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कॉपर पर ग्रीन टैक्स की मार, जेब पर असर क्या? फोन से लेकर घर तक का बिगड़ेगा बजट

भारतीय कंपनियों ने सरकार से मांग की है कि कॉपर से बने सामनों पर GST को 18 % से घटाकर 5 % कर दिया जाए। कॉपर हमारी लाइप का एक अहम हिस्सा है। इसकी बढ़ती मांग ने इसे और मंहगा बना दिया है जिससे हमारे पॉकेट पर इसका सीधा असर हो रहा है। आइए जानते है कैसे?

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

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भारत की बड़ी कॉपर कंपनियों ने सरकार से अपील की है कि तांबे से बने सामानों पर लगने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) को 18% से घटाकर 5% कर दिया जाए। कंपनियों का तर्क है कि ज्यादा टैक्स होने के कारण उनका करीब 49,000 करोड़ रुपये का वर्किंग कैपिटल ब्लॉक हो गया है, जिससे बिजनेस चलाने में दिक्कत आ रही है। इसके इतर आपको यह पता होना चाहिए कि हमारे रोजमर्रा के रुटिन में कॉपर एक बहुत जरूरी मेटल है। वह चाहे स्मार्टफोन हो, रसोई में इंडक्शन या मिक्सर, ऑफिस जाने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) का इस्तेमाल या सिर्फ पंखा, तो हम अनजाने में कॉपर का इस्तेमाल करते हैं।

 

इसे इंडस्ट्रियल वर्ल्ड में 'डॉक्टर कॉपर' कहा जाता है। इसकी कीमतें पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब की सेहत का हाल बता देती हैं। दुनिया तेजी से डीजल-पेट्रोल छोड़कर क्लीन एनर्जी की तरफ बढ़ रही है। कॉपर की मांग भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। अगर कॉपर की कीमतें आसमान छूने लगें तो यह सीधे आपके बजट पर हमला करता है।

 

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कॉपर का 'ग्रीन टैक्स'

दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिए लोग क्लीन टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं। यहीं कॉपर की भीषण मांग पैदा कर रहा है जो हमारा बजट बढ़ा रही है। आइए जानते हैं कैसे टेक्नोलॉजी में कॉपर की ज्यादा मांग हमारी जिंदगी के हर पहलू को महंगा बना रही है।

EV में इस्तेमाल

एक सामान्य पेट्रोल-डीजल कार को बनाने में करीब 20 से 25 किलो कॉपर लगता है। लेकिन एक EV को चलने के लिए 80 से 83 किलो तक कॉपर चाहिए होता है मतलब एक सामान्य कार से 4 गुना ज्यादा। इसका असर यह है कि अगर कॉपर महंगा होता है तो ऑटो पार्ट की लागत तुरंत बढ़ जाएगी। नतीजतन EV की कीमतें आपकी पहुंच से बाहर हो जाएंगी।

बिजली का ग्रिड

सोलर पैनल से बनी बिजली हो या विंड टरबाइन की, इन्हें आपके घर तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए विशालकाय ट्रांसफॉर्मर, हैवी केबल्स और सब-स्टेशन की जरूरत होती है। इन सभी में भारी मात्रा में कॉपर का इस्तेमाल होता है। पावर ग्रिड को अपग्रेड करने में बिजली कंपनियों का खर्च बढ़ेगा तो वे इसकी भरपाई 'फिक्स्ड चार्ज' के जरिए सीधे आपके महीने के बिजली बिल में जोड़कर करेंगी।

 

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आपकी रसोई का सामान

घर बनाने में बिजली की अंडरग्राउंड वायरिंग से लेकर प्लंबिंग के पाइप तक सब जगह तांबे का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा एसी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, मिक्सर और टीवी के भीतर कॉपर कॉइल्स लगी होती हैं। कॉपर की कीमतों में उछाल आते ही इलेक्ट्रॉनिक्स और कंस्ट्रक्शन की लागत 5% से 10% तक बढ़ सकती है। यानी नया घर बनाना या घर का पुराना एसी बदलना अचानक काफी महंगा हो जाएगा।


सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत दुनिया में रिफाइंड तांबे का दूसरा सबसे बड़ा इम्पोर्टर है। देश में तांबे की मांग 2030 तक बढ़कर 30 से 33 लाख मीट्रिक टन हो जाएगी। अनुमान है कि 2047 तक 89 से 98 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है। हमें यह समझना होगा कि कैसे कॉपर की बढ़ती मांग और उसकी प्राइस आपकी जेब पर असर डाल सकती है। इसलिए आने वाले समय में तांबे की कीमत में बढ़ोतरी से आपकी जेब पर असर हो सकता है।

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