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शिवसेना के 6 दशक, दो धड़े, शिंदे से उद्धव तक, क्या खोया-क्या पाया?

10 जून को शिवसेना को गठन को 60 साल पूरे हो गए। मगर, अब शिवसेना वह शिवसेना नहीं रही जो बाल ठाकरे ने बनाई थी। यह उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के दो खेमों में बंट गई है।

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उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे।

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शिवसेना के दोनों गुट शुक्रवार को पार्टी के 60 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। हालांकि, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला गुट जहां अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है, वहीं एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट बीजेपी के दबदबे वाले दौर में अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। कभी 25 साल तक बीजेपी की मजबूत सहयोगी रही अविभाजित शिवसेना महाराष्ट्र में गठबंधन के भीतर लगभग 'बड़े भाई' की भूमिका में थी, लेकिन 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से सत्ता का समीकरण बदल गया है।

 

साल 2014 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दोनों दलों के बीच गठबंधन टूट गया। चार महीने से भी कम समय में वे फिर साथ आ गए, लेकिन उनके रिश्ते कभी पहले जैसे नहीं हुए; उनमें हमेशा तनाव बना रहा और ऐसा लगा मानो वे किसी भी समय अलग हो सकते हैं। साल 2019 में भी ऐसा ही हुआ, जब मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए से नाता तोड़ लिया। इस अलगाव के बाद ऐसी स्थितियां बनीं जिनसे पार्टी दो गुटों में बंट गई। 

 

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एकनाथ शिंदे ने तोड़ दी शिवसेना

ऐसा नहीं है कि शिवसेना के लिए बगावत कोई नई बात थी। छगन भुजबल, गणेश नाइक, नारायण राणे और राज ठाकरे जैसे बड़े नेताओं की बगावत का सामना पार्टी पहले भी कर चुकी थी, लेकिन 2022 में एकनाथ शिंदे की अगुवाई में हुई बगावत काफी बड़ी थी, जिसने शिवसेना को ही दो हिस्सों में बांट दिया। शिवसेना में निचले स्तर से ऊपर आए शिंदे, उस समय 39 विधायकों और 13 सांसदों के साथ अलग हो गए थे। बाद में, उनके गुट को पार्टी का नाम और उसका ‘धनुष-बाण’ वाला चुनाव चिह्न भी मिल गया।

शिवसैनिकों ने जमीनी स्तर पर काम किया 

बाल केशव ठाकरे ने 1966 में शिवसेना की स्थापना की थी। उन्हें बालासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। वह एक कार्टूनिस्ट और समाज सुधारक केशव प्रबोधनकर ठाकरे के बेटे थे, जिन्होंने ‘मराठी मानुस’ यानी महाराष्ट्र की मराठी भाषी आबादी के हितों की वकालत की। बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र, और खासकर मुंबई में शिवसेना को एक मजबूत ताकत बनाया। शिवसैनिकों ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के तौर पर अपनी पहचान बनाई, जो पार्टी के मुद्दों के लिए जोर-शोर से लड़ते थे। 

उद्धव ठाकरे के लिए चुनौती

इन 60 सालों में, अविभाजित शिवसेना के तीन मुख्यमंत्री रहे। इनमें मनोहर जोशी, नारायण राणे और उद्धव ठाकरे हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी अपना पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। 2022 में पार्टी में विभाजन के बाद, एकनाथ शिंदे ने ढाई साल तक सरकार चलाई। राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई का कहना है कि दोनों गुटों, खासकर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के सामने, बाल ठाकरे के समय की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल चुनौती है।

 

उन्होंने कहा, 'बाल ठाकरे का दौर बीजेपी के दबदबे वाला नहीं था, लेकिन शिवसेना के दोनों गुट अब उसी दौर में हैं।' उन्होंने ने कहा कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट के सामने कहीं बड़ा संकट है। सिर्फ 20 विधायकों के साथ, विधानसभा में विपक्ष के खेमे में शिवसेना (UBT) भले ही सबसे बड़ी पार्टी हो, लेकिन सदन में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के पास उससे लगभग तीन गुना अधिक विधायक हैं।

 

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उद्धव ठाकरे के सामने भारी चुनौती

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली अविभाजित शिवसेना ने 1997 से 2022 तक लगातार 25 साल तक बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) पर नियंत्रण बनाए रखा। साल 2022 में पार्षदों का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही नगर निकाय पर पार्टी का नियंत्रण भी खत्म हो गया। इसके बाद 2026 में हुए निकाय चुनाव में, बीएमसी में बीजेपी अपना महापौर बनाने में सफल रही। राज्य में शिवसेना (UBT) का अभी सिर्फ एक महापौर है। परभणी नगर निकाय में। 

 

हेमंत देसाई ने यह भी कहा कि उद्धव के गुट के सामने आए संकट में उम्मीद की एक किरण भी है। वह नई शुरुआत कर सकते हैं, हालांकि इसके लिए बहुत ज़्यादा कोशिशों की जरूरत होगी, खासकर उद्धव के बेटे और उनके उत्तराधिकारी आदित्य ठाकरे की तरफ से।

सत्ता पर विराजमान हैं शिंदे

एकनाथ शिंदे 2014 से सत्ता में हैं। वह पहले देवेंद्र फडणवीस सरकार में, फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री थे। बाद में 2022 से 2024 तक मुख्यमंत्री के तौर पर और 2024 से उपमुख्यमंत्री के तौर पर विराजमान हैं। दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर डेवलपिंग स्टडीज़ एंड सोसाइटीज़’ के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार ने कहा कि शिवसेना के दोनों गुटों की अहमियत को क्षेत्रीय दलों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, खासकर उन दलों में जहां सत्ता का हस्तांतरण मुख्य परिवार के भीतर हो सकता है। आंकड़े बताते हैं कि वोट शेयर के मामले में दोनों गुटों की अहमियत कम हो गई है।

 

उन्होंने कहा कि शिवसेना (UBT) को न सिर्फ नेतृत्व से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि उसे विचारधारा संबंधी संकट का भी सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि बीजेपी ने उसका हिंदुत्व का मुद्दा छीन लिया है। संजय कुमार ने कहा कि शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के कुछ समय तक अहम बने रहने की संभावना है, क्योंकि राज्य चुनाव में बीजेपी के पास अभी भी पूर्ण बहुमत नहीं है। उन्होंने कहा, 'धीरे-धीरे शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना भी बिहार में जद (यू) की तरह ही अपनी अहमियत खोती जा रही है।'


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