बिहार की राजनीति में इन दिनों सरगर्मी बढ़ी हुई है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक और सूत्रधार प्रशांत किशोर ने साफ संकेत दिए हैं कि वे पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में खुद ताल ठोक सकते हैं। प्रशांत किशोर का यह ऐलान सीधे तौर पर बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ को चुनौती माना जा रहा है। अगर वे खुद चुनाव लड़ते हैं तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है। प्रशांत किशोर ने यह बात एक इंटरव्यू में कही।
इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने कहा, 'बांकीपुर में बीजेपी को हराने के लिए जो कुछ भी करना पड़ेगा, वह किया जाएगा। अगर कार्यकर्ता चाहेंगे और जरूरत पड़ी तो मैं खुद चुनाव लड़ूंगा। 40-45 साल पुराने इस किले को तोड़ना ही जन सुराज का मकसद है।'
बांकीपुर विधानसभा सीट पटना शहर की सबसे चर्चित सीटों में मानी जाती है। यह बीजेपी का वह अभेद किला है, जिसे पिछले 30 साल से कोई नहीं भेद पाया है। 1995 से यहां लगातार कमल ही खिल रहा है।
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क्यों अहम है बांकीपुर सीट?
इस सीट की कहानी भी दिलचस्प है। पहले यहां से नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा लगातार चार बार विधायक रहे। 2005 में उनके निधन के बाद 2006 के उपचुनाव में उनके बेटे नितिन नवीन मैदान में उतरे और जीत गए। तब से लेकर अब तक नितिन नवीन ही यहां से विधायक बनते आ रहे हैं।
पिता-पुत्र की जोड़ी ने मिलकर इस सीट को बीजेपी का स्थायी गढ़ बना दिया। कांग्रेस, राजद और वाम दलों ने भी यहां पूरी ताकत लगाई, गठबंधन बनाए और बड़े-बड़े चेहरे उतारे, लेकिन बांकीपुर की दीवार नहीं टूटी। 2020 में भी जब महागठबंधन की लहर थी, तब भी नितिन नवीन 18 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे। पूरा मामला विरोधी दलों की एकजुटता पर निर्भर करेगा।
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क्यों खाली हुई सीट?
बांकीपुर सीट खाली होने की वजह भी बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी है। मौजूदा विधायक नितिन नवीन को बीजेपी ने हाल ही में राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया है। पार्टी के 'एक व्यक्ति-एक पद' के सिद्धांत के चलते नितिन नवीन ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा मंजूर होते ही बांकीपुर सीट खाली हो गई। चुनाव आयोग जल्द ही यहां उपचुनाव की तारीख का ऐलान करेगा। माना जा रहा है कि दिवाली से पहले नवंबर में मतदान हो सकता है।
प्रशांत किशोर की एंट्री से बदलेंगे समीकरण
प्रशांत किशोर के ऐलान के बाद बांकीपुर का सियासी पारा चढ़ गया है। पीके खुद चुनावी रणनीतिकार रह चुके हैं। 2014 में
नरेंद्र मोदी
, 2015 में
नीतीश कुमार
और 2021 में
ममता बनर्जी
की चुनावी जीत के पीछे उनकी रणनीति की चर्चा होती रही है। अब वे खुद चुनावी मैदान में उतरने की बात कर रहे हैं।
जन सुराज पार्टी पिछले दो साल से बिहार में पदयात्रा कर रही है। पीके हर जिले में जाकर युवाओं और महिलाओं को जोड़ रहे हैं। उनका फोकस 'बिहार में बदलाव' पर है। अब वे सीधे बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ पर हमला बोल रहे हैं।
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प्रशांत किशोर ने कहा, 'बांकीपुर सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि एक प्रतीक है। अगर यहां बीजेपी हारती है तो पूरे बिहार में संदेश जाएगा कि अब जनता बदलाव चाहती है। 30 साल से एक ही परिवार और एक ही पार्टी को जिताकर लोगों को क्या मिला? सड़क, नाली, शिक्षा और रोजगार का हाल देख लीजिए।'
बीजेपी की टेंशन बढ़ी
नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बीजेपी के सामने बड़ा सवाल है कि बांकीपुर से उम्मीदवार कौन होगा। परिवार से ही कोई चेहरा उतरेगा या पार्टी नया प्रयोग करेगी, यह अभी तय नहीं है। वहीं पीके की संभावित एंट्री से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
जन सुराज अभी नई पार्टी है, प्रशांत किशोर का अपना चेहरा और राजनीतिक ब्रांड है। अगर वे खुद चुनाव लड़ते हैं तो मुकाबला सीधे पीके बनाम बीजेपी का हो सकता है। वहीं राजद और कांग्रेस भी इस सीट पर नजर बनाए हुए हैं। अगर महागठबंधन प्रशांत किशोर को समर्थन देता है तो बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
क्या कहते हैं सियासी जानकार?
पटना के वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है, 'बांकीपुर बीजेपी की लैब सीट है। यहां शहरी वोटर, व्यापारी और कायस्थ-बनिया वोट बीजेपी का कोर वोट बैंक हैं। 1995 से यह पैटर्न नहीं टूटा है लेकिन अगर पीके खुद चुनाव लड़ते हैं, तो मुकाबला जातीय समीकरण से ऊपर उठकर 'चेहरा बनाम चेहरा' बन सकता है।'
जन सुराज का नारा 'सही लोग, सही सोच, सामूहिक प्रयास' है। प्रशांत किशोर लगातार युवाओं को जोड़ रहे हैं। अगर वे 20 हजार नए वोट अपने पक्ष में खींचने में सफल रहे तो बांकीपुर का चुनावी समीकरण बदल सकता है।