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विभाजनकारी 'डिक्सन प्लान' आखिर था क्या जिसके चक्कर में जेल गए थे शेख अब्दुल्ला?

बीजेपी के नेताओं ने जम्मू को अलग राज्य बनाने की मांग की है, इस बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने डिक्सन प्लान का मुद्दा उठा दिया है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर। Photo Credit- Sora-AI

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केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू और कश्मीर को 31 अक्टूबर, 2019 को आधिकारिक तौर पर एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था। J&K को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के साथ ही केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A को भी निरस्त कर दिया था। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया था। अब छह साल बाद भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं ने जम्मू को अलग राज्य बनाने की मांग की है, जिससे राज्य में एक बार फिर से बंटवारे की मांग होने लगी है। बीजेपी नेताओं की इस मांग के जम्मू-कश्मीर का सियासी पारा चढ़ गया है।

 

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला भड़क गए हैं। मंगलवार को मीडिया से बातचीत में उन्होंने ऐसी मांग को मूर्खतापूर्ण और अज्ञानतापूर्ण बताया है। इसके अलावा पीडीपी की प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने बीजेपी की मांग से मिलती-जुलती डिमांड करते हुए पीर पंजाल और चिनाब घाटियों के लिए संभागीय दर्जा देने और ज्यादा जिले बनाने की मांग की है। इस बीच फारूक अब्दुल्ला ने दोहराया कि यह 'डिक्सन प्लान' का हिस्सा है। अशांति फैलाने वालों का समर्थन करने के आरोपों पर फारूक अब्दुल्ला ने कहा है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कभी भी ऐसे विचारों का समर्थन नहीं किया। फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि हमने भारत के साथ रहने के लिए गोलियां खाई हैं और जरूरत पड़ने पर फिर से गोली खाने को तैयार हैं।

 

ऐसे में आइए समझते हैं कि आखिर यह डिक्सन प्लान है क्या...

 

एक तरफ बीजेपी ने जम्मू को अलग करके नया राज्य बनाने की हवा दे दी है। महबूबा मुफ्ती ने राज्य को तो नहीं, मगर नए संभाग बनाने की मांग की है। मगर, इन बातों के बीच में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की एकता और अखंडता के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। प्रदेश का विभाजन अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि बीजेपी के कुछ नेताओं का जम्मू को एक अलग राज्य बनाने की मांग अनुचित है और इससे आने वाले समय में जम्मू-जम्मू के लोगों का अहित हेगा।

 

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आखिर डिक्सन प्लान है क्या?

डिक्सन प्लान (Dixon Plan) जम्मू-कश्मीर विवाद से जुड़ा एक पुराना प्रस्ताव है। इस प्रस्ताव को 1950 में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि सर ओवेन डिक्सन ने दिया था। सर ओवेन डिक्सन ऑस्ट्रेलिया के हाई कोर्ट के जज और पूर्व चीफ जस्टिस थे। उन्हें 1950 में UN सुरक्षा परिषद ने भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे को सुलझाने और मध्यस्था करने के लिए नियुक्त किया गया था। सर डिक्सन ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक प्रस्ताव दिया था।

डिक्सन प्लान में मुख्य प्रस्ताव क्या थे?

दरअसल, सर ओवेन डिक्सन ने जम्मू-कश्मीर को विभाजित करने और आंशिक जनमत संग्रह करवाने का सुझाव दिया था। उनके प्रस्ताव के मुताबिक, लद्दाख को भारत को दिया गया। इसी प्रस्ताव में उन्होंने कहा था कि उत्तरी क्षेत्र और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) पाकिस्तान को दिया जाए।

 

इसके अलावा प्रस्ताव में कहा गया था कि जम्मू का कुछ हिस्से को विभाजित कर दिया जाए, जिसके मुताबिक जम्मू का कुछ हिस्सा भारत को और कुछ पाकिस्तान को दिया जाए।

 

कश्मीर घाटी में जनमत संग्रह कराया जाए, ताकि लोग यह तय कर सकें कि उन्हें भारत के साथ या फिर पाकिस्तान के साथ जाना है। डिक्सन प्लान मूल रूप से बंटवारा के साथ में जनमत संग्रह करवाने का मिश्रण था। हालांकि, इस प्लान में कुछ ऐसे प्रस्ताव थे, जिसे भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नहीं माना था।

भारत ने 'डिक्सन' को क्यों नहीं माना?

भारत के उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सर ओवेन डिक्सन के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। प्रधानमंत्री नेहरू और भारत का मानना था कि समूचे जम्मू-कश्मीर पर भारत का अधिकार है। भारत जम्मू-कश्मीर पर किसी भी तरह का विभाजन नहीं चाहता था, क्योंकि उसे अपना अभिन्न अंग मानता था। साथ ही उस समय की तत्कालीन सरकार ने पूर्ण जनमत संग्रह की शर्तों से भी सहमत नहीं थी।

 

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इसमें यह भी मांग थी कि पाकिस्तान की सेना और कबायली हमलावरों को पहले हटाया जाए, लेकिन डिक्सन प्लान में गैरफौजीकरण की शर्तें भारत को स्वीकार्य नहीं लगीं। भारत को लगता था कि इससे पाकिस्तान की आक्रामकता को वैधता मिल जाएगी। साथ ही घाटी में जनमत-संग्रह के दौरान पाकिस्तान की सेना/प्रभाव की आशंका थी।

डिक्सन का वर्तमान में जिक्र क्यों?

हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर की राजनीति में डिक्सन प्लान का नाम अक्सर सामने आ रहा है। फारूक अब्दुल्ला ने इस बार भी डिक्सन प्लान की बात की है। दरअसल, इस प्लान का जिक्र तब आता है जब पीर पंजाल और चिनाब घाटी (जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाकों) को अलग डिवीजन बनाने की मांग उठती है। फारूक अब्दुल्ला जैसे नेता इसे डिक्सन प्लान कहकर विरोध करते हैं, जबकि कुछ अन्य नेता इससे इनकार करते हैं।

 

डिक्सन प्लान राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है, लेकिन मूल प्लान 1950 का है और कभी लागू नहीं हुआ। दरअसल, डिक्सन प्लान संयुक्त राष्ट्र का कश्मीर विवाद को सुलझाने का एक असफल प्रयास था, जिसमें राज्य को बांटकर घाटी में जनमत संग्रह का प्रस्ताव था। भारत ने इसे अस्वीकार कर दिया था।

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी क्यों हुई?

एक तरफ जवाहरलाल नेहरू की केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में 'डिक्सन प्लान' के तहत जनमत संग्रह और विभाजन का विरोध कर रही थी, तो दूसरी तरफ शेख अब्दुल्ला कथित तौर पर 'कश्मीर षड्यंत्र केस' में शामिल थे। इसी केस को लेकर शेख अब्दुल्ला को 9 अगस्त 1953 को जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

 

शेख अब्दुल्ला पर आरोप लगे कि वे स्वतंत्र कश्मीर की मांग कर रहे थे और पाकिस्तान के साथ संपर्क में थे। यही नहीं आरोप यह भी हैं कि शेख अब्दुल्ला कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रच रहे थे।


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