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'हिंदू नहीं हैं आदिवासी,' क्या है 'सरना' जिसे धर्म बता रहे फूल सिंह बरैया?

फूल सिंह बरैया, आदिवासियों के लिए अलग धर्म सरना की कवायद कर रहे हैं। उनका कहना है कि आदिवासी न हिंदू है, न मुसलमान, न ईसाई। उनके बयान पर हंगामा हो रहा है।

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कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया। Photo Credit: Phool Singh)

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मध्य प्रदेश की भांडेर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया आदिवासियों पर दिए गए अपने एक बयान की वजह से चर्चा में हैं। उन्होंने अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के विधायकों की पहले कुत्ते से तुलना की, अब उन्हें दूसरे धर्मों से बाहर बता रहे हैं। उनका कहना है कि आदिवासियों को हिंदू धर्म में नहीं रखना चाहिए, किसी भी धर्म में नहीं रहना चाहिए, आदिवासियों का अपना धर्म 'सरना' है। 

फूल सिंह बरैया का कहना है कि आदिवासी प्रकृति पूजक है, वह किसी धर्म का हिस्सा नहीं है। आदिवासी न हिंदू हैं, न मुसलमान, न सिख और न ईसाई। उनका वन धर्म है, जिसके लिए 'सरना' कोड लाने की कवायद की जा रही है। भोपाल के समन्वय भवन में 13 जनवरी को कांग्रेस की घोषणा-2 की ड्राफ्टिंग समिति की बैठक में उन्होंने पहले यह बयान दिया, अब सार्वजनिक तौर पर वह इन बातों को कह रहे हैं। 

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'आदिवासियों को हिंदू धर्म में मत घसीटिए'

फूल सिंह बरैया ने कहा, 'हिंदू धर्म प्रकृति पूजक धर्म नहीं है। कोई भी धर्म हो, हिंदू हो, मुस्लिम हो, क्रिश्चियन हो, इधर मत ले जाइए आदिवासियों को। आदिवासियों के एक धर्म की शुरुआत हो चुकी है। धर्म कोड है आदिवासियों का सरना। झारखंड विधानसभा में इसका बिल पास हो गया है। राष्ट्रपति महोदय को इसे भेज दिया गया है।'

 

फूल सिंह बरैया ने कहा, 'ममता बनर्जी ने बिल पास किया है, राष्ट्रपति को भेजा है। आदिवासी का कोई धर्म नहीं है, आदिवासियों के धर्म का नाम है सरना। सरना का मतलब उपवन है। उपवन का मतलब है, तमाम फूल खिल रहे हों एक वन के अंदर। उसमें वह रह सकता है।'

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 Photo Credit: notebooklm.google

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फूल सिंह बरैया:- 
आदिवासियों को इन धर्मो में मत ले जाइए। किसी भी धर्म में मत ले जाइए। हिंदू धर्म का यह मामला नहीं है। और भी कोई धर्म है किसी धर्म में नहीं जाने दीजिए। आदिवासी का धर्म बन रहा है सरना। उधर उसको ले जाइए नहीं तो वह जिंदा नहीं रहेगा। 

क्या है सरना, जिसकी कवायद कर रहे फूल सिंह बरैया?

झारखंड विधानसभा ने 11 नवंबर 2020 को विशेष सत्र में एक प्रस्ताव पारित किया था। मांग की गई थी कि केंद्र सरकार जनगणना में आदिवासी समुदाय के लिए अलग धर्म कोड 'सारना आदिवासी धर्म' दे। छत्तीसगढ़ में भी ऐसी मांग उठी। कुछ आदिवासी संगठन समय-समय पर ऐसी मांग करते रहे हैं। किसी भी सरकार ने आदिवासियों को अलग धर्म का दर्जा नहीं दिया है। बहुसंख्यक आदिवासी खुद को हिंदू धर्म का हिस्सा मानते हैं। पूर्वोत्तर में बड़ी संख्या में आदिवासी ईसाई धर्म से जुड़े हैं। 

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 Photo Credit: notebooklm.google

 

क्यों उठती है सरना कोड की मांग?

अभी तक जनगणना हिंदू, इस्लाम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन की होती आई है। आदिवासी इनमें से किसी एक को चुनते हैं या खुद को 'अन्य' श्रेणी में डालते हैं। आदिवासियों का कहना है कि इससे उनकी पहचान छिप जाती है। साल 1871-1951 तक जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग श्रेणी थी, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया। साल 2011 जनगणना में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी सारना कोड की सिफारिश की थी। 

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सरना क्या है?

सारना धर्म प्रकृति-पूजकों का धर्म है। आदिवासियों की लोककथाओं में जंगल, पर्वत, पेड़-पौधों का जिक्र देवताओं की तरह होता है। सरना धर्म पूरी तरह से प्रकृति पूजा पर आधारित है। इस धर्म को मानने वाले लोग किसी मूर्ति की पूजा करने की जगह, पहाड़ों, नदियों, और जंगलों की पूजा करते हैं। 'सरना' शब्द का मतलब उपवन या देवता का स्थान होता है। ऐसा भी कहा जाता है कि जहां साल के पेड़ होते हैं, वह जगह सरना कहलाती है। आदिवासियों का मानना है कि उनके ग्राम देवता और देवी इन्हीं जंगलों में रहते हैं। सरना धर्म में पेड़ों की कटाई वर्जित है। पर्यावरण की रक्षा करना धर्म का जरूरी हिस्सा है। आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा सिंगबोंगा को पूजता है। सरना के सर्वोच्च देवता, सिंगबोंगा हैं। 

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 Photo Credit: notebooklm.google

फूल सिंह बरैया कौन हैं?

फूल सिंह बरैया, भांडेर विधानसभा सीट से विधायक हैं। उन्होंने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बहुजन समाज पार्टी से की थी। वह एक जमाने में कांशीराम के सहयोगी रहे हैं। साल 1989 से 2003 तक मध्य प्रदेश में BSP के प्रदेश अध्यक्ष रहे। वह पहली बार 1998 में भांडेर सीट से बीएसपी के टिकट पर विधायक बने थे।

बीएसपी से अलग होने के बाद उन्होंने समता समाज पार्टी और बहुजन संघर्ष दल जैसे अपने दल भी बनाए, लेकिन बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। फूल सिंह बरैया का जन्म 1962 में मध्य प्रदेश के भिंड में हुआ था। उन्होंने 1988 में ग्वालियर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है। वह आदिवासी हितों की बात करते हैं। 


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