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सोमालिया-पाकिस्तान डिफेंस डील, कैसे खतरे में भारत और इजरायल के हित?

पाकिस्तान लाल सागर में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने में जुटा है। 4 अगस्त को उसने सोमालिया के साथ एक अहम रक्षा समझौता किया। यह समझौता तुर्की और सऊदी अरब के हितों को भी साधता है। आइये समझते हैं।

Somalia Ministry of Defence

पाकिस्तान और सोमालिया के बीच रक्षा समझौता। (Photo Credit:MoD Somalia)

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पाकिस्तान मध्य पूर्व के अलावा अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत बनाने में जुटा है। लाल सागर के आसपास इस्लामाबाद का फोकस है। पिछले साल सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया। 7 अगस्त को तुर्की भी इस समझौते का हिस्सा बन गया। तीनों देशों का कहना है कि यह समझौता किसी देश के खिलाफ नहीं है, मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह किसी के खिलाफ नहीं है तो जररूत क्यों पड़ी? मक्का रक्षा समझौते के बीच ही पाकिस्तान ने सोमालिया के साथ भी एक अहम समझौता किया है। लेकिन सऊदी अरब और तुर्की के साथ हुए समझौते के शोर के बीच में इसकी चर्चा कम है। आइये समझते हैं कि सोमलिया के साथ पाकिस्तान ने कौन सा रक्षा समझौता किया। इससे भारत के कौन से हित जुड़े और तुर्की व इजरायल का एंगल क्या है?   

 

पिछले साल से चर्चा थी कि सोमालिया सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के साथ एक रक्षा समझौता करने वाला है। इस समझौते का मकसद लाल सागर क्षेत्र में सऊदी अरब और तुर्की के प्रभाव को कायम रखते हुए अपने हितों की रक्षा करना था। इन चर्चाओं को तब और बल मिला जब इजरायल ने सोमालिया से अलग हो चुके क्षेत्र सोमालीलैंड को मान्यता देने वाला पहला देश बना।

 

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सोमालिया में तुर्की की दिलचस्पी क्यों?

सऊदी अरब और तुर्की ने इजरायल के इस कदम को नए खतरे के तौर पर देखा। उसके कदम की निंदा की। उनका मानना है कि अगर इजरायल ने लाल सागर में अपनी मौजूदगी बढ़ाई तो उनके हितों को नुकसान पहुंच सकता है। अचानक सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की के नेताओं ने बैठक की। यही से नए गठबंधन की नींव पड़ी। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सोमलिया और मिस्र भी 'मक्का रक्षा समझौते' में शामिल होंगे। पाकिस्तान और सोमालिया के बीच हुआ ताजा समझौता ही आधार बनेगा।

 

सोमालिया में तुर्की की बेहद दिलचस्पी है, क्योंकि वह लाल सागर के तट पर बसा है। यहां तुर्की की सैन्य मौजूदगी है। दोनों देशों के बीच 10 वर्षों का रक्षा समझौता भी है। तुर्की का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा भी सोमालिया में है। उसके समुद्री तट की सुरक्षा भी तुर्की के हाथों में है। सोमलिया की सेना को ट्रेनिंग और आतंकवाद के खिलाफ लड़ने में तुर्की मदद कर रहा है। भारी मात्रा में तेल और गैस भी निकाल रहा है। यही कारण है कि सोमालिया आज क्षेत्रीय शक्तियों का रणक्षेत्र बन चुका है। तुर्की किसी भी हाल में यहां अपना नियंत्रण और प्रभाव कम नहीं करना चाहता है। सोमालीलैंड में इजरायल की मौजूदगी ने उसे परेशान कर दिया है। 

गठबंधनों से पाकिस्तान क्या हासिल करना चाहता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि सोमालिया और पाकिस्तान के बीच हुआ रक्षा समझौता तुर्की की देन है। अंकारा मध्य पूर्व में इजरायल को घेरने के लिए नए-नए गठबंधन बना रहा है। हर गठबंधन में पाकिस्तान को फिट करने की कोशिश की जा रही है, ताकि उसकी परमाणु छतरी का इस्तेमाल इजरायल के खिलाफ किया जा सके। पाकिस्तान हित यह है कि भारत के साथ तनाव होने पर वैश्विक मंच पर वह अलग-थलग नहीं पड़ेगा। इसके अलावा इन गठबंधनों के जरिये आर्थिक चुनौतियों से भी निपटने में मदद मिलेगी। 

लाग सागर में नियंत्रण की होड़

4 अगस्त को इस्लामाबाद में सोमालिया और पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौत हुआ। तीन दिन बाद 7 अगस्त को 'मक्का रक्षा समझौता' हुआ। लाल सागर के एक तट पर तुर्की की सेना मौजूद है। दूसरे तट यानी सऊदी अरब के साथ उसका रक्षा समझौता है। मतलब तुर्की के हित पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सुरक्षित हो चुके हैं।

लाग सागर में यमन के हूती विद्रोही बड़ी चुनौती बने हैं। इजरायल के अलावा उन्होंने सऊदी अरब के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा है। रियाद को क्षेत्र में अमेरिका के अलावा नए सैन्य साझेदारों की जरूरत थी। इस पर तुर्की और पाकिस्तान फिट बैठे।

भारत के हित कैसे हो सकते हैं प्रभावित?

भारत और इजरायल के बीच बढ़ता रक्षा और रणनीतिक सहयोग जगजाहिर है। अगले 10 वर्षों तक रिश्तों को और ऊंचाइयों पर ले जाने की कोशिश है। लेकिन खतरा यह है कि भविष्य में तुर्की या सोमालिया के साथ इजरायल का तनाव बढ़ा तो इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि साल सागर के रास्ते भारत के कुल निर्यात का करीब 15 फीसद हिस्सा गुजरता है। वहीं यूरोप को होने वाले कुल निर्यात का 85 फीसद व्यापार इसी मार्ग से होता है। 

हिंद महासागर तक होगा पाकिस्तान का दखल

भविष्य में पाकिस्तान के साथ संघर्ष की स्थिति में इस्लामाबाद लाल सागर में भारत के खिलाफ बड़ी चाल सकता है। भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने का अभियान चला सकता है। इसके अलावा सोमालिया की सीमा हिंद महासागर से भी लगती है। रक्षा समझौते के कारण पाकिस्तान का दखल हिंद महासागर तक हो जाएगा, जबकि अभी तक उसकी नौसैनिक क्षमता अरब सागर तक सीमित है।

 

एक एंगल यह भी है कि संघर्ष की स्थिति पर मक्का रक्षा समझौता भी एक्टिव हो जाएगा। इसके तहत तुर्की-सऊदी अरब लाल सागर में भारत की नौसैनिक नाकेबंदी कर सकते हैं, हालांकि इसकी संभावना बेहद कम है, लेकिन किसी भी स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता है। पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और सोमालिया का गठबंधन ठीक उसी तर्ज पर भारत के खिलाफ सक्रिय हो सकता है, जैसे ईरान के प्रॉक्सी इजरायल के खिलाफ होते हैं। मतलब एक जगह होने वाली जंग के बीच अलग-अलग मोर्चों को खोलना।

 

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भारत की बारीकी नजर

भारत इन समझौतों से बेहद सतर्क है। शुक्रवार को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि सोमालिया और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा समझौते व सऊदी अरब- पाकिस्तान- तुर्की रक्षा समझौते पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।

सोमालिया-पाकिस्तान रक्षा समझौते में क्या है?

सोमालिया के रक्षा मंत्रालय ने चार अगस्त को एक प्रेस बयान में बताया कि सोमालिया गणराज्य और पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य ने आज अपने-अपने रक्षा मंत्रालयों के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य रक्षा, सुरक्षा और सैन्य क्षमता विकास में द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करना है। इस्लामाबाद में सोमालिया के रक्षा मंत्री अहमद मोअल्लिम फिकी और पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।

 

सोमाली रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह समझौता ज्ञापन आतंकवाद विरोधी गतिविधियों, सैन्य प्रशिक्षण, सैन्य विशेषज्ञता और ज्ञान के आदान-प्रदान, रक्षा क्षमता विकास और शांति एवं स्थिरता को बढ़ावा देने के प्रयासों के समर्थन में उन्नत सुरक्षा सहयोग के लिए एक ढांचा प्रदान करता है।

 

सोमालिया और पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया जाएगा। रक्षा एवं सुरक्षा के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग का विस्तार किया जाएगा। यह समझौता दोनों देशों के पारस्परिक हितों की पूर्ति करने वाली एक व्यावहारिक और स्थायी साझेदारी की नींव रखता है।


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