विरासत की जंग हार रहे उद्धव, बाल ठाकरे के सियासी वारिस कैसे बनते गए एकनाथ शिंदे?
उद्धव ठाकरे के पिता बाल ठाकरे, धर्मनिरपेक्ष राजनीति नहीं करते थे। उद्धव ठाकरे ने अपनी राजनीति पिता से अलग तय की है, जिसका उन्हें खामियाजा चुकाना पड़ रहा है।

शिवसेना अध्यक्ष और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे। Photo Credit: PTI
महाराष्ट्र की सियासत में साल 2022 के बाद से उद्धव ठाकरे के लिए अच्छे दिन नहीं आए। वह कभी पार्टी खो रहे हैं, कभी जनाधार। एक चुनाव में नहीं, हर चुनाव में उन्हें हाशिए पर रहना पड़ रहा है। महाराष्ट्र विधानसभा में उनकी पार्टी शिवसेना (यूबीटी) का प्रदर्शन तो खराब था ही, वह निकाय चुनावों में भी अपनी पार्टी को प्रांसगिक नहीं बनाए रख पाए। ऐसा नहीं है कि सिर्फ ग्रामीण इलाकों में ही उनकी पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा है, शहरी इलाकों में भी उद्धव ठाकरे की नेतृत्व वाली पार्टी का प्रदर्शन बुरा रहा है। उद्धव ठाकरे, सिर्फ सियासत ही नहीं, विरासत भी खो रहे हैं, महाराष्ट्र के हर चुनाव में यह साबित हो रहा है।
महाराष्ट्र में 288 निकायों में चुनाव हुए और शिवसेना (यूबीटी) के खाते में सिर्फ 8 निकाय आए हैं। इतनी कमजोर स्थिति में उद्धव ठाकरे की पार्टी कभी नहीं थी। साल 2022 में एकनाथ शिंदे ने पहले उनसे उनकी पार्टी छीन ली, अब वह बाल ठाकरे के सियासी वारिस भी बन गए। बाल ठाकरे ने जिस शिवसेना को राज्य में सत्ता की धुरी बना दी थी, उसी शिवसेना को एक बार फिर एकनाथ शिंदे ने तो मजबूत स्थिति में पहुंचाया। उद्धव ठाकरे, बाल ठाकरे के बेटे हैं लेकिन वह अपनी पार्टी को संभाल नहीं पा रहे हैं।
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उद्धव ठाकरे की सियासत हिल क्यों गई है?
उद्धव ठाकरे के पिता हिंदुत्व की राजनीति करते थे। महाराष्ट्र में वह इतनी मजबूत स्थिति में थे कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कोड वर्ड में 'कमलाबाई' बुलाते थे। उनका एक बयान अक्सर चर्चा में आता है, जब उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि 'कमलाबाई की चिंता मत करो। वह वही करेगी जो मैं कहूंगा।' संदर्भ, भारतीय जनता पार्टी थी। साल 1992 में बाबरी विध्वंस हुआ था, तब भी उन्होंने कहा था कि 'बाबरी विध्वंस में मेरा हाथ नहीं, पांव था।'
बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे भी शिवसेना के तेज तर्रार नेताओं में गिने जाते थे। उद्धव से अच्छी पकड़ उनकी पार्टी में थी। भतीजे को दरकिनार करके पार्टी की कमान उन्होंने उद्धव ठाकरे को सौंप दी। उद्धव ठाकरे जब साल 2019 तक, बीजेपी के साथ थे लेकिन जब बीजेपी से अलग हुए तो उनकी पार्टी हाशिए पर पहुंच गई। 2022 में एकनाथ शिंदे ने उनसे बगावत की। पार्टी तोड़ी और बीजेपी के साथ सरकार बनाई।
आलम यह है कि शिवसेना के पुराने वफादार नेता, अब एकनाथ शिंदे के वफादार हैं। उनकी पार्टी शिवसेना, पार्टी का निशान, पार्टी की सियासी विरासत, सब एकनाथ शिंदे के पास है। जितने मजबूत बाल ठाकरे थे, उस स्थिति में एकनाथ शिंदे पहुंच गए हैं लेकिन उद्धव ठाकरे मुंबई से बाहर सियासी जमीन तक नहीं तलाश पा रहे हैं।
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उद्धव ठाकरे से छिटकते क्यों गए लोग?
उद्धव ठाकरे के सियासी तौर पर हाशिए पर पहुंचने की कहानी की जड़ में उनकी विचारधारा है। एक जमाने में हिंदुत्व और मराठा गौरव के अहम चेहरे रहे उद्धव ठाकरे, साल 2019 में बने महा विकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन में अचानक सेक्युलर हो गए। उन्हें संविधान और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत, हिंदुत्व की तुलना में ज्यादा बेहतर लगे। वजह यह था कि जब साल 2019 में महाराष्ट्र चुनाव हुए, एनडीए गठबंधन को बहुमत मिला। शिवसेना के 56 विधायक जीते थे, बीजेपी के 105। बहुमत के लिए 145 सीटें चाहिए, एनडीए के पास बहुमत था। अचानक उद्धव ठाकरे को लगा कि उन्हें मुख्यमंत्री बनना है।
2014 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन की जीत हुई थी और देवेंद्र फडणवीस पहली बार सीएम बने थे। बीजेपी के लिए यह हैरान करने वाला था कि शिवसेना कमजोर प्रदर्शन के बाद भी सीएम पद चाह रही है। सहमति को लेकर बातचीत चल ही रही थी कि उद्धव ठाकरे ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी (MVA) बनाई और सत्ता में आ गए। करीब 2 साल तक सत्ता में रहे लेकिन कई कदम ऐसे उठाए कि वह हाशिए पर पहुंच गए। यह गठबंधन, शिवसैनिकों को नागवर गुजरा। शिवसेना समर्थक उग्र हिंदुत्व और क्षेत्रवादी राजनीति के लिए जाने जाते रहे हैं। कांग्रेस इस मिजाज की पार्टी ही नहीं थी। उन्होंने सत्ता में रहने के लिए कई समझौते किए।
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एक तरफ महाराष्ट्र में घूम-घूमकर
राहुल गांधी
विनायक दामोदर सावरकर की खिल्ली उड़ाते, दूसरी तरफ शिवसैनिक उन्हें हिंदुत्व का प्रतीक पुरुष बताते। उद्धव ठाकरे खुद 'सेक्युलर' राजनीति पर उतर आए, बीजेपी को हिंदुत्व पर घेरने लगे। शिवसैनिकों का एक बड़ा हिस्सा इस बात से नाराज रहा। उन्होंने यहां तक मान लिया कि धर्म को राजनीति से जोड़ना गलत था। उद्धव ठाकरे ने मुस्लिम वोटों को साधने की कोशिश की। सत्ता के लिए बीजेपी से सीएम पद न मिलने पर गठबंधन तोड़ा। कांग्रेस-एनसीपी के साथ रहने से 'हिंदू हृदय सम्राट' वाली छवि बिगाड़ी और मुस्लिम बस्तियों में खूब प्रचार किया। उन्होंने सफाई में यहां तक कह दिया कि हमने हिंदुत्व नहीं, बीजेपी का 'सड़ा हिंदुत्व' छोड़ा है। जनता का भरोसा शिवसेना से उठता चला गया।
साल 2022 में उद्धव ठाकरे की राजनीति से नाराज होकर एकनाथ शिंदे ने पार्टी तोड़ दी। उन्होंने कहा कि बाल ठाकरे के मूल सिद्धांतों से उद्धव ठाकरे हट गए हैं। लोकसभा से लेकर विधानसभा तक, उन्होंने शिवसेना नेताओं को साथ लेकर अलग शिवसेना का गठन कर लिया। सदन में वह शिवसेना की तरफ से नेता विपक्ष थे। हिंदुत्व की बात कहकर बीजेपी के प्रति उन्होंने अपने प्राकृतिक गठबंधन की बात कही। एकनाथ शिंदे मराठा समुदाय से आते हैं। उन्होंने साफ संदेश दिया कि बाल ठाकरे का वंशज उनकी पार्टी की विरासत नहीं संभालेगा, बल्कि जो उनकी विचारधारा पर चलेगा, वही उनका सियासी वारिस होगा। एकनाथ शिंदे के पास पार्टी का पुराना तीर-धनुष निशान रहा, पार्टी के पुराने नेता रहे, उद्धव ठाकरे न पार्टी बचा पाए, न सियासी जमीन। जनता ने हर चुनाव में तय किया कि बाल ठाकरे का खून नहीं, बाल ठाकरे की विचारधारा पर चलने वाला शख्स ही उनका असली वारिस है।
चुनाव-दर-चुनाव हाशिए पर कैसे पहुंचे उद्धव ठाकरे
- लोकसभा चुनाव 2024: 2 साल की सत्ता का सुख लेने के बाद सत्ता से बाहर हुए उद्धव ठाकरे को भरोसा था कि महाराष्ट्र की जनता उनसे सहानुभूति रखेगी। उनके पिता की पार्टी बीजेपी-एकानाथ शिंदे ने छीन ली है तो इसका लाभ मिलेगा। ऐसा हुआ नहीं। थोड़ा असर हुआ लेकिन इसकी वजह से शिवसेना को बड़ा फायदा नहीं हुआ। एनडीए गठबंधन को 17 सीटें मिलीं। साल 2019 की तुलना में आधे कम सीटें थीं। MVA गठबंधन को 48 में 30 सीटें मिलीं। साल 2019 में बीजेपी ने 23 सीटें जीती थीं, 2024 में 9 सीटें आईं। शिवसेना ने 7 सीटें जीतीं। एनसीपी ने एक सीट जीती। कांग्रेस ने 2019 में एक सीट जीत पाई थी, 2024 में 13 सीटों पर जीत दर्ज की। शिवसेना (यूबीटी) को 9 और एनसीपी (शरद पवार) को 8 सीटें मिलीं। उद्धव ठाकरे को लगा कि विधानसभा चुनावों में भी ऐसा ही हाल होगा। इससे बिलकुल अलग हुआ।
- विधान सभा चुनाव 2025: उद्धव ठाकरे लोकसभा चुनावों में जीत से उत्साहित थे। विधानसभा में इतना बुरा हाल हुआ कि महा विकास अघाड़ी की कुल सीटें 50 पार नहीं कर पाईं। महायुति गठबंधन ने 235 सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी के 132 विधायक जीते, शिवसेना के 57 विधायकों ने जीत का परचम लहराया। एनसीपी को 41 सीटें मिलीं। इसके ठीक उलट महा विकास अघाड़ी की शिवसेना (UBT) 20, कांग्रेस 16 और एनसीपी (शरद पवार) सिर्फ 10 सीटों पर सिमटी। महा विकास अघाड़ी 50 सीटें भी हासिल नहीं कर पाई। सीएम पद की दावेदारी करने वाले उद्धव ठाकरे 20 सीटों पर सिमटे हैं।
- निकाय चुनाव 2025: बीजेपी ने 129 निकायों में जीत हासिल की है। दो चरणों में हुए इस चुनाव में बीजेपी ही सबसे बड़ी बनी। महायुति ने 200 से ज्यादा निकायों में जीत हासिल की। शिवसेना ने 51 स्थानीय निकायों में जीत हासिल की है, वहीं नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी ने 33 निकायों में जीती। महा विकास अघाड़ी, संयुक्त रूप से भी 50 पार नहीं कर पाई है। कांग्रेस ने 35 निकायों में जीत मिली, एनसीपी शरद पवार को 8 निकायों में। उद्धव ठाकरे की भी पार्टी 8 निकायों में सिमट गई। विधानसभा और निकाय चुनावों में हाशिए पर पहुंचे उद्धव ठाकरे को जनता ने एक सिरे से नकार दिया। अब उद्धव ठाकरे की नजर 15 जनवरी को होने वाले बीएमसी चुनावों पर है। अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ वह चुनाव में उतर सकते हैं। विरासत की जंग में एकनाथ शिंदे, उन पर कहीं ज्यादा भारी पड़े हैं।
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