हिमाचल की शिवालिक पहाड़ियों के बीच स्थित ज्वाला देवी मंदिर अपनी रहस्यमयी नौ ज्योतियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसे माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, जहां देवी की मूर्ति के बजाय पृथ्वी के गर्भ से निकल रही प्राकृतिक ज्वालाओं की पूजा की जाती है। हजारों वर्षों से जल रही इन ज्वालाओं का रहस्य आज भी लोग सुलझा नहीं पाए है।
ऐसा कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर से लेकर आधुनिक वैज्ञानिकों तक, कई लोगों ने इन ज्योतियों को बुझाने या इनके स्रोत का पता लगाने की कोशिश की लेकिन वे सभी इसमें सफल नहीं हो पाए। यह मंदिर न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है बल्कि साइंस को मानने वाले लोगों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।
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ज्वाला मंदिर का रहस्य और महत्व
नौ ज्योतियों का स्वरूप
मंदिर के भीतर नौ अलग-अलग स्थानों से ज्वालाएं निकलती हैं, जिन्हें देवी के विभिन्न रूपों का प्रतीक माना जाता है। इनमें प्रमुख हैं महाकाली जो कि मुख्य ज्योति है जो शक्ति का प्रतीक है। इसके अलावा अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजनी के रुप में मां की ज्योती जलती रहती है।
अकबर की हार और सोने का छत्र
इतिहास के अनुसार, अकबर ने इन ज्योतियों को बुझाने के लिए नहर का पानी उन पर डलवाया था लेकिन ज्वालाएं नहीं बुझीं। अपनी गलती का अहसास होने पर अकबर ने देवी को सवा मन सोने का छत्र चढ़ाया। ऐसी मान्यताएं है कि देवी ने वह भेंट स्वीकार नहीं किया और वह सोना तुरंत एक अज्ञात धातु में बदल गया, जो आज भी मंदिर में मौजूद है।
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण
भूवैज्ञानिकों का मानना है कि इन पहाड़ियों के नीचे प्राकृतिक गैस जैसे मीथेन का भंडार हो सकता है, जो वहां मौजूद कई छेद के माध्यम से बाहर आकर जलती है। हालांकि, शोध के बावजूद आज तक गैस के सटीक स्रोत या उसकी मात्रा का पता नहीं चल पाया है।
51 शक्तिपीठों में स्थान
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े किए थे, तब यहां माता की जीभ गिरी थी। इसीलिए यहां शब्द और अग्नि का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।