logo

मूड

ट्रेंडिंग:

ज्यादा सोचते हैं, तनाव है? श्रीमद्भगवद्गीता की यह सीख काम आएगी

कई लोग छोटी-से-छोटी बातों को लेकर हजारों बार सोचते हैं। इसी ओवरथिंकिंग के कारण लोगों का मन अशांत रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता से समझिए इसे दूर करने के उपाय क्या हैं।

news image

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Gemini

शेयर करें

google_follow_us

संबंधित खबरें

Advertisement

आजकल के भागदौड़ भरे जीवन में कई लोग हर वक्त कुछ न कुछ सोचते रहते हैं। कई बार व्यक्ति जीवन के छोटे-छोटे निर्णय लेने से पहले हजारों बार सोचता रहता है। वहीं कुछ लोग अपने भविष्य के बारे में सोचने की बजाय जीवन में घट चुकी नकारात्मक घटनाओं को सोचकर दुखी होते रहते हैं। इससे व्यक्ति का मन दुखी रहता है और वह वर्तमान की बजाय पुरानी बातों में ही अटका रहता है। इसे ही ओवरथिंकिंग माना जाता है, जिससे आज के दौर में कई लोग परेशान हैं। इसी ओवरथिंकिंग से बचने के उपाय हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में बताए गए हैं।


हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे श्लोक और उपदेश लिखे गए हैं, जिन्हें अपनाकर व्यक्ति अपनी कई समस्याओं और परेशानियों को दूर कर सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ओवरथिंकिंग खत्म करने के लिए कुछ उपाय बताए थे। इन उपायों को अपनाकर लोग अपने मन की हलचल को शांत कर सकते हैं।

 

यह भी पढ़ें: लव पार्टनर को दे रहे हैं धोखा? गरुण पुराण में लिखी है सजा

क्या है भगवद्गीता की सीख?


भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया था कि व्यक्ति को हमेशा कर्म करते रहना चाहिए, साथ ही कर्म के परिणाम यानी फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। कई लोग अक्सर इसी वजह से ज्यादा सोचते हैं कि उन्हें अपने कर्म का क्या फल मिलेगा। जब हम अपने कर्म के फल की चिंता नहीं करेंगे, तो आधी चिंता वहीं खत्म हो जाएगी।
'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥'


इस श्लोक का अर्थ है कि व्यक्ति का अधिकार सिर्फ कर्म करने पर है, फल पर नहीं। इसलिए कर्म करते रहो और फल की चिंता मत करो, क्योंकि कर्म के नतीजे को लेकर हम सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकते।


अस्थायी है सुख-दुख


कई लोग अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों को स्थायी मान लेते हैं और उसी गम में डूबे रहते हैं। इसी वजह से वे लगातार सोचते रहते हैं। इसी को लेकर भगवद्गीता में कहा गया है कि सुख-दुख अस्थायी हैं।


भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से बताया है कि सुख-दुख अस्थायी हैं। जिस तरह रात का अंधेरा हमेशा नहीं रहता, उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में हमेशा दुख और कष्ट भी नहीं रहते। यानी जिस व्यक्ति के जीवन में कठिनाइयां आती हैं, उसी के जीवन में आराम और सफलता भी आती है। इसी तरह गीता में लिखा है


'मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥'

 

यह भी पढ़ें: 18 जुलाई राशिफल, शनि और मंगल के प्रभाव से आपके जीवन में क्या बदलाव आएगा? जानिए


इसका अर्थ है कि सुख-दुख, सर्दी-गर्मी की तरह आते-जाते रहते हैं। ये अस्थायी हैं। इस श्लोक के जरिए भक्तों को संदेश दिया गया है कि लोगों को अस्थायी परिस्थितियों को लेकर ज्यादा नहीं सोचना चाहिए।


और पढ़ें