोड़ 68 लाख रुपये हुए। इन्होंने 236 कामों की सिफारिश की जिनमें से 6 काम पूरे हुए। यूपी के गोरखपुर से बीजेपी सांसद रवि किशन के खाते में भी एलोकेटेड लीमिट 9 करोड़ 80 लाख की है जिसमें से खर्च 61 लाख 57 हजार 193 रुपये हुए। इन्होंने अब तक 9 कामों की सिफारिश की जिनमें से एक भी काम पूरा नहीं हुआ।
डिंपल, अखिलेश और ओवैसी ने कितना खर्च किया?
कन्नौज से सांसद और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के MPLADS पोर्टफोलियो में भी एलोकेटेड लिमिट 9 करोड़ 80 लाख की है जिसमें से खर्च 93 लाख 11 हजार 353 रुपये हुए। इन्होंने अपने क्षेत्र में 196 कामों की सिफारिश दी जिसमें से 5 काम पूरे हुए। हैदराबाद से AIMIM के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के कोटे में 18वीं लोकसभा के लिए एलोकेटेड लिमीट 9 करोड़ 80 की ही है जिसमें से खर्च 57 लाख 66 हजार 185 रुपये हुए हैं। इन्होंने 8 कामों की सिफारिश की थी जिसमें से एक भी काम पूरा नहीं हुआ। वहीं लोगों के बीच पैसा बांटने को लेकर बिहार के बहुचर्चित सांसद पप्पू यादव के MPLADS पोर्टफोलियो में भी 9 करोड़ 80 की लिमिट है जिसमें से 4 करोड़ 78 लाख रुपये खर्च किए गए हैं, वैसे तो इन्होंने 101 कामों की सिफारिश की थी लेकिन पूरा सिर्फ एक ही काम दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव के पोर्टफोलियो में एलोकेडेट लिमिट 11 करोड़ 85 लाख की है जबकि खर्च 2 करोड़ 20 लाख रुपये हुए। पोर्टल के मुताबिक इन्होंने 135 कामों की सिफारिश की लेकिन एक भी काम पूरा नहीं हुआ।
सोशल मीडिया पर जब ये आंकड़े सामने आए तो डिंपल यादव ने सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को चिट्ठी लिख MPLADS पोर्ट्ल पर दिखाए गए आंकड़ों में गलती बताई और इसे सुधारने की मांग भी की। ऐसी ही मांग राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी की है। प्रियंका चतुर्वेदी के MPLADS पोर्टल पर 19 करोड़ 61 लाख की एलोकेटेड लिमिट है तो वहीं खर्च की राशि- 54 लाख 17 हजार 782 बताई गई। पोर्टल के मुताबिक प्रियंका ने 74 कामों की सिफारिश की है जिसमें से केवल 3 काम ही अब तक पूरे हुए हैं। एक पोस्ट पर रिएक्ट करते हुए प्रियंका ने कहा, 'मेरी एक्स टाइमलाइन और मुंबई समेत महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में हुए मेरे काम फंड के सही इस्तेमाल का सबूत हैं।'
उन्होंने बताया कि उन्होंने इस पैसे से टॉयलेट ब्लॉक्स, वार्डों का सौंदर्यीकरण, पब्लिक पार्क, शेड, वेलफेयर सेंटर और स्कूल जैसे कई काम करवाए हैं। उन्होंने आरोप लगाने वालों को चुनौती देते हुए कहा कि अगर किसी को शक है, तो वह उनकी टीम को उन जगहों पर ले जाने के लिए तैयार हैं जहां काम हुए हैं।' प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि वेबसाइट पर डेटा पुराना है और इसी वजह से लोग उन्हें ट्रोल कर रहे हैं।
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