उत्तराखंड: चेहरे तो हैं, भरोसे की जरूरत, राहुल गांधी के दौरे से क्या बदलेगा?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी उत्तराखंड दौरे पर हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए यह महीनों का इंतजार है। इस दौरे से क्या बदलने वाला है, पढ़ें।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी। Photo Credit: PTI
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता विपक्ष
राहुल गांधी
उत्तराखंड दौरे पर हैं। राहुल गांधी, 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे और युवाओं को संबोधित करेंगे। पहले यह कार्यक्रम देहरादून के परेड ग्राउंड पर आयोजित होने वाला था, कार्यक्रम रद्द हो गया। अब यह आंदोलन 'बन्नू स्कूल' में होने वाला है। राहुल गांधी के इंतजार में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से लेकर मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल तक को है। हर किसी को इंतजार है कि राहुल गांधी आएंगे और पार्टी के लिए 2027 की जमीन तैयार करेंगे।
उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए सियासी नतीजे, लगातार झटके वाले रहे हैं। राज्य में करीब 1 दशक से बाहर है। अब 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उससे पहले पार्टी चुनावी तैयारियों में जुटी है। नतीजे अभी तक सार्थक नहीं रहे हैं। न ही विधानसभा में, न ही लोकसभा में कांग्रेस को बड़ी कामयाबी मिली है। राज्य में 5 लोकसभा सीटें है, एक भी भी सांसद बीजेपी में नहीं है।
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उत्तराखंड में 'चेहरे' पर ही अटकती कांग्रेस?
उत्तराखंड में कांग्रेस के पास चेहरे हैं लेकिन पार्टी ने किसी एक चेहरे पर अभी तक भरोसा नहीं जता रही है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास उत्तराखंड में चेहरे नहीं हैं, बस उन्हें भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की तरह 'फ्रंट लाइन वर्कर' नहीं बनाया जा रहा है। उत्तराखंड में यह कमी तब तक नहीं झलकती थी, जब तक हरीश सिंह रावत, सीएम रेस में होते थे। अब उनकी 78 साल है। सक्रिय राजनीति में अब उन पर कांग्रेस दांव खेलने से बच रही है।
नेता कई हैं लेकिन जिम्मेदारी किसको देंगे?
कांग्रेस ने हाल ही में उत्तराखंड में नई प्रदेश समिति का गठन किया था। नई समिति में कुमारी शैलजा को प्रभारी चुना गया है। प्रकाश जोशी, तिलक राज बेहड़, ममता राकेश, विक्रम सिंह नेगी, गणेश गोदियाल, यशपाल आर्य, हरीश रावत, प्रीतम सिंह, गुरदीप सिंह सप्पल, काजी निजामुद्दीन, करण माहरा, हरक सिंह रावत, भुवन कापड़ी, गोविंद सिंह कुंजवाल, प्रदीप टम्टा, महेंद्र पाल सिंह और ब्रह्म स्वरूप ब्रह्मचारी जैसे नेता शामिल हैं। समिति में कुल 23 लोगों को जगह दी गई है।
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जिम्मेदारी क्या है?
सूत्रों के मुताबिक जमीन पर गणेश गोदियाल सबसे सक्रिय नजर आ रहे हैं। हरीश रावत पदयात्रा कर रहे हैं, जगह-जगह पहाड़ी इलाकों में पहुंच रहे हैं और लोगों से संवाद कर रहे हैं। वह इस बार मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं हैं।
राहुल गांधी के आने के बाद नेतृत्व को लेकर होगी कलह?
उत्तराखंड कांग्रेस में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर नेतृत्व की दावेदारी तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य को पार्टी के अंदर बड़ा समर्थन मिल रहा है। कुमाऊं क्षेत्र से आने वाले आर्य दलित समाज के प्रमुख चेहरों में शुमार हैं और आम लोगों में भी उनकी लोकप्रियता अच्छी खासी है। उनके समर्थक उन्हें भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे हैं।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल संगठन की कमान संभाले हुए हैं। वह भी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की रेस में खुद को देख रहे हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह भी पहाड़ी इलाकों में खुद को अहम दावेदार मानते हैं।
हरक सिंह रावत, गढ़वाल के निर्विवाद बड़े नेताओं में शामिल हैं। भुवन चंद्र कापड़ी का कांग्रेस में कद, विधानसभा में उपनेता तक पहुंच गया है। राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल, भीमलाल आर्य, गौरव गोयल और लखन सिंह नेगी जैसे नेता भी अब इस उम्मीद में हैं कि राहुल गांधी और कांग्रेस की शीर्ष नेतृत्व उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपेगा।
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आंकड़ों में कैसे बिखर रही है कांग्रेस?
उत्तराखंड में 2017 से कांग्रेस सत्ता से बाहर है। आखिरी बार हरीश रावत मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद के हर चनाव में कांग्रेस पार्टी को करारी हार ही मिली। साल 2017 में भी कांग्रेस बाहर रही, 2022 में भी पार्टी की करारी हार हुई।
उत्तराखंड में 70 विधानसभा सीटें हैं। 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने हरीश रावत के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। पार्टी सिर्फ 11 सीटों पर सिमट गई और बीजेपी 57 सीटों पर आ गई। यह बीजेपी के लिए बड़ी जीत थी। दो अन्य उम्मीदवारों को जीत मिली।
2022 के चुनाव में कांग्रेस की 7 सीटें बढ़ गईं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद अपनी सीट गंवा बैठे। कांग्रेस ने 2022 में 19 सीटें जीतीं। बीजेपी ने 47 सीटों पर बढ़त हासिल की। बहुजन समाज पार्टी की भी 2 सीटें आईं।
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अब क्या कर सकते हैं राहुल गांधी?
पंजाब कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच कलह हुई, कांग्रेस ने सत्ता गंवाई। राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत की आपसी सियासी का असर विधानसभा चुनावों में पड़ा। जिन राज्यों में कांग्रेस की जमीन दरकी, वहां कलह बड़ी वजह रही। उत्तराखंड में कांग्रेस अब ऐसा टकराव नहीं चाहती है।
कांग्रेस ने इस बार नेताओं को जमीन पर रहकर संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी है। अभी तक किसी एक चेहरे को महत्व नहीं दिया है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस की यह रणनीति भी हो सकती है। जहां चेहरे का एलान होता है, वहां कलह शुरू हो जाती है, इस बार उत्तराखंड कांग्रेस, कलह की स्थिति से बची हुई है, पहली बार सारे नेता, एक कतार में एक साथ नजर आ रहे हैं। राहुल गांधी का यह दौरा, चुनाव प्रचार की औपचाहिर शुरुआत मानी जा रही है।
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