एक तस्वीर, कई मायने, न बालियान, न संगीत सोम, क्या पश्चिमी UP में जयंत भरोसे BJP?
मुजफ्फरनगर में हुए एक सरकारी कार्यक्रम के मंच से बीजेपी ने कई बड़े संदेश देने की कोशिश की है। इस संदेश के पश्चिमी यूपी में बड़े संदेश छुपे हुए हैं।

फोटो में साइड में खड़े संजीव बालियान।
मुजफ्फरनगर जिले के नुमाइश ग्राउंड में सोमवार यानी 13 अप्रैल को बीजेपी और राष्ट्रीय लोक दल (RLD) की संयुक्त रैली हुई। इस रैली में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री और आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी शामिल हुए। यह रैली खासतौर पर जिले के लोगों के लिए रोजगार मेले के तौर पर आयोजित की गई थी। रोजगार मेले में युवाओं को नियुक्ति पत्र बांटे गए। मगर, इसके मंच से कई बड़े संदेश देने की कोशिश हुई। इस जनसभा को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम यूपी की राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
यूपी विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष लगातार बेरोजगारी को मुद्दा बना रहा है। ऐसे में एनडीए ने पश्चिम यूपी के युवाओं के लिए रोजगार मेला आयोजित करके विपक्ष को जवाब देने की शुरूआत की है। युवाओं को रोजगार और पूरे इलाके को विकास योजनाओं की सौगात देकर पश्चिम यूपी से चुनाव का शंखनाद किया। बीजेपी और आरएलडी के नेताओं ने जनसभा के लिए पूरी ताकत झोंक दी। इस रैली से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एनडीए की एकजुटता और रणनीति का संकेत दिया गया है।
फोटो ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा
इसी बीच रैली से एक फोटो सामने आई, जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। दरअसल, मंच पर सीएम योगी आदित्यनाथ और जयंत चौधरी के अलावा मंत्री कपिल देव अग्रवाल मौजूद थे। बीजेपी और आरएलडी के कई विधायक भी मंच पर थे। कई छोटे नेता मंच और फोटो के सेंटर में मौजूद थे, लेकिन मुजफ्फरनगर के बड़े नेता और हाशिए पर चल रहे पूर्व सांसद डॉ. संजीव बालियान साइड एक कोने पर खड़े थे। सरधना के पूर्व विधायक और फायरब्रांड बीजेपी नेता संगील सोम तो मंच से ही गायब दिखे।
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ऐसे में सभी नजरें संजीव बालियान पर टिकी रहीं। इससे बीजेपी पर लग रहे इन आरोपों को हवा मिली है कि संजीव बालियान के चुनाव हारने के बाद से धीरे-धीरे जाट बिरादरी के नेता बीजेपी से किनारे किए जा रहे हैं। इस मंच से यह भी साफ हो गया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी जाट वोटरों को अपने पाले में खिंचने के लिए अपनी पार्टी के नेताओं से ज्यादा जयंत चौधरी पर निर्भर रहेगी। अगर ऐसा नहीं होता तो संजीव बालियान मंच के सेंटर में होते और उन्हें बड़ा जाट नेता के तौर पर रैली में पेश किया जाता।

बीजेपी-आरएलडी नहीं चाहती हैं कि...
बीजेपी और आरएलडी नहीं चाहती हैं कि जाट वोटरों में यह संदेश जाए कि जाटों के दो नेता हैं इसलिए ही गठबंधन के शीर्ष नेता चाहते हैं कि संजीव बालियान की जगह जयंत चौधरी को अहमियत दी जाए। वैसे भी बीजेपी जानती है कि संजीव बालियान मुजफ्फरनगर जिले तक सीमित हैं, जबकि जयंत चौधरी अपनी पार्टी के जरिए और चौधरी चरण सिंह की विरासत के बूते पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना प्रभाव रखते हैं।
यही वजह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी का संगठन और नेता धीरे-धीरे राष्ट्रीय लोकदल के प्रभाव में आ रहे हैं। बीजेपी नेता भी जानते हैं कि 2027 के चुनाव में सीट बंटवारे में आरएलडी के अच्छी-खासी सीटें आने वाली हैं। सीट बंटवारे में पार्टी के हाथ कोई भी सीट हाथ आ सकती है। दर्जनों सीटों पर जयंत चौधरी और उनके परिवार का प्रभाव हमेशा से रहा है, यह चाहे कम हो या ज्यादा, इसलिए जयंत चौधरी अब बीजेपी के लिए मजबूरी का नाम हैं।
2024 लोकसभा चुनाव हारे संजीव बालियान
संजीव बालियान 2024 का लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के हरेद्र मलिक से हार गए थे। चुनाव बाद बालियान ने आरोप लगाया कि मेरठ की सरधना सीट से 2017 में विधायक चुने गए और 2022 में हार चुके संगीत सोम ने उन्हें चुनाव हरवाया है। इसके बाद से ही दोनों नेता सार्वजनिक तौर से एक दूसरे पर जमकर छींटाकशी करते आ रहे हैं। यह बयान विपक्ष को बीजेपी के अंदर अंदरूनी कलह के नाम पर हमला करने का मौका देते हैं। पार्टी हाईकमान इन बयानों से परेशान रहता है। दूसरी बात यह भी है कि कई मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया है कि सरधना सीट आरएलडी मांग रही है। सरधना सीट से संगीत सोम लड़ते रहे हैं। ऐसे में अगर इस सीट को लेकर तनातनी होती है तो बीजेपी संगीत सोम के लिए दयंत चौधरी को नाराज नहीं करना चाहेगी।
जाट नेताओं को किनारे किया?
दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जयंत चौधरी को अपने साथ गठबंधन में शामिल करने के बाद बीजेपी ने सबसे पहले पार्टी के जाट नेताओं को किनारे किया है। 2024 लोकसभा के बाद से बीजेपी में जाट नेताओं के पास कोई बड़ा पद नहीं है। बीजेपी जयंत चौधरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा सिरदर्द मानती थी और अब उसे अपने साथ लेने के बाद रामबाण की तरह इस्तेमाल कर रही है। बीजेपी नहीं चाहती कि स्थानीय स्तर पर परंपरागत वोटो को ताक पर रखकर जाटों को प्राथमिकता दी जाए। मगर, जयंत चौधरी को साथ रखकर बीजेपी जाट वोटों को एकजुट करने रख सकती है।
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महापंचायत में संगीत सोम से अदावत दिखी
पिछले दिनों मेरठ के सकौती में बीजेपी के जाट नेताओं ने शक्ति प्रदर्शन किया और महापंचायत का आयोजन किया। बिरादरी के इस कार्यक्रम में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता जमकर दिखी। संजीव बालियान ने संगीत सोम पर परोक्ष रूप से अपनी हार जिम्मेदार बताते हुए कहा था, 'कई बार राजनीति हो या सामाजिक जीवन अपमान सहना पड़ता है। दो कदम पीछे हटाने पड़े ऐसा अपमान हमने चुनाव के समय में सहा था। चुनाव हारने जीतने का दुख नहीं होता, लेकिन जिस तरह से अपमान किया गया था उसका दुख होता है। अगर किसी ने अपमान किया है तो उसे सूद-ब्याज सहित चुकाना होगा।'
बीजेपी कैसे करेगी किनारा
बताया जा रहा है कि जाट सम्मेलन के दौरान दिया गया यह बयान पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में चल रही खींचतान की ओर इशारा करता है, जहां बीजेपी के भीतर ही नेताओं के बीच तनाव की चर्चा पहले से होती रही है। यह बात भी सच है कि डॉ संजीव बालियान और संगीत सिंह सोम बीजेपी में रहते हुए इतने बड़े कद के नेता बन चुके हैं कि बीजेपी उनसे सीधा कोई बैर नहीं लेना चाहती, जिससे पार्टी को चुनाव में नुकसान उठाना पड़े। बीजेपी हर तरह से इनका विकल्प ढूंढ रही है। ऐसे में राष्ट्रीय लोकदल इन सब का इलाज है।

जयंत चौधरी की अहमियत
बीजेपी के बाकी जातियों के नेता यह बात अच्छी तरह समझ चुके हैं कि मुजफ्फरनगर के सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी के साथ आरएलडी अध्यक्ष जयंत चौधरी जब एक मंच पर बैठेंगे तो दोनों पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को सत्ता बराबरी के साझे में दिखाई देगी। ऐसे में बीजेपी हाईकमान की ओर उम्मीद की नजरों से देखने वाले जाट नेता कमजोर होंगे। निश्चित तौर पर अबकी बार जयंत चौधरी 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी से बड़ा हिस्सा मांगेंगे। यह बात बीजेपी के स्थानीय नेता भी जानते हैं कि जहां जयंत ने हाथ रख दिया वह सीट उनके सहयोग के बगैर नहीं जीती जा सकेगी, भले ही टिकट बीजेपी के पास रहे।
इसलिए अब बीजेपी के नेता अपनी पार्टी के नेताओं के साथ जयंत चौधरी की भी परिक्रमा कर रहे हैं। इन परिक्रमाधारियों में बीजेपी के वर्तमान विधायक, मंत्री और संभावित प्रत्याशी भी शामिल हैं।
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