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रुद्राभिषेक: भोलेनाथ को प्रसन्न करने की सबसे शक्तिशाली विधि और नियम

भगवान शिव उपासना के समय रुद्राभिषेक अनुष्ठान को बहुत ही प्रभावशाली माना जाता है। आइए जानते हैं इस अनुष्ठान से जुड़े नियम और खास बातें।

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भगवान शिव पूजा में रखनी चाहिए सावधानी।(Photo Credit: AI Image)

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भगवान शिव की पूजा में रुद्राभिषेक को सबसे प्रभावशाली और चमत्कारी माना जाता है। यह एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान है जिसमें भगवान शिव के शिवलिंग रूप का जलाभिषेक और अनेक वस्तुओं से किया जाता है। यह वेदों से प्रेरित विधि है और मान्यता है कि इससे मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख-शांति आती है।

 

पवित्र श्रावण मास, शिवरात्रि और प्रदोष व्रत के दिन रुद्राभिषेक को बहुत ही पुण्यदायी माना जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि रुद्राभिषेक में भगवान शिव की स्तुति की जाती है। हालांकि इस अनुष्ठान को बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए। आइए जानते हैं, इस अनुष्ठान में किन-किन चीजों को इस्तेमाल किया जाएगा और किन नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

 

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रुद्राभिषेक में प्रयुक्त प्रमुख वस्तुएं और उनका महत्व

  • गंगाजल (पवित्र जल): यह भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय माना जाता है। मान्यता है कि गंगा उनकी जटाओं में निवास करती हैं। इससे शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने से जीवन के पाप दूर होते हैं और मानसिक शुद्धि होती है।
  • कच्चा दूध: यह शुद्धता और मातृत्व का प्रतीक है। इससे मन को शांति मिलती है और सौम्यता आती है। यह मन की चंचलता को कम करता है और आरोग्य देता है।
  • दही: यह समृद्धि, सौभाग्य और संतुलन का संकेत देता है। दही चढ़ाने से परिवार में सुख-संपत्ति बढ़ती है।
  • घी (तुलसी रहित): घी का अभिषेक शरीर और आत्मा की शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह तेज और ज्ञान को बढ़ाता है।
  • शहद: शहद मिठास और सामंजस्य का प्रतीक है। इसके प्रयोग से संबंधों में मधुरता आती है और वाणी मधुर होती है।
  • शक्कर: जीवन में प्रसन्नता, संतोष और मीठापन लाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
  • बेलपत्र (बिल्वपत्र): यह भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। तीन पत्तियों वाला बेलपत्र शिव के त्रिनेत्र और त्रिगुण का प्रतीक माना जाता है। इससे शिवजी अति प्रसन्न होते हैं।
  • धतूरा व भांग: यह तप, वैराग्य और शिव के उग्र रूप को दर्शाता है। शिव को यह अति प्रिय है क्योंकि वे योगी हैं और इन वनस्पतियों से जुड़ाव रखते हैं।
  • चंदन: चंदन शीतलता, शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इससे मानसिक तनाव कम होता है।
  • केसर: केसर संपन्नता और दिव्यता का प्रतीक है। यह दुर्लभ और शुद्ध मानी जाती है।
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर): यह पांच चीजों का मिश्रण होता है। यह शरीर और आत्मा की पूर्ण शुद्धि का संकेत देता है और पूजा को पूर्णता देता है।
  • फूल (विशेषकर आक, कनेर, कमल): फूल श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक होते हैं। शिव को विशेष रूप से सफेद फूल पसंद होते हैं।
  • भस्म (राख): महादेव वैराग्य और मृत्यु के देवता माने जाते हैं। भस्म उनका श्रृंगार है, जिससे यह दर्शाया जाता है कि संसार नश्वर है।
  • रुद्राभिषेक के दौरान बोले जाने वाले मंत्र: ‘ॐ नमः शिवाय’ यह पंचाक्षरी मंत्र शिव को समर्पित है, जो आत्मा की शुद्धि करता है। जिन भक्तों को वेद पाठ नहीं आता है उन्हें इस मंत्र का जाप करते हुए रुद्राभिषेक करने की सलाह दी जाती है। वहीं, पुरोहित रुद्री पाठ करते हैं जो यजुर्वेद के आठ अध्यायों में विभाजित है, जो इस अभिषेक का मूल आधार होते हैं। इन मंत्रों से शिव की स्तुति और आह्वान किया जाता है।

रुद्राभिषेक के नियम और सावधानियां

इस अनुष्ठान से पहले स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और मन को शांत रखें इसके साथ पूजा के दौरान मन में श्रद्धा और भक्ति होनी चाहिए। किसी प्रकार का क्रोध या द्वेष नहीं रखना चाहिए। शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय दक्षिण दिशा की ओर से जल न चढ़ाएं।

 

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शास्त्रों में यह बताया गया है कि शिवलिंग की परिक्रमा भी अर्धचंद्राकार करनी चाहिए (पूर्ण परिक्रमा नहीं की जाती)। वहीं पूजा में ताम्र या कांसे के पात्र का प्रयोग करें। प्लास्टिक या एल्यूमिनियम के बर्तन वर्जित माने जाते हैं। रूद्राभिषेक सुबह ब्रह्म मुहूर्त या प्रातःकाल करना श्रेष्ठ होता है। हालांकि प्रदोषकाल (शाम को) में भी इस अनुष्ठान को शुभ माना जाता है।


भगवान शिव की पूजा में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शिवलिंग या प्रतिमा पर तुलसी का पत्ता अर्पित न करें। शिव पूजा में तुसली पत्र का इस्तेमाल वर्जित है, हालांकि तुलसी मंजरी इस्तेमाल स्वीकार है। इसके साथ महिलाओं के लिए यह बताया गया है कि उन्हें सीधे तौर पर शिवलिंग का स्पर्श नहीं करना चाहिए।

 

रुद्राभिषेक अनुष्ठान नकारात्मक ऊर्जा को हटाकर सकारात्मक शक्ति प्रदान करता है। जीवन में आने वाले रोग, भय और संकट को दूर करता है। मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और आत्मिक बल में वृद्धि होती है। यह व्यक्ति के भीतर करुणा, धैर्य और सहनशीलता लाता है।


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