logo

ट्रेंडिंग:

नदियां नहाने लायक नहीं, सप्लाई के पानी से मौत, भारत में कितना जानलेवा है जल?

बीते कई दिनों से देश में पानी पीने से लोग बीमार पड़ रहे हैं। इंदौर और गांधी नगर के बाद नोएडा में भी ऐसा ही मामला सामने आया। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि भारत का पानी कैसा है।

water contamination issue

इंदौर में पानी पीने से कई लोगों की मौत, Photo Credit: Khabargaon

शेयर करें

संबंधित खबरें

Reporter

हाल के दिनों में मध्य प्रदेश के इंदौर में गंदा पानी पीने के चलते कई लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग बीमार हुए। ऐसा ही एक मामला गुजरात के गांधी नगर से आया जहां दूषित पानी पीने के चलते सैकड़ों लोगों को टायफाइड हो गया। इन घटनाओं ने देश में पीने के पानी की उपलब्धता और उसकी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सप्लाई के पानी पर आश्रित शहरी आबादी का भरोसा टूटा है। ज्यादातर नदियों का पानी तो पहले से ही पीने या नहाने लायक नहीं बचा है, ऐसे में देश में स्वच्छ जल की स्थिति क्या है, इसको लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं। ऐसे समय में जब पेयजल के प्राकृतिक स्रोत लगातार घट रहे हैं, तब कृत्रिम स्रोतों के पानी से ऐसी घटनाएं होना हैरान करने वाला है।

 

ये चिंताएं तब और बढ़ जाती हैं, जब यह पता चलता है कि देश में 'हर घर नल जल' जैसी योजनाओं पर काम चल रहा है, जिनके जरिए पाइप से पानी पहुंचाया जाएगा। जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि जो पानी सप्लाई किया जा रहा है, उसमें भी खतरनाक तत्व पाए जा रहे हैं। इंदौर और गांधीनगर दोनों के ही मामले में देखा गया कि पीने के पानी के पाइप में ही समस्या हुई और लोग शिकायत करते रहे लेकिन समाधान के बजाय उन्हें बीमारी मिल गई। आइए विस्तार से समझते हैं कि भारत में पेय जल की उपलब्धता और उस जल में प्रदूषण का मामला कितना गंभीर है।

 

यह भी पढ़ें- बीमार कर रही दवा? जरूरत, चिंता, चुनौती से लेकर बाजार तक, कहानी एंटीबायोटिक की

 

भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी रहती है लेकिन दुनियाभर में मौजूद ताजे पानी के स्रोत में से सिर्फ 4 प्रतिशत ही भारत में हैं। ये स्रोत भी समय और खपत के साथ तेजी से कम हो रहे हैं। इतने कम स्रोतों का असर है कि भारत की एक बड़ी आबादी ऐसा पानी पीने को मजबूर है जो जानलेवा साबित होता है। देश में सतह पर मौजूद 70 प्रतिशत पानी ऐसा है जिसे पिया नहीं जा सकता है। नीति आयोग की कंपोजिट वाटर रिसोर्स मैनेजमेंट रिपोर्ट 2023 के मुताबिक, भारत के 82 करोड़ लोगों के पास पानी की उपलब्धता 1000 मीटर क्यूब या इससे कम है जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर 1700 मीटर क्यूब प्रति साल को जल संकट माना जाता है। यही रिपोर्ट बताती है कि साल 2030 तक भारत में पानी की सप्लाई, डिमांड की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। पीने के साफ पानी की अनुपलब्धता के चलते भारत में हर साल औसतन दो लाख लोगों की मौत हो जाती है। 

जमीन के नीचे का पानी कैसा है?

 

भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां भूजल का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है। देश के 87 प्रतिशत भूजल का इस्तेमाल सिंचाई के लिए और 11 प्रतिशत पानी की इस्तेमाल घरेलू कामों के लिए होता है। ऐसे में यह पानी ही अगर प्रदूषित हो जाए तो चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। जमीन के नीचे के पानी में इस तरह के प्रदूषकों का पाया जाना खतरनाक है क्योंकि ग्रामीण इलाकों के 85 प्रतिशत लोग और शहरी इलाकों के 50 प्रतिशत लोग पीने के पानी के लिए भूजल पर आश्रित हैं। वहीं, सिंचाई के लिए 60 प्रतिशत जरूरत भूजल से ही पूरी होती है।

 

यह भी पढ़ें: सीने पर 'बोझ' से, ग्लैमर वर्ल्ड की एंट्री तक, ब्रेस्ट इंप्लांट्स का लेखा-जोखा

 

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) पानी की क्वालिटी को लेकर राज्यों और संबंधित एजेंसियों को अलर्ट जारी करता है। यह अलर्ट तब भेजा जाता है जब पानी की गुणवत्ता BIS (IS 10500:2012) मानकों की सीमा से ज्यादा दूषित होने वाले होते हैं। इसका मकसद है कि समय पर सूचना दी जाए ताकि त्वरित कार्रवाई हो सके। CGWB की रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 20 प्रतिशत भूजल ऐसा है जिसमें नाइट्रेट, यूरेनियम और आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्व पाए गए हैं।

 

 

CGWB की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में पानी को प्रदूषित करने वाला सबसे बड़ा केमिकल कैल्शियम बाई कार्बोनेट (CaHCO3) है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 कुल 15259 सैंपल लिए गए। इनमें से 20.7 प्रतिशत सैंपल में नाइट्रेट की मात्रा BIS के मानक यानी 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा थी। इसका प्रमुख कारण यह है कि केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल ज्यादा होता है और कूड़े का प्रबंधन सही से नहीं होता। इसी तरह 8.05 प्रतिशत सैंपल में फ्लोराइड की मात्रा मानक से ज्यादा मिली। गंगा ब्रह्मपुत्र बेसिन के इलाकों में कई जगहों पर पानी में आर्सेनिक की मात्रा भी पाई गई। यह रिपोर्ट बताती है कि 28.3 प्रतिशत सैंपल ऐसे हैं जो BIS के किसी न किसी मानक पर खरे नहीं उतरते। वहीं, 71.7 प्रतिशत सैंपल ऐसे थे जो पीने के योग्य पाए गए।

 

 भारत के 56 प्रतिशत जिले ऐसे हैं जहां के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित मानक यानी 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा है। राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह मात्रा काफी ज्यादा है। राजस्थान के 42 पर्सेंट और पंजाब के 30 पर्सेंट सैंपल में खतरनाक यूरेनियम तक पाया गया है। पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और मणिपुर राज्यों के सैंपल में आर्सेनिक पाया गया। देश के 263 जिले ऐसे हैं जहां के भूजल में फ्लोराइड तक पाया गया।

कैसा पानी पी रहे हैं भारत के लोग?

 

जल शक्ति मिशन के तहत देश के 19 करोड़ से ज्यादा परिवारों में 3 करोड़ से ज्यादा परिवारों तक पीने के पानी का कनेक्शन पहुंचाया जा चुका है। जल शक्ति मंत्रालय के मुताबिक, इस पानी की जांच हर दिन की जाती है। इसके लिए देशभर में कुल 2864 लैब हैं। हमने 5 जनवरी का डेटा देखा तो पता चला कि देशभर में कुल 53.39 लाख सैंपल की जांच 5 जनवरी को गई। इसमें से 1.41 लाख लाख सैंपल दूषित पाए गए जबकि दावा किया जाता है कि इस मिशन के तहत सप्लाई किया जाने वाला पानी BIS के मानकों पर खरा उतरता है। मंत्रालय के मुताबिक, कुल 37,141 प्रयास किए गए ताकि इस दषित पानी की समस्या को दुरुस्त किया जा सके।

 

यह भी पढ़ें: बिजली-पानी चूस रहे डेटा सेंटर कैसे बन रहे हैं कमाई का अड्डा? सब समझ लीजिए


जल शक्ति मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध डेटा के मुताबिक, देश के 1668 गांव ऐसे हैं जिनके पानी में खतरनाक आर्सेनिक पाया गया है। इसी तरह 12338 गांवों के पानी में आयरन, 431 गांवों में सल्फेट, 3460 गांवों में फ्लुओराइड और 8379 गांवों के पानी में नाइट्रेट पाया गया। 1650 गांवों का पानी pH और 2516 गांवों का पानी TDS के मानकों पर खरा नहीं उतरता। अगर बैक्टीरिया वाले प्रदूषण की बात करें तो 17394 गांवों के पानी में टोटल कॉलीफॉर्म (मल वाले जीवाणु) पाए गए। बता दें कि पानी में टोटल कॉलीफॉर्म की ज्यादा मात्रा दर्शाती है कि इस पानी को पिया नहीं जा सकता और ऐसा पानी पीने से लोग बीमार भी पड़ सकते हैं।

 

 

नदियों का पानी कैसा है?

 

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CBCB) की 2025 की रिपोर्ट बताता है कि नेशनल वाटर क्वालिटी मॉनीटरिंग प्रोग्राम (NWMP) के तहत देश की 645 नदियों में 2155 जगहों पर पानी की गुणवत्ता की जांच की जाती है। इसके अलावा, तालाबों, झीलों और जलाशयों को मिलाकर 909 जगहों, 1233 कुओं समेत कुल 4736 जगहों पर पानी की गुणवत्ता की जांच की जाती है।

 

यह भी पढ़ें: 111 साल पुरानी किस शरारत के चलते अरुणाचल पर दावा करता है चीन? विस्तार से समझिए

 

2022-23 के डेटा के आधार पर तैयार यह रिपोर्ट बताती है कि नदियों में 804 जगहों का पानी नहाने लायक नहीं था क्योंकि इस पानी में बायोलॉजिकन ऑक्सीजन डिमांड (BOD) मानक से ज्यादा थी। इसे 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होना चाहिए। 271 नदियों की 296 जगहें ऐसी पाई गई हैं जो प्रदूषित हैं। राहत की बात यह है कि ऐसे प्रदूषित हॉट-स्पॉट की संख्या 2018 में 351 थी जो 2025 में कम हो गई और 296 पर आ गई।

 

 

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो वाटर क्वालिटी इंडेक्स में कुल 122 देशों में भारत 120वें नंबर पर है और 70 प्रतिशत जल स्रोत प्रदूषित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट बताती है कि साल 2022 में दुनियाभर के 170 करोड़ लोगों ने ऐसे स्रोतों का पानी पिया जो दूषित थे।   

Related Topic:#Water Crisis

और पढ़ें

design

हमारे बारे में

श्रेणियाँ

Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies

CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | Sitemap