2026 के जून महीने में कुछ खास पर्व और त्योहार मनाए जाएंगे। इस महीने की 15 तारीख दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए बेहद खास है, जहां हिन्दू और मुस्लिम धर्म के लोग अलग-अलग मान्यताओं के आधार पर धार्मिक परंपराएं निभाते नजर आएंगे। हिन्दू धार्मिक जानकारों के मुताबिक, इस दिन अधिकमास की सोमवती अमावस्या होगी। यह अमावस्या बेहद दुर्लभ है क्योंकि यह 3 साल में एक बार आती है। दूसरी तरफ, इस्लामिक मान्यता के अनुसार 15 जून को ही मुहर्रम महीने की शुरुआत होगी। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार यह मुहर्रम साल का पहला महीना है। इस महीने का 10वां दिन खास माना जाता है।
हिन्दू जानकारों के अनुसार यह दिन सिर्फ इसलिए खास नहीं है क्योंकि इस दिन अमावस्या है। इसके अलावा ग्रहों की दशा में भी कुछ खास परिवर्तन होंगे, जिससे लोगों की ऊर्जा में बदलाव आएगा। अब सवाल उठता है कि हिन्दू धर्म में अधिकमास की अमावस्या खास क्यों है। इसके अलावा यह सवाल भी उठता है कि मुस्लिम धर्म में मुहर्रम महीने को लेकर क्या मान्यताएं और परंपराएं हैं।
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सोमवती अमावस्या क्यों है खास?
सनातन मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन लोगों को भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए। साथ ही पितरों की पूजा और तर्पण करना चाहिए। सोमवती अमावस्या तीन साल में एक बार आती है। इस वजह से इस दिन पूजा-अर्चना और आराधना करने से लोगों को तीन गुना फल मिलता है। इस दिन हिन्दू धर्म के लोग सुबह-सुबह स्नान करते हैं, उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि मिलती है।
15 जून को सिर्फ सोमवती अमावस्या ही नहीं है, बल्कि इस दिन मिथुन संक्रांति भी है। यह पर्व मुख्य रूप से इसलिए मनाया जाता है क्योंकि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं। जिससे सभी राशियों के जीवन में खास बदलाव होता है। साथ ही माना जाता है कि मिथुन संक्रांति के बाद ही वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। इस पर्व को ओडिशा में राजा परब के नाम से एक अलग अंदाज में मनाया जाता है।
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शुरू होगा पाक महीना?
मुस्लिम धर्म में मुहर्रम महीना बेहद खास और पाक माना जाता है। इसी महीने को साल का पहला महीना माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने के 10वें दिन को बेहद खास माना गया है। इस दिन को आशूरा कहा जाता है। इसी दिन पैगंबर मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की कर्बला के युद्ध में शहादत हुई थी। इस वजह से शिया समुदाय के लोग मातम मनाते हैं, जबकि सुन्नी समुदाय के लोग रोजा रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं। इस दिन कई लोग मस्जिद जाकर नमाज भी पढ़ते हैं।
नोट- इस खबर में दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।