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पांच वक्त की होती है नमाज, फज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब और ईशा के क्या अर्थ हैं?

इस्लाम में पांच वक्त की नमाज दिन को पांच हिस्सों में बांटने का तरीका है। फज्र, ज़ुहर, अस्र, मगरिब और ईशा ये पांचों शब्द अरबी भाषा के हैं। इस तरह पांचों नमाजें हमें दिन के अलग-अलग समय की पहचान कराती हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Social Media

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मुस्लिम समुदाय के लिए नमाज सिर्फ एक धार्मिक नियम नहीं है बल्कि यह इंसान को अल्लाह से जोड़ने का एक जरिया है। नमाज इंसान को दुनिया की भागदौड़ और उलझनों में भटकने से बचाती है। कुरान और हदीस के अनुसार, नमाज हमें याद दिलाती है कि हम इस दुनिया में क्यों आए हैं और आखिरकार हमें अल्लाह के पास लौटकर जाना है। समुदाय का मानना है कि जो लोग दिन में पांच वक्त की नमाज पढ़ते हैं उनके जीवन में परेशानियां कम होती हैं। रमजान के समय रोजा रखने वाले मुस्लिमों से उम्मीद की जाती है कि वे पांच बार की नमाज जरूर पढ़ेंगे।

 

सुबह से लेकर रात तक हर नमाज का अपना एक तय समय और खास महत्व होता है। हर वक्त की नमाज इंसान को अनुशासन सिखाती है और उसे बुरे कामों से दूर रहने की प्रेरणा देती है। अब आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि दिन के हर वक्त की नमाज का क्या मतलब और महत्व है।

 

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फज्र की नमाज

सुबह की पहली रोशनी के साथ फज्र की नमाज का समय शुरू होता है। इस वक्त की इबादत इंसान को पूरे दिन के लिए सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। हदीस के मुताबिक, जो व्यक्ति फज्र की नमाज पढ़ता है, वह पूरे दिन अल्लाह की हिफाजत में रहता है। जो लोग जमात के साथ नमाज पढ़कर सूर्योदय तक अल्लाह का जिक्र करते हैं, उन्हें हज और उमराह जैसा सवाब मिलता है।

ज़ुहर

जब सूरज ढलना शुरू होता है, तब ज़ुहर का वक्त होता है। यह वह समय है जब आसमान के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। इनका मानना है कि इस वक्त नेक काम करना और नमाज पढ़ना बहुत कीमती है। समय पर ज़ुहर की नमाज पढ़ने वालों को जहन्नुम से बचाव होता है।

असर

दोपहर के बाद और सूर्यास्त से पहले असर की नमाज अदा की जाती है। इस नमाज को छोड़ने की सख्त मनाही की गई है। जो फज्र और असर की नमाज की पाबंदी करता है, उसके लिए जन्नत के रास्ते आसान हो जाते हैं। यह नमाज इंसान को दुनिया और परलोक दोनों जगह कामयाबी दिलाने में मदद करती है।

मगरिब

जैसे ही सूरज डूबता है, मगरिब का वक्त शुरू होता है। लोगों के बीच ऐसी मान्यता है कि इसे जानबूझकर छोड़ना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है।  मगरिब के समय अल्लाह अपने बंदों की दुआएं कुबूल करता है और उनकी जायज इच्छाओं को पूरा करता है। इस नमाज की पाबंदी से परिवार और धन-दौलत में बरकत आती है।

 

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ईशा

दिन की आखिरी नमाज ईशा है, जो रात के वक्त पढ़ी जाती है। हालांकि, इसे पढ़ना थोड़ा कठिन लग सकता है लेकिन इसका इनाम बहुत बड़ा है। सोने से पहले ईशा पढ़कर दुआ करने से रात सुकून भरी गुजरती है और अल्लाह की खास कृपा बनी रहती है।


नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।


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