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कभी मानस, कभी मंदिरों पर सवाल, कांग्रेस के लिए सिरदर्द हैं स्वामी प्रसाद मौर्य?

स्वामी प्रसाद जब से भारतीय जनता पार्टी से अलग हुए हैं, उनकी राजनीति, हर राजनीतिक दल के लिए असहज करने वाली रही है।

Swami Prasad Maurya and Rahul Gandhi

स्वामी प्रसाद मौर्य और राहुल गांधी। AI Edit। Photo Credit: PTI

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और खुद को गैर यादव पिछड़े समाज के नेता बताने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य अब कांग्रेस के साथ रिश्ते आगे बढ़ाना चाहते हैं। कभी बहुजन समाज पार्टी, कभी बीजेपी और कभी सपा के लिए सिरदर्द साबित होने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने राहुल गांधी से भी मुलाकात कर ली है। उन्होंने एलान किया है कि 'अपनी जनता पार्टी' कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन में जाएगी।

स्वामी प्रसाद मौर्य, यूपी की गलियों से निकलकर अब 10 जनपथ तक पहुंच गए हैं। राहुल गांधी से मिलने के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि चुनावी रणनीति और उनकी पार्टी कितनी सीटों पर लड़ेगी, यह बाद में तय होगा। उनके मुताबिक उनका लक्ष्य BJP को हटाना और देश को बचाना होगा। 

स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा है कि उनकी पार्टी, अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक और अन्य पिछड़े वर्ग से जुड़ मुद्दे उठाएगी, इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर काम करेगी। स्वामी प्रसाद मौर्य का इतिहास रहा है कि वह जिस पार्टी के साथ रहे, उसकी सियासी मुश्किलें ही बढ़ाए। उनकी न बसपा से बनी, न सपा से, न ही बीजेपी से। अब वह कांग्रेस के साथ दोस्ती बढ़ा रहे हैं। 

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कांग्रेस के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं स्वामी प्रसाद?

स्वामी प्रसाद मौर्य, बहुजन समाज पार्टी में रहने के दौरान ही हिंदू समाज के मुखर आलोचक बने रहे हैं। हिंदू-देवी देवताओं पर सवाल उठाते रहे हैं। उनके राजनीतिक जीवन में सबसे 'रामचरितमानस' के बारे में अपमानजनक बातें कहना है। वह शादियों में गौरी-गणेश पूजन पर भी सवाल उठा चुके हैं। जनवरी 2023 में उन्होंने दावा किया कि रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों में दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। इसे लेकर उन्होंने राम चरित मानस पर प्रतिबंध लगाने की बात कही।

स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थकों ने रामचरितमानस को जलाया। कई जगहों पर उसके खिलाफ FIR दर्ज की गई है। वह हिंदू धर्म, ब्राह्मणवाद और धार्मिक अनुष्ठानों को लेकर हमेशा आलोचक की भूमिका में रहते हैं। संतों और हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग उनके बयानों से नाराज रहता है। 

2023 में वह समाजवादी पार्टी में आ गए थे, जिसकी वजह से अखिलेश यादव की सियासी मुश्किलें बढ़ीं, लोगों ने समाजवादी पार्टी से इतने सवाल किए वह खुद असहज हो गए। साल 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस, ब्राह्मण से लेकर अल्पसंख्यक तक, हर जातीय और धार्मिक समीकरणों पर जोर दे रही है। स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ आने से एक बड़ा वर्ग नाराज हो सकता है। 

 

 

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दोस्ती टूटते ही दुश्मन बन जाते हैं स्वामी प्रसाद 

स्वामी प्रसाद मौर्य साल 2012 से लेकर 2016 तक, विपक्ष के नेता रहे हैं। उन्होंने साल 2016 में मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाकर किनारा कर लिया। वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। साल 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने प्रचंड बहुमत से सरकार बना ली। स्वामी प्रसाद मौर्य को योगी कैबिनेट में हिस्सा मिला। 

साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने बीजेपी सरकार पर पिछड़ों और दलितों की उपेक्षा का आरोप लगाकर इस्तीफा दे दिया। समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। स्वामी प्रसाद मौर्य ने दावा किया कि वह नेवला हैं और भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का फन कुचल देंगे।

13 जनवरी 2022 को उन्होंने लिखा, 'नाग रूपी आरएसएस एवं सांप रूपी भाजपा को स्वामी रूपी नेवला यू.पी. से खत्म करके ही दम लेगा।'

समाजवादी पार्टी में रहने के दौरान उनके विवादास्पद बयानों से पार्टी नेतृत्व ने खुद को अलग कर लिया। फरवरी 2024 में उन्होंने भेदभाव का हवाला देकर सपा के राष्ट्रीय महासचिव और एमएलसी पद से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। वह अपनी नई पार्टी 'राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी' का गठन कर लिया।

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किसी के सगे नहीं हैं स्वामी प्रसाद मौर्य?

स्वामी प्रसाद मौर्य का OBC राजनीति से लंबा जुड़ाव रहा है। वह कभी मायावती के करीबी माने जाते थे और बहुजन समाज पार्टी की सरकार में अहम विभाग संभाल चुके हैं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले वह BSP छोड़कर BJP में चले गए थे।

 

योगी आदित्यनाथ सरकार के पहले कार्यकाल में वह श्रम मंत्री थे। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने BJP छोड़ दी। उन्होंने आरोप लगाया था कि भारतीय जनता पार्टी दलितों, OBC और किसानों की अनदेखी कर रही है। इसके बाद वह समाजवादी पार्टी में गए। साल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने समाजवादी पार्टी भी छोड़ दी और अपनी जनता पार्टी  बना ली।

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यह गठबंधन होगा कैसे?

INDIA गठबंधन में सपा भी शामिल है। स्वामी प्रसाद मौर्य की पार्टी अब उसी गठबंधन का हिस्सा होगी, जिसका सबसे मजबूत दल, समाजवादी पार्टी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के आने से INDIA गठबंधन को गैर-यादव OBC मतदाताओं तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। 

स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनीतिक आधार क्या है?

स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनीतिक आधार रहा है। उत्तर प्रदेश में पार्टियां गैर-यादव OBC समुदायों का समर्थन अपने साथ जोड़ने की तैयारी में हैं। वह खुद मौर्य-कुशवाहा समाज से आते हैं। उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता बड़े स्तर पर कभी नहीं रही है। स्थानीय स्तर पर मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी जातियों का समर्थन उन्हें मिलता रहा है।

 

स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनीतिक आधारर से पडरौना, रायबरेली और कुशीनगर क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ा है। वह लंब समय तरक बहुजन समाज पार्टी में रहे हैं, बहुजन राजनीति वह करते हैं। इन दिनों वह सामाजिक न्याय और दलित-पिछड़ा वर्ग के अधिकारों की पैरोकारी कर रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में खुद को दोबारा स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं। उन्होंने 2022 के बाद से ही कोई राजनीतिक सफलता का स्वाद नहीं चखा है।


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