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असदुद्दीन ओवैसी कर रहे पश्चिम में रैली, सपा-कांग्रेस सीट शेयरिंग में उलझीं

यूपी में आगामी चुनाव को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा सीटों पर चुनावी रैली शुरू करके वाटरों को एकजुट करने की मुहिम छेड़ दी है। वहीं सपा व कांग्रेस अभी भी सीट शेयरिंग में उलझी हुई है।

Asaduddin Owaisi

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी। Photo Credit: PTI

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ मुस्लिम वोटों की राजनीति भी नई करवट लेती दिखाई दे रही है। जहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अभी संभावित गठबंधन और सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर अंतिम निर्णय नहीं ले सकी हैं, वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने चुनावी मैदान में बढ़त लेने की कोशिश शुरू कर दी है। ओवैसी लगातार मुस्लिम बहुल जिलों में रैलियां कर रहे हैं, अपने संगठन का विस्तार कर रहे हैं और उम्मीदवारों की घोषणा भी शुरू कर चुके हैं।

 

सबसे बड़ा संदेश उन्होंने बहराइच की मटेरा सीट से दिया, जहां प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को पार्टी का पहला उम्मीदवार घोषित कर चुनावी अभियान का औपचारिक आगाज किया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ओवैसी का मकसद सिर्फ सीटें जीतना नहीं, बल्कि उन सीटों पर खुद को निर्णायक ताकत बनाना है जहां मुस्लिम मतदाता 25 से 40 प्रतिशत तक हैं। अगर एआईएमआईएम मुस्लिम वोटों में सीमित सेंध भी लगाती है तो उसका सीधा असर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है। वहीं बीजेपी को त्रिकोणीय मुकाबले का फायदा मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है।

 

200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत

 

सांसद ओवैसी ने जून में बहराइच के मटेरा विधानसभा क्षेत्र से उत्तर प्रदेश चुनाव अभियान की शुरुआत की। इसी मंच से उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को मटेरा सीट से पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर साफ संकेत दिया कि एआईएमआईएम इस बार केवल चुनाव लड़ने नहीं बल्कि संगठन के दम पर लंबी राजनीतिक लड़ाई लड़ने आई है। पार्टी ने लगभग 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत भी दिया है, हालांकि गठबंधन के विकल्प खुले रखने की बात भी कही गई है। 

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पश्चिमी यूपी में जनसभाएं, मुस्लिम बेल्ट पर पूरा फोकस

 

बहराइच के बाद पार्टी ने अपना फोकस पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर केंद्रित किया है। नजीबाबाद (बिजनौर), सहारनपुर और मुरादाबाद में जनचेतना सभाओं का आयोजन किया गया है, जबकि संगठन की टीमें लगातार रामपुर, संभल, अमरोहा, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मुरादाबाद में सक्रिय हैं। इसके साथ ही पार्टी की नजर बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर जैसे मुस्लिम प्रभाव वाले जिलों पर भी है।

सपा के परंपरागत वोट बैंक पर सीधी नजर

 

ओवैसी के भाषणों में सबसे ज्यादा जोर राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संविधान, आरक्षण, शिक्षा और मुस्लिम नेतृत्व पर है। यह वही मुद्दे हैं जिनके सहारे समाजवादी पार्टी सालों से मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतती रही है। एआईएमआईएम की कोशिश है कि युवा मुस्लिम मतदाताओं और पहली बार वोट डालने वाले वर्ग को अपने साथ जोड़ा जाए।

 

2022 में क्यों नहीं मिली सफलता?

 

2022 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने करीब 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। अधिकांश सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इसकी बड़ी वजह मुस्लिम मतदाताओं का बीजेपी को हराने के लिए रणनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान करना और एआईएमआईएम का कमजोर बूथ संगठन था।

 

इस बार पार्टी केवल चुनाव के समय सक्रिय नहीं हुई है। बूथ कमेटियों का गठन, जिला स्तर पर संगठन विस्तार, स्थानीय नेतृत्व को आगे लाना और लगातार जनसभाएं करना एआईएमआईएम की नई रणनीति का हिस्सा है। ओवैसी ने यह भी संकेत दिया है कि बीजेपी को रोकने के लिए सम्मानजनक शर्तों पर गठबंधन के विकल्प से भी इनकार नहीं है। 

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क्या बदल जाएंगे 2027 के चुनावी समीकरण?

 

उत्तर प्रदेश की करीब 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता प्रभावी भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम रहता है। ऐसे में अगर एआईएमआईएम 3 से 5 प्रतिशत वोट भी अपने पक्ष में खींच लेती है तो कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। इसका सबसे अधिक असर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन पर पड़ सकता है।

 

हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि अगर चुनाव के समय बीजेपी के खिलाफ रणनीतिक मतदान की स्थिति बनती है तो मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिर किसी एक मजबूत विपक्षी दल के साथ भी जा सकता है। इसलिए ओवैसी की चुनावी सक्रियता फिलहाल राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय जरूर है, लेकिन उसका वास्तविक असर उम्मीदवारों, गठबंधनों और स्थानीय समीकरणों पर भी निर्भर करेगा।


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