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 करोड़पति से लेकर सफल व्यक्ति तक, जैन धर्म के लोग क्यों ले रहे हैं संन्यास?

आजकल जैन धर्म के युवा से लेकर करोड़पति तक सांसारिक जीवन को छोड़कर जैन दीक्षा ले रहे हैं। यहां समझिए जैन धर्म में वैराग्य जीवन का महत्व क्या है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- AI Generated

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आज के दौर में हर व्यक्ति करियर में सफल होना चाहता है, जिसके लिए कई लोग दिन-रात कड़ी मेहनत भी करते हैं। मेहनत के बल पर लोग करोड़पति, डॉक्टर, इंजीनियर या जज भी बन जाते हैं। सफलता हासिल करने के बाद लोग अक्सर आरामदायक जीवन जीना पसंद करते हैं। इसके ठीक विपरीत जैन धर्म के लोग सफलता पाने के बाद संन्यास का मार्ग अपना रहे हैं और आरामदायक जीवन त्याग देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संन्यास लेने से जीवन की मुक्ति का मार्ग मिलता है। इसके साथ ही जो व्यक्ति संन्यास लेता है, वह पाप कर्म करने से बच जाता है।

 

हाल ही में मध्य प्रदेश की प्रखरश्री ने जज की परीक्षा दी और परीक्षा पास कर ली, लेकिन नौकरी में जॉइनिंग करने से पहले संन्यास मार्ग पर चलने का फैसला लिया। दूसरी तरफ, 2024 में गुजरात के एक दंपत्ति ने संन्यास लिया था। जिन्होंने अपने बिजनेस के दम पर 200 करोड़ रुपये की संपत्ति हासिल की थी। संन्यास लेने के बाद उन्होंने पूरी धन-संपत्ति दान कर दी। इस दंपत्ति के 19 साल के बेटे और 16 साल की बेटी ने पहले ही जैन दीक्षा ले ली थी। इन लोगों के किस्से सुनकर कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर जैन धर्म में संन्यास मार्ग को सबसे ज्यादा महत्व क्यों दिया जाता है। इस सवाल का जवाब आइए जैन धर्म की मान्यताओं से समझते हैं।

 

 

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जैन धर्म में क्यों लेते हैं संन्यास?

धार्मिक जानकारों के अनुसार, जैन धर्म लोगों को सिखाता है कि व्यक्ति को जुनून और नफरत जैसे भावों पर जीत हासिल करनी चाहिए। जैन धर्म में माना जाता है कि प्रकृति में मौजूद हर चीज प्राणवान है, जिसे नुकसान पहुंचाने से व्यक्ति को बचना चाहिए। प्रकृति के हर तत्व को नष्ट न करें, इसलिए लोगों को धैर्य, संयम और हमेशा दूसरों के प्रति सेवा भाव रखना चाहिए। हालांकि, जब व्यक्ति सांसारिक जीवन जीता है, तब वह जाने-अनजाने में पाप कर्म कर सकता है। इन्हीं पापों से मुक्ति पाने के लिए लोग सांसारिक जीवन का त्याग करते हैं। धार्मिक जानकारों का मानना है कि संन्यास मार्ग अपनाने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्ति पा लेता है।

 

जैन धर्म में संन्यास का महत्व क्या है?

जैन धर्म के पांच सिद्धांत हैं, जिन्हें लाखों लोग अपने जीवन में अपनाते हैं। वे पांच सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह हैं। जैन धर्म के जानकारों के अनुसार, लोगों को इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार अपना जीवन जीना चाहिए।

 

1. अहिंसा भगवान महावीर ने कहा था कि व्यक्ति को अपना पूरा जीवन अहिंसा के मार्ग पर जीना चाहिए। अहिंसा का मार्ग एक आदर्श व्यक्ति के जीवन का सार है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान महावीर ने कहा था कि 'अहिंसा परमो धर्म', जिसका अर्थ है कि व्यक्ति के जीवन का परम धर्म अहिंसा है।

 

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इस सिद्धांत के हिसाब से व्यक्ति को तीन प्रकार की हिंसा से बचना है। इसके तहत लोगों को दूसरों को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। दूसरा, व्यक्ति को मानसिक हिंसा यानी दूसरों का मानसिक तौर पर शोषण करना या दूसरों के प्रति नकारात्मक सोच नहीं रखनी चाहिए। इसके अलावा व्यक्ति को दूसरों से घृणा नहीं करनी चाहिए। सांसारिक जीवन में व्यक्ति के लिए अहिंसा के मार्ग पर चलना बेहद कठिन हो जाता है।

 

2. सत्य में जीना जैन धर्म में दूसरा सिद्धांत है कि हर परिस्थिति में सच बोलना चाहिए। हालांकि, अनजाने में छोटे बच्चे जो झूठ बोलते हैं, उनके अनजाने में बोले गए झूठ का पाप नहीं चढ़ता है। जब व्यक्ति में सूझबूझ बढ़ जाए, तो उसे सत्य की राह पर ही चलना चाहिए।

 

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3. अचौर्य इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति को दूसरों की चीजों को चुराने से बचना चाहिए। इसके अलावा दूसरे के ज्ञान को अपना बताकर खुद को परम ज्ञानी नहीं समझना चाहिए। इस सिद्धांत के जरिए लोगों को यह भी समझना चाहिए कि दूसरों की वस्तु हड़पकर व्यक्ति दूसरे की खुशी नहीं चुरा सकता है।

 

4. ब्रह्मचर्य व्यक्ति को शरीर, मन और चेतना को सांसारिक भोगों से मुक्त करके वैराग्य का मार्ग अपनाना चाहिए, जिससे व्यक्ति सांसारिक भोग, तनाव और ईर्ष्या से मुक्ति पा लेता है।

 

5. अपरिग्रह इस सिद्धांत में बताया गया है कि व्यक्ति को धीरे-धीरे महावीर के मार्ग को अपनाकर भौतिक वस्तुओं से मोह त्यागना चाहिए। उसके बाद चटपटे भोजन और धन-संपत्ति को त्यागना चाहिए। इन्हीं सिद्धांतों को मानकर आजकल कई लोग दीक्षा ले रहे हैं।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।


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